सोमवार, 4 मई 2015

बुद्ध का जीवन परिचय

बद्ध धम्म के बुनियादी सवाल जवाब।

बच्चो के लिए बौद्ध धम्म के आसान सवाल जवाब

बुद्ध जीवन व सन्देश प्रश्न

1. बुद्ध  का  शुरू वाला  नाम क्या  था ?

उत्तर :-सिद्धार्थ   उनका  घर  का  नाम  था! गौतम  उनका  कुल  गोत्र था!इस तरह उनका  शुरू वाला   नाम  सिद्धार्थ  गौतम बना!

प्रशन:-2। वह कौन  थे?

उत्तर:-    वह कपिलवस्तु देश  के राजकुमार  थे!

प्रशन 3.राज- कुमार  किसे  कहते  हैं ?

उत्तर :- राजा   के  पुत्र को  राजकुमार  कहते  हैं!

प्रशन:- 4 वह किस  वर्ण  से  थे?

उत्तर :-क्षत्रिय वर्ण  से!

प्रशन:-5 गौतम  के  पित्ता का नाम  क्या  था ?

उत्तर :-शुद्धोधन

प्रशन6 :-उनकी  माँ  का  नाम क्या था?

उत्तर :- महामाया

प्रशन7 :-राजा  शुदोधन किस  पर  राज  करते  थे ?

उत्तर ;- शाक्यों   पर !

प्रशन :-8 कपिलवस्तु  किस राज्य में है?

उत्तर :- उत्तर प्रदेश  में वाराणसी नगर  से  लगभग  एक  सौ  मील  नेपाल की  तराई  में पड़ता है!

प्रशन:-9 कपिलवस्तु देश  किस  नदी के किनारे  पर  स्थित था ?

उत्तर:-रोहिणी  नदी के किनारे पर  !

प्रशन:-10 राजकुमार सिद्धार्थ का  जन्म कब हुआ?

उत्तर:-सन 623 ईसापूर्व!

प्रशन:-11 जन्म स्थान?

उत्तर:- लुम्बिनी  [जंगल में !]

प्रशन 12:-जंगल  में ही क्यों?

उत्तर :-उनको  सुसराल  से  मायके  पालकी  में  रख कर ले  जाया  जा  रहा था  ताकि परम्परा  के  अनुसार   बच्चा  उनके  मायके  में  पैदा  हो ,लेकिन जंगल  के  रास्ते  में ही बच्चा  पैदा हो  गया!

प्रशन:-13 राजकुमार  के  बारे  में क्या कहा  गया था ?

उत्तर:- अगर राजकुमार राज  करे गा  तो उसका  शानदार  राजा  होगा! अगर वह  घर   त्याग  करेगा तो  दुनिया  को  दुःख  से  निज़ात का  रास्ता बताये गा!

प्रशन:-14 उनके  पिताजी क्या   चाहते  थे?

उत्तर: वह चाहते थे वह बड़ा  हो कर  राज  करे,घर  न  त्यागे!

प्रशन:-15 वह घर  न त्यागे  , इसलिये उनके  पित्ता ने क्या किया   ?

उत्तर:- उनके  पित्ता  के  कहने  पर   तीन  बङे SEASONS मौसम के  मुताबिक सर्दी ,गर्मी  और वर्षा के  अनुरूप नौ  मंजिला ,पांच मंजिला और तीन  मंजिला  राज  महल  तामीर  किए!

प्रशन:-16 इन महलों  को  किस  तरह  सज़ाया गया  था?

उत्तर:- इन  तीनों महलों  के  इर्द  गिर्द  खुश्बूदार  फूलों  के  बाग़  बनाये थे! जिन में  मोरों  की  कूक  गूंजती  रहती थी!

प्रशन:-17 उनकी शादी  कितने साल  में  हुई? और  उनके बास्ते और क्या  इंतजाम  थे ?

उत्तर:-उनकी  शादी  16  साल  की उम्र में  हुई! नाच  और  संगीत  में माहिर महिलाऐं  लगातार  इन की  सेवा में  लगी रहती थीं!

