गुरुवार, 12 फ़रवरी 2015

सौ ऊँट

सौं ऊट
अजय राजस्थान के किसी शहर में रहता था . वह ग्रेजुएट था और एक प्राइवेट कंपनी में जॉब करता था .
पर वो अपनी ज़िन्दगी से खुश नहीं था ,
हर समय वो किसी न किसी समस्या से परेशान रहता था
और उसी के बारे में सोचता रहता था .
एक बार अजय के शहर से कुछ दूरी पर एक फ़कीर बाबा का काफिला रुका हुआ था .
शहर में चारों और उन्ही की चर्चाथी ,
बहुत से लोग अपनी समस्याएं लेकर उनके पास पहुँचने लगे ,
अजय को भी इस बारे में पता चला, और उसने भी फ़कीर बाबा के दर्शन करने का निश्चय किया .
छुट्टी के दिन सुबह -सुबह ही अजय उनके काफिले तक पहुंचा .
वहां सैकड़ों लोगों की भीड़ जुटी हुई थी , बहुत इंतज़ार के बाद अजय का नंबर आया .
वह बाबा से बोला ,” बाबा , मैं अपने जीवन से बहुत दुखी हूँ ,
हर समय समस्याएं मुझे घेरी रहती हैं ,
कभी ऑफिस की टेंशन रहती है ,
तो कभी घर पर अनबन हो जाती है ,
और कभी अपने सेहत को लेकर परेशान रहता हूँ ….
बाबा कोई ऐसा उपाय बताइये कि मेरे जीवन से सभी समस्याएं ख़त्म हो जाएं
और मैं चैन से जी सकूँ ?
बाबा मुस्कुराये और बोले , “ पुत्र , आज बहुत देर हो गयी है
मैं तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कल सुबह दूंगा…लेकिन क्या तुम मेरा एक छोटा सा काम करोगे …?
”“ज़रूर करूँगा ..”, अजय उत्साह के साथ बोला .
“देखो बेटा , हमारे काफिले में सौ ऊंट हैं ,
और इनकी देखभाल करने वाला आज बीमार पड़ गया है ,
मैं चाहता हूँ कि आज रात तुम इनका खयाल रखो …
और जब सौ के सौ ऊंट बैठ जाएं तो तुम भी सो जाना …
”, ऐसा कहते हुए बाबा अपने तम्बू में चले गए ..अगली सुबह बाबा अजय से मिले और पुछा ,
“ कहो बेटा , नींदअच्छी आई .”“कहाँ बाबा , मैं तो एक पल भी नहीं सो पाया ,
मैंने बहुतकोशिश की पर मैं सभी ऊंटों को नहीं बैठा पाया ,
कोई न कोई ऊंट खड़ा हो ही जाता …!!!”, अजय दुखी होते हुए बोला .
”“ मैं जानता था यही होगा …
आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ है कि ये सारे ऊंट एक साथ बैठ जाएं …!!!
”, “ बाबा बोले .अजय नाराज़गी के स्वर में बोला ,
“ तो फिर आपने मुझे ऐसाकरने को क्यों कहा ”बाबा बोले , “ बेटा , कल रात तुमने क्या अनुभव किया ,
यही ना कि चाहे कितनी भी कोशिश कर लो सारे ऊंट एक साथ नहीं बैठ सकते …
तुम एक को बैठाओगे तो कहीं और कोई दूसरा खड़ा हो जाएगा
इसी तरह तुम एक समस्या का समाधान करोगे तो किसी कारणवश दूसरी खड़ी हो जाएगी ..
पुत्र जब तक जीवन है ये समस्याएं तो बनी ही रहती हैं …
कभी कम तो कभी ज्यादा ….”“तो हमें क्या करना चाहिए ?” ,
अजय ने जिज्ञासावश पुछा.“इन समस्याओं के बावजूद जीवन का आनंद लेना सीखो …
कल रात क्या हुआ ,
कई ऊंट रात होते -होते खुद ही बैठ गए ,
कई तुमने अपने प्रयास से बैठा दिए ,
पर बहुत से ऊंट तुम्हारे प्रयास के बाद भी नहीं बैठे …
और जब बाद में तुमने देखा तो पाया कि तुम्हारे जाने के बाद उनमे से कुछ खुद ही बैठ गए ….
कुछ समझे ….
समस्याएं भी ऐसी ही होती हैं ,
कुछ तो अपने आप ही ख़त्म हो जाती हैं ,
कुछ को तुम अपने प्रयास से हल कर लेते हो …
और कुछ तुम्हारे बहुत कोशिश करने पर भी हल नहीं होतीं ,
ऐसी समस्याओं को समय पर छोड़ दो … उचित समय पर वे खुद ही ख़त्म हो जातीहैं …. और जैसा कि मैंने पहले कहा …
जीवन है तो कुछ समस्याएं रहेंगी ही रहेंगी …. पर इसका ये मतलब नहीं की
तुम दिन रात उन्ही के बारे में सोचते रहो … ऐसा होता तो ऊंटों की देखभाल करने वाला कभी सो नहीं पाता….
समस्याओं को एक तरफ रखो और जीवन का आनंद लो…
चैन की नींद सो …
जब उनका समय आएगा वो खुद ही हल हो जाएँगी …
पुत्र … ईश्वर के दिए हुए आशीर्वाद के लिए उसे धन्यवाद करना सीखो
पीड़ाएं खुद ही कम हो जाएंगी …
”फ़कीर बाबा ने अपनी बात पूरी की