प्रशन:-18 उनकी  पत्त्नी का  नाम  बताएँ?

उत्तर :-यशोधरा!

प्रशन :-19 राजकुमारी  यशोधरा को  गौतम ने    किस तरह  प्राप्त किया?

उत्तर:- स्वयंवर हुआ,  उस  में  सिद्धार्थ प्रथम  आये  और  सभी राजकुमारियों में  से  राजकुमार ने  यशोधरा को  चुन  कर  शादी  की !

प्रशन :-20 यशोधरा  को  जब  बच्चा हुआ  तो  उस  का नाम  किस  ने रखा  और  इस नाम  का किया  अर्थ  होता है ?

उत्तर :- बच्चे  का  नाम उनके  पिता सिद्धार्थ   गौतम  ने  राहुल  रखा और  इस  का अर्थ  होता  है जंजीर

प्रशन:-20 इतनी  मज़ेबाली जिन्दगी  कया  सिद्धार्थ  को अच्छी लगती  थी?

उतर:- नहीं !

प्रशन:21  सिद्धार्थ   की  शिक्षा  के  बारे में  बताएँ?

उत्तर:-उन्हें अच्छे  शिक्षक पढ़ाते थे!उनकी  तेज  बुद्धि  थी, ज्यादा  देर  पढाई किये  बिना ही  बह  कलाओं और  बिज्ञान  को समझ कर  अपने  दिमाग में  बिठा लेते  थे!

प्रशन:-22 कया  सिद्धार्थ शानदार  महलों  में  ही  रह कर  बुद्ध  बने ?

उत्तर:-नहीं ,वह  29 साल  की उम्र  में  ही  शाही  शान  और  भोग विलास  को  त्याग  कर  दुनिया  के  दुखों  को   दूर  करने  के  तरीके  को तलाशने  के लिये  घर  से  निकल   गये  थे!

प्रशन:-23 दुनिया  में  दुःख ही  दुःख  है  इसका सब से  बड़ा  अनुभव उन्हें कहाँ  हुआ?

उत्तर:- 21 साल  की उम्र में वह  शाक्य संघ  के  मेम्बर  बने! शाक्य राज्य के साथ  लगता  हुआ  एक  दूसरा कोल़ियों का  राज्य  था ?  दोनों राज्यों के बीच  रोहिणी नाम की  नदी बहती  थी? शक्य और  कोली  राज्यों के लोग  इस  नदी  के  पानी से  अपने  खेत  को  पानी  लगाते थे!हर  फसल  पर  उनका  आपस  में  झगङा होता  था  कि रोहिणी  नदी  के पानी का  पहले  और  कितना  उपयोग  कौन  करेगा! जिस  साल  गौतम की उम्र  29 साल की थी रोहिणी  के  पानी को  लेकर  शाक्य और  कोली पक्षों  के खेत कामगारों  में  झगङा  हो गया! दोनों  पक्षों  ने  चोट  खाई ! शाक्य  लोगों  ने  सोचा  कि झगङे  का  फैसला  जंग  से सदा  के लिए कर लिया  जाये !गौतम  ने  इस  फैसले  का  विरोध  किया! इस विरोध के  लिये  गौतम को  नीचे  दी गईं तीन सज़ाओं  में से  एक  को  चुनने  के  लिए  कहा गया!

1.वह सेना  में  भरती होकर  युद्ध  में भाग  ले सकता  था!

2.  वह फांसी  पर  लटकना या  देश  से  निकाल दिया  जाना  स्वीकार  कर सकता था!

3. वह अपने  परिवार का  सामाजिक  बहिष्कार और  उनके  खेतों  की  जब्ती के लिये  राज़ी  हो  सकता  था !गौतम ने  दूसरी  सज़ा  के  लिये  प्रार्थना  की! इस  तरह  उनको  घर  से जाना  पड़ा! यह  एक महान त्याग  था !

प्रशन:-24 जब उनको  घर  से निकलना  पड़ा  तो  उनको क्या क्या       त्यागना  पड़ा?