सोमवार, 12 अगस्त 2013

दिल का दर्द


""यू मत पूछो मेरी बेबसी को ,बस यादों के जख्म लिए बैठे है

  उम्मीदे तो बहुत थी उसे,  मुझसे   , बस नादान बने बैठे है ""

______________________________________________
गांव
के बाहर एक शिव मंदिर है ,जो लगभग २०० वर्ष पुराना है ,मैं अपन दोस्तों के साथ
वहा
खड़ा था ,तभी वहा पर रमा(रमला) का आना हुआ ,,दिन सोमवार था तो आज ज्यादा
भीड़
भी रहती है ,,जब मैंने उसे देखा तो बस देखते ही रह गया ,देखते ही एक शेर याद
आया
"""""तुझे देखते ही होश खो बैठा ,,,क्या लाजबाब हुश्न था मैं ,,मैं बहोश हो बैठा ""
अब
जैसे ही सोमवार आता ,मैं पहले से ही वहा उसके इंतजार में खड़ा रहता ,ऐसे करते -करते कई सोमवार निकल गए ,पर कुछ कहने कि हिम्मत हुई ,,पर उसे पता हो गया कि मैं उसे देखता हू
'मेरे
दोस्तों कहा कि अरे तुम साले पागल हो जाओगे ,और रमा को कुछ कह भी नही पाओगे ,और
समय
बीत जागा इन्तजार  में ही ,,सो उनके कथनानुसार मैंने भी हिम्मत जुटाई,,और जैसे ही वह मंदिर से निकली और मैं बगल में हो लिया ,,बहुत हिम्मत दिखा कर मैंने कह दिया कि रमा एक बात कहनी है ,,उसने कहा ,,हा बोलो ,तो मैंने कहा ,,""तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो ,आई लव यू """,,,,पर उसने बिना कोई जवाब के आग बढ़ गई ,,अब मन में संसय होने लगा कि कही इसने घर पर बता दिया तो सिर पर एक भी बाल नही बचेंगे ,,खैर शाम तक इसी कस्मकस में दिन बीत गया ,और कुछ भी नही हुआ और डर भी दूर हो गया ,,लगभग १० दिनों बाद एक उसने मुझे पत्र दिया उसमे यही था कि मैं भी आपको आपके कहने के पहल से ही चाहती हू ,पर मैं कह सकी ,,
ये
सिलसिला धीरे- धीरे चलता रहा ,,चिट्टी -पत्रों के माध्यम से ,इस बीच मेरी छुट्टियाँ भी बीत गई और मैं फिर  बाहर चला गया ,,ऐसा करते-करती १० माह निकल गए पर मैं उस भुला नही,,,,,परिक्षाओ के बाद मई-जून कि फिर छुट्टियाँ हो गई ,फिर मैं गांव पंहुचा ,, इस बीच मुझे य भी नही मालूम कि प्यार क्या होता है .मैं इन सब बातों से  बिल्कुल अनजान था ,बस ये समझो कि ये मेरा लड़कपन था ,जो कि दोस्तों कि उकसाई हुई आग में कूद पडा था !
रमा