उत्तर :-उन्हों ने  अपने  परिवार  से   अनुमति  लेकर   अपने परिवार को  , सुन्दर  महलों को  ,धन –जायदाद और  सुखों को  ,अपने कोमल  बिस्तरों ,सुन्दर  कपड़ों ,अच्छे  खानों  और उन्हें अपने  सुन्दर राज्य  को भी  त्यागना पड़ा!

प्रशन :-25 क्या दुनिया में    किसी और  ने  ऐसा  त्याग  हमेशा  के लिए किया ?

उत्तर :-नहीं, ऐसा  कोई  नहीं  जिस  ने  सदा के लिये  ऐसा महान  त्याग किया हो!

प्रशन:26 जब  उन्हों  ने  यह  महान त्याग किया  तो उन की उम्र कितनी  थी?

उत्तर :- 29  साल  उम्र  थी !

प्रशन :-27 कहा  जाता  है  की  गौतम  ने  इस महान त्याग  का  फैसला एक  बूढे को ,एक  बीमार  को ,एक  लाश  को  और  एक  साधु  को  देख कर  किया ! क्या यह  सच  लगता  है ?

उत्तर :-डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर   इस  आधार को नहीं  मानते ! वह कहते  हैं  कि इस  तरह  की  घटनाएँ  तो रोज़  हजारों  में  होती  हैं ,यह कैसे  हो सकता  है  कि वह 29 साल  की  उम्र से  पहले  उनको  देख  न पाये  हों!

प्रशन:-28  क्या गौतम  ने  रात  को अपनी सोयी  बीबी  और  बच्चे राहुल को चुपके  से  त्यागा  था ?

उत्तर: नहीं ,वह  दिन को  सब  से अनुमति  लेकर    घर  से  चले  गए थे!

प्रशन :-29 घर त्याग  करने  के बाद  वह  किस  और  गए   थे ?

उत्तर :-  वह  कपिलवस्तु  से  बहुत  दूर आनोमा  नदी  की और चले गए  !

प्रशन30 :- आनोमा  नदी  के  पास  जा  कर  गौतम  ने  क्या किया ?

उत्तर:- युवराज  सिद्धार्थ गौतम  वहां  पहुँच कर घोड़े  से  उतर  पङे ,अपने सुन्दर  बालों  को अपनी  तलबार  से  काट डाला,शाही  कपड़ों को  उतार कर सन्यासी वाले वस्त्र  पहन  लिए! घोङा और  कीमती  चीज़ें अपने  नौकर छन्न  को  सौंप कर  राजा शुद्धोधन  को  देने  के  लिये  कहा!

प्रशन :-31 इस के  बाद  क्या हुआ ?

उतर :-गौतम  राजा  बिम्बिसार के मगध राज्य  की राजधानी  राजगृह  पैदल चल  कर  गये?

प्रशन :-32 बहां उनको  कौन  मिलने  को  आया  था?

उतर :- बहां  खुद  राजा  बीम्बिसार  अपने मंत्रीयों  के  साथ  मिलने  आये!

प्रशन :-33 राजा  बिम्बिसार  ने  गौतम  से  कया  कहा?

उतर :- राजा ने  कहा  कि वह  बापिस  घर  चले  जाये  या  उनका आधा राज्य  ले कर  राजा बन कर  राज  करें!

प्रशन :-34 गौतम  का  क्या उत्त्तर  था ?

उतर :-गौतम  ने इस  प्रस्ताब  को  ठुकराते  हुए कहा कि उनका  लक्ष्य अब बहुत  बड़ा हो गया  है  जिस  के  कारण वह  उनका  प्रस्ताव नहीं  मान सकते!

प्रशन :-35 राजगृह  से  गौतम  कहाँ  गये?

उतर :- राजगृह  से  गौतम   उरुवेला  की और  चले गए,जो  बुद्ध  गया  के पास  है !

प्रशन :-36 उरुवेला  वह क्यों गए ?

उत्तर :-उस समय उरुवेला  के  जंगल  में  बड़े 2 ज्ञानी-ध्यानी,और साधू-सँया-सी रहते  थे ! उनके  विचार  जानने  के लिये वह  उनके  शिष्य  बने! आशा यह  थी  कि जिस  ज्ञान की  उसे  जरूरत  थी  वह  उसे उनसे   मिल जाये गा!

प्रशन :-37 वह  साद्धू-सन्यासी  किस  धर्म  को  मानने बाले  थे?

उत्तर :- वह  ब्राह्मणी धर्म को  मानने वाले  थे !

प्रशन :-38 वह  ब्राह्मणी  धर्म के  माननेवाले  साधु-सन्यासी क्या  शिक्षा देते थे ?

उत्तर :-उनका  उपदेश था कढिन पछतावा ,सख्त मेहन्त और  देह  को महान कष्ट के  द्वारा  इन्सान  को  पूर्ण ज्ञान होता है !

प्रशन :-39 क्या सिद्धार्थ  गौतम  ने  उन  ब्राह्मणी सन्यासियों  के  विचारों को माना?

उत्तर :- नहीं ,सिद्धार्थ  गौतम  ने  सन्यासियों के  विचारों   के अनुसार तपस्या  करके  देखी और कहा  कि यह  अतिवादी मार्ग  है ,इस  से  दुनिया से  दुःख दूर  नहीं  हो सकता!

प्रशन :-40 इसके  बाद  वह  कहाँ  गए ?

उत्तर :-वहां  से  उरुवेला के  जंगल  में  चले  गए  और  6  सालों  तक अपने  शरीर  को नाना प्रकार के  कष्ट दिए!

प्रशन :-41 क्या  बह  उरुवेला के  जंगल में  अकेले थे ?

उत्तर :- नहीं ,अकेले नहीं  थे ! उनके साथ पांच ब्राह्मण  सन्यासी  भी  थे !

प्रशन :- 42 उनके  नाम ?

उत्तर:-कौंडनय ,भदिेय,बप्प,महानाम  और अस्सजि उनके नाम थे !

प्रशन :-43 पूरे  सच  को  पाने  के लिये  उन्होंने किस  ज्ञान-के  रास्ते  को अपनाया था ?

उत्तर :-बह  आसन लगा कर  एक स्थान पर बैठ गए  और उन्होंने  मन को एककर के मन की गहराई में जाने में  रूकावट  डालने  बाले  सभी विचारों  को हटा  दिया! और  अपना  ध्यान मानव जीवन  की  विकराल  समस्याओं पर टिका  दिया !

प्रशन :-44  क्या  तपस्या  करते  हुए,  सिद्धार्थ  गौतम  ने   खाना नहीं खाया?

उत्तर :-    खाया !पर  वह  खाने  की मात्रा को  घटाते गए  इस तरह  वह पूरे  50 दिनों  तक  लगभग  BHUOOKHAY भूखे  रहे   !वह  अपने भोजनऔर  पानी की मात्रा को  कम से कम  करते  गए  और सिलसिला यहाँ  तक  आ  पहुंचा कि   हर रोज़  चावल  का  एक  दाना  या सरसों के एक  दाने    से  अधिक  कोई  चीज़ नहीं  खाते थे !

प्रशन :-45 क्या तपस्या  और  अपने आप को इतना  जयादा  भूखा रखने  से उनहें ज्ञान हासिल हो सका ?

उत्तर :- वह  लगातार  दुबले पतले  होते गए ! वह  इतने  कमज़ोर  हो  गये  कि एक  दिन  ज़मीन  पर  बेहोश हो  कर  गिर  पड़े !

प्रशन :-46 इस  घटना  पर  उनके साथी ब्राह्मण  सन्यासियों ने क्या सोचा?

उत्तर :-उन्होंने   यही  सोचा कि  यकीनन  सिद्धार्थ गौतम की  मौत  हो गई है ! लेकन  कुछ समय  बाद  उनको  होश आ गया !

प्रशन :-47 उन्हें  होश आने के बाद  क्या हुआ ?