से से फिर चलते - फिरते कई बार बातचीत हो जाती पर कभी फुरसत में या कभी एकांत मिलकर बात न हो पाती ,इसके लिए मैं तो बेचैन तो था ही पर रमा को भी उतनी ही चाहत मुझसे मिलन कि थी ,,फिर एक दूर गांव में एक मेला लगता है ,जो मेरे गांव से लगभग या किलोमीटर है ,दोनों वहाँ  जाने को तैयार हो गए ,, वो भी अपनी सहेलियों के साथ मेला दखने गई .मैं भी दोस्तों साथ गया ,,अब यहाँ गांव के लोग नही थे !थे भी तो भीड़ में पहचाने कौन ,फिर हम दोनों पास के एक आम का बहुत बढ़ा बगीचा था वहाँ चले गए ,,पहली बार हमने एक - दूसरे को जी भर कर देखा ,घंटो बात किये ,,एक-दूसरे को बाँहों में भर कर चूमा ,,बस ये कह लो कि एक दूसरे को छोड़ ही नही पा रहे थे ,,उस दिन तो ऐसा लगा कि हमने सब कुछ पा लिया ,,काफी समय हो गया था सो हम मेले में वापस चले गए ,,शाम को घर भी वापस गए ,,,फिर भी मैं अभी तक उसकी भावनाओं को समझने में असमर्थ था ,मैं प्यार कि परिभाषा नही जानता कि प्यार क्या होता है ,,ये तो बस ऐसे चाल रहा था कि समय बिताने लिए करना है कुछ काम ,,,,,,,,,,,,,,,
धीरे
-धीरे समय बीतता गया ,,और एक दिन उसका सन्देश आता है कि मैं तुमसे मिलना चाहती हू ,,,समय लगभग रात को ७:३० पर हल्का अँधेरा हो जाता है ,मैं गया ,वो भी आई ,,और आते ही रोने लगी ,मैंने कहा हुआ क्या है ये तो बता ,,पर वह रोंने के आगे मान ही नही रही थी ,,तब उसने बताया कि मेरे घर वाले मेरी शादी करने जा रहे है ,,,तुम मुझे यहाँ से ले चलो ,,
इतना
सुनते ही ,""""""मुझे काटो तो खून नही""""""",,,,मैं इस सोच में पड़ गया कि मैं तो अभी पढ़ रहा हू ,कोई नौकरी या काम-धंधा भी नही ,,मैं इसे कहा लेकर जाऊ ,,क्या खिलाऊंगा ,क्या पहनाऊंगा ,,,मेरे बड़े भाई कि अभी शादी भी नही हुई ,,,बहुत सारे सवाल मेरे दिमाग में घूमने लगे ,,मैं काफी टेंसन में  हो गया ,,,,,,,,पर मेरी हिम्मत हुई कि इसे कहा लेकर जाऊ ,,ऊपर से माँ-बाप ,,,समाज का डर ,,पर मैं इन बंधनों को तोड़ पाया ,,,मैं डर-ही-डर में समय निकाल दिया,,,, फिर वापस पढ़ाई के लिए जाना पडा ,और मैं चला गया ,,अगली बार फिर छुट्टियों २ मई को आया तो पता चला कि उसकी शादी मई कि है ,,पर पता नही मैं क्यों मजबूर था जो उसका साथ दे पाया ..उसकी बारात भी आई और चली भी गई .मैं मूक दर्शक कि भांति देखता ही रह गया ,और मैं अपने -आप को ठगा सा देखता रहा ,और वह दिल्ली चली गई ,,,अब तो मुलाकात नही होती कभी दिख जाती तो मैं ही काफी शर्म महसूस करता और नजरे चुराने लगता ,,,,,पर उसने एक ही बात कही कि शायद किस्मत वालो को मिलता है ,प्यार के बदले प्यार ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,