उत्तर :-  सिद्धार्थ  गौतम के मन  में  यह  बात  आई  की  सिर्फ  उपबास रखने  से  या  अपने शरीर  को  कष्ट देने  से ज्ञान नहीं  पाया  जा  सकता है !इसलिये  उन्होंने  खाना खाने का फैसला किया !

प्रशन :-48 उनको  खाना  किस ने दिया ?

उत्तर :-सुजाता नाम  की  एक औरत ने  उन को  खाना[खीर ] दिया!

प्रशन :-49 फिर  किया हुआ ?

उत्तर :- वहां  से  गया  पहुंचे ! बहां  एक बड़  वृक्ष था  उस के  नीचे  बैठ कर बह  फिर  तपस्या  करने लगे !

प्रशन :-52 वह   वृक्ष के  नीचे किस  दिशा  की और  मुहँ करके  बैठे थे ?

उत्तर :-पूर्व दिशा  की  और  मुहँ करके!

प्रशन :50 इस   वृक्ष को अब क्या  कहा  जाता  है ?

उत्तर :-बोद्धि वृक्ष

प्रशन :-51 उस रात्रि  को  क्या उन को ज्ञान हासिल  हुआ ?

उत्तर :-तृष्णा शमन  के  मार्ग  का ज्ञान हुआ! भोर  होने से पहले  उनका मन  एसे  ही  खुल चूका  था  जिस तरह पूरी  तरह  कमल  का  फूल  खिल जाता है! बह  गौतम  से  बुद्ध  हो गए ! जगत  के पीछे चल रहे  सभी कार्यकारणों के  ज्ञानी हो गए !

प्रशन:-52 बुद्ध  का  सही अर्थ  क्या  होता है?

उत्तर:-  बुद्ध  यानि जिसे  पूरा   ज्ञान  हो ,जो  पूरी  समझ  रखता हो ,जो सब  कुछ  जानता हो!

प्रशन:-53 कार्यकारणों के ज्ञानी का  कया  अर्थ  है?

उत्तर :- दुनिया   में जो  कुछ  भी होता  है उस  का  कारण होता  है, उस हर  कारण  को जानने  बाले  को इस तरह  का  ज्ञानी कहा जाता  है!

प्रशन :-54 बुद्धत्ब तक  पहुँचने  के लिये  उनको  किन  मानसिक  हालात से गुजरना  पड़ा?

उत्तर :- जिस प्रकार  कोई योद्धा  किसी  युद्ध  में  अनेक  दुश्मनों  के साथ युद्ध करता है  बैसे ही  गौतम  को  मानवीय  कामनाओं और तृष्णाओं से  युद्ध करके उनपर   विजय  हासिल करनी पड़ी!

प्रशन :-55 इस प्रकार  ज्ञान हासिल  करके बुद्ध  ने  क्या किया ?

उत्तर :- शुरुआत में  उस  गंभीर ज्ञान का  जन साधारण  के  बीच  उपदेश देने  में  बुद्ध  को झिझक  महसूस  हुई!

प्रशन :-56 सो  कयों?

उत्तर :-कयों कि इस  ज्ञान की  गुढ़ता और गंभीरता को  समझना इतना आसान ना था ! इसलिये  उनको  अशंका  हुई कि बहुत थोडे  लोग ही  इसे समझ पाएंगे!

प्रशन :-57 फिर  बुद्ध ने   अपना  सन्देश दिया ?

उत्तर :   हाँ ,दिया ! बुद्ध  ने  सोचा  अज्ञान,अन्धबिश्बास और  तृष्णापूर्ण दुःख से पीङित समान्य जन मानस  को  फायदा होना जरूरी है ,इसलिये  आसान शब्दोंमें   अपने ज्ञान को जगत  को देने का  बुद्ध  ने  फैसला  लिया !

प्रशन :-58 वह  5 ब्राह्मण  सन्यासी फिर उनको  कब और  कहाँ  मिले  थे ?

उत्तर :- बुद्ध  को वह  दोबारा वाराणसी  में  मिले थे !

प्रशन :-59 बुद्ध  ने  क्या पहला उपदेश  इन को दिया था ? अगर  हाँ ,तो कहाँ ?

उत्तर :- हाँ ,सम्राट अशोक  दूारा वाराणसी में स्थापित  सिंह –स्तम्भ [हमारा राष्ट्रीय चिन्ह] के पास  बुद्ध ने  इन 5 ब्राह्मण  सन्यासियों को  पहला धम्म उपदेश  दिया !

प्रशन :-60  बुद्ध  के  धम्मुप्देश का  सार  क्या था ?

उत्तर :- बुद्ध  ने  कहा –दो सिरों  की बात है ,दो  किनारों  की बात है –एक तो काम-भोग  का  जीवन है  और  दूसरा  काया – कलेश  का जीवन  है ! पहला कहता है खाओ ,पीओ  और  मोज़ ऊङाओ ,क्यों  कि कल  तो मरना ही  है ! दूसरा  कहता  है की तमाम वासनाओं  की  जड़  ही  काट डालो क्यों यह  पुनर्जन्म का  कारणहैं !इन दोनों अतियों को  बुद्ध  ने  नामंजूर  कर  दिया! बुद्ध ने कहा“मैं ने  इन दोनों अतियों में  से  बीच  का रास्ता निकाल  लिया है!”इसे मध्यम मार्ग  भी  कहा जाता है!

प्रशन:61-बुद्ध  के  धम्म  में शामिल  होने के लिये  पहले  क्या   करना होता है ?

उत्तर :-बुद्ध  को नमन  करना होता है !

प्रशन62 :-  वह कैसे ?

उत्तर :- नम्मो  तस्स  भगवतो अर्हतो सम्मा स्म्बुधस्य कह कर!

प्रशन:-63 इस  का अर्थ ?

उत्तर:- मैं बुद्ध  को  नमन  करता हूँ !

प्रशन :- 64 फिर ?

उतर:-त्रिशरण  में  जाना  होता है?

प्रशन:-65  त्रिशरण   का अर्थ ?

उत्तर:- त्रि  का  अर्थ  होता है तीन और  शरण  का  अर्थ  होता  है सहारा या  आसरा! तीन  आसरों   या  सहारों  को  लेना होता है !

प्रशन:-66 पहले  आसरे  या  सहारे  को पाली में  लिखो!

उत्तर:-बुद्धम शरणम्   गच्छामि!

प्रशन:-67 इस  का  अर्थ  बताएँ!

उत्तर:- मैं  अपनी बुद्धि [दिमाग ]  और अपनी   ऊँची सोच   की शरण  में  जाता हूँ !

प्रशन:-68  दूसरी शरण लिखो !

उत्तर:- धम्मम् शरणम्   गच्छामि!

प्रशन :69  अर्थ  लखो !

उत्तर :-मैं बुद्ध  की  सोच  का  आसरा  लेता हूँ!

प्रशन :-  70  तीसरी  शरण  को  लिखें!

उत्तर:-संघम शरणम्   गच्छामि!प्रशन :-

71 संघम शरणम्   गच्छामि का  अर्थ  बताएँ!

उत्तर :- भिक्षु संघ की शरण  में जाता हूँ !

प्रशन :-72 संघ  का अर्थ ?

उत्तार :- संघ  का अर्थ है  संगठन यहाँ  अर्थ है भिक्षु संघ

प्रशन :-73 भिक्षु किसे  कहते  हैं ?

उत्तर :- जो  घर का  त्याग  करता है!और  बुद्ध  की  विचारधारा  को   लोगों को  बताता  है उसे भिक्षु कहा  जाता है  !

प्रशन :-74 बुद्ध  ने  कौन से  चार  आर्य सत्यों की  बात की  है ?

उत्तर :- पहला  आर्य  सत्य  है ,दुःख !दूसरा आर्य सत्य है ,दुःख का  कारण, तीसरा आर्य सत्य  है, दुःख का निवारण!  चौथा आर्य  सत्य  है ,दुःख  निवारणका  तरीका

प्रशन:-75 पहले आर्य सत्य दुःख  पर  प्रकाश डालें!

उत्तर :- दुनिया  में  दुःख  ही  दुःख  है  और  यह  व्यक्ति  ने  खुद  पैदा  किया हुआ  है! दुःख  का  आधार अज्ञानता है! दुःख का  सिलसिला चलता ही रहता है !

प्रशन :-76 दुसरे  आर्य सत्य  दुःख के  कारण पर प्रकाश डालें!

उत्तर :-  दुःख  सकारण  होता है! कामना  के  पूरा  न होने के कारण दुःख पैदा होता है !

प्रशन :-77 चौथे आर्य सत्य  दुःख के खात्में के तरीके  पर प्रकाश डालें !

ऊत्तर.   यह बैज्ञानिक रास्ता है! तथागत बुद्ध ने दुःख  के वजूद ,दुःख के कारण  और दुःख के निवारण और  निवारण के रास्ते का फार्मूला दुनिया  को दिया !

प्रशन:-79 उन  चीजों  के  बारे में बताएँ जो  दुःख  पैदा करती हैं !

उत्तर :-जन्म ,पैसा [जायदाद ] ,रोग ,मौत ,अपने रिश्तेदारों और चीज़ों से जुदा होना ,अच्छे न लगने बाले लोगों और  चीज़ों के  मिलने से  दुःख पैदा  होता है!तृष्णा दुःख  पैदा करती है !

प्रशन :-80 हम  अतृप्त तृष्णाओं और अज्ञानजनित कामनाओं को  पैदा  होने से कैसे रोक  सकते हैं?

उत्तर:-   त्रिशरण, पंचशील  और  आर्य –आठ तरह के  रास्तों  पर  चल कर  इन्हें रोका  जा सकता  है !

प्रशन:-81   आठ  भागों  वाले  रास्ते  को  लिखें!

उत्तर :-1.सम्यक दृष्टि———-सही  नज़र

2.सम्यक  संकल्प——सही फैसला

3. सम्यक    वाणी ———सही  बोलना

4.सम्यक  कर्मान्त………. सही  काम करना !

5.सम्यक आजीविका ………..सही  ढ़ंग से रोज़ी कमाना

6. सम्यक  व्यायाम ………… अच्छे विचारोंको पैदा  करना

7.सम्यक  स्मृति  और………….जागृत रहना!

8. सम्यक  समाधि…………….. मन  की सफाई  करना

प्रशन:-पंचशील लिखो!

1.मैं अकारण  जीवहत्या  नहीं  करूंगा!

2.मैं चोरी ,बेईमानी  और  लूट –पाट नहीं करूँगा!

3.मैं अपनी  बीबी  के  अलावा  दूसरी औरत  के साथ  शरीरिक सम्बन्ध नहीं  बनाऊंगा!

4.मैं झूठे,कठोर और  अनावश्यक  वचन  नहीं बोलूंगा!

5. मैं नशीली  चीज़ों  का  सेवन  नहीं करूँगा!

प्रशन:-82 इस उपदेश का  पांचों ब्राह्मणों पर  क्या प्रभाव  पड़ा?

उत्तर :-पाँचों  ने  बुद्ध  के सिद्धांतों  को  स्वीकार  किया  और  बुद्ध के  शिष्य  बन गए!

प्रशन:-83 इस के बाद बुद्ध  कहाँ  गए?

उत्तर:- उरुवेला गए ,वहां  उन्होंने  महाकश्यप  नामक व्यक्ति  को  उपदेश देकर  अपने  धम्म में शामिल  किया
प्रशन :-84 बुद्ध  ने इस के बाद  किस  महान व्यक्ति  को  धम्म में लाया ?

उत्तर :- मगध  के सम्राट  बिम्बिसार को  उपदेश दे कर बुद्ध धम्म  में लाए!

प्रशन :-85 इसके  बाद  कौन दो  व्यक्ति  उनके  शिष्य बने ?

उत्तर :-वह  दो व्यक्ति थे ,सारिपुतर और  मैध्गलयाण!

प्रशन:-86 क्या बुद्ध  अपने  पिता  को मिलने  गए?

उत्तर :- हाँ ,मिलने गए ,उनके पिता  ने  अपने  रिश्तेदारों और मंत्रियों को लेकर  उनका  बडे प्रेम और  उत्साह  के साथ  स्वागत किया !

प्रशन :-87 पिता के  घर रहने के प्रस्ताव  पर बुद्ध  ने पिता को  क्या  उत्तर दिया ?

उत्तर :- उन्होंने  अपनी  मधुरवाणी में  कहा की युवराज गौतम  अब  अपने बजूद  से बाहिर  जा  चुके  हैं और  अब बह  बुद्ध  की अवस्था  में बदल चुके हैं! जिस के  लिये अब  सभी प्राणी  अपने हैं ,एक  जैसे प्यारे हैं!

प्रशन :-88 बुद्ध ने भिक्षुणी संघ  की भी  स्थापना कब  की ?

उत्तर :-पिता  से  पहली  मुलाकात  के दौरान ही  उन्होंने यह  काम भी  कर डाला! महाप्रजापति गौतमी  जो उनकी मौसी और  सौतेली  माँ भी  थीं,पहली ऐसी  औरत  थी  जिन  को भिक्षुणी होने की  दिक्षा दी गई! और  उन्हें भिक्षुणी संघ  का मुखिया  बनाया  गया !

प्रशन :-89 इसके इलावा  और  किन औरतों  ने  धम्म  को  स्वीकार किया ?

उत्तर :- उनकी  पत्नी  यशोधरा और  अनेक  औरतों ने भिक्षुणी संघ  की सदस्यता हासिल की! यह एक  बहुत बड़ी बात थी !

प्रशन:-90 धम्म दिक्षा उन्होंने क्या सभी  को दी ?

उत्तर :- सभी  को ,खास  कर  नीच  समझी  जाने  वाली  जाति के  लोगों को दिक्षा  दे कर  धम्म  में  लाया!

प्रशन :-91 क्या बुद्ध  ने  समाजिक इन्कलाब  किया ?

उत्तर :- हाँ , किया  इस से   दलितों  को  ऊपर  उठने  का  मोका  मिला!

प्रशन:-92। वह  कितनी  उम्र  तक दिक्षा  देते  रहे?

उत्तर:- 80 साल  तक!

प्रशन:-93 कितने  साल बुद्ध  ने  धम्म  पर  काम  किया ?

उत्तर:- 45 साल

प्रशन :-94 अपने  पसंद  का   उनकाकोई एक  उपदेश  बताओ?

उत्तर :- बुद्ध  ने  कहा की उन का   या  किसी  का भी उपदेश  या  बात इसलिये  मत मानो  की कहने बाला  एक  बड़ा आदमी  है या  बह  बात या उपदेश एक  बहुत  बडे ग्रन्थ  में लिखी  गई  है कोई  बात  या  उपदेश अगर  आप की बुद्धि  की  कसौटी पर  खरी  उत्तरती है  तो  तभी  मानो अन्यथा  मानने  की  कोई  जरूरत  नहीं!

प्रशन :-95 क्या बुद्ध  की  विचारधारा  में  ज़ातपात  पाई जाती  है?

उत्त्तर:- नहीं !

प्रशन :-96   क्या  बुद्ध  की  विचारधारा  में  ऊँच-नीच  पाई जाती है ?

उतर :- नहीं !

प्रशन :-  क्या  बुद्ध की विचारधारा  में  वर्णव्यवस्था  पाई जाती है ?

उत्तर :- नहीं

प्रशन :-98 डॉक्टर बाबासाहेब आंबेडकर  ने बुद्ध धम्म  को ही क्यों  माना ?

उत्तर :-  बुद्ध की  एक  वैज्ञानिक  विचारधारा है ,  इसलिये!

प्रशन :-99  क्या बुद्ध आत्मा –परमात्मा  में  यकीन  रखते थे?

उत्तर :-नहीं !

प्रशन:-100 उनका  महापरिनिर्वाण कहाँ  हुआ

उत्तर :- कुशी नगर  में  हुआ !

प्रशन :-101 कया  उन्होंने पहले  ही  अपने  महापरिनिर्वाण के  बारे  में  बता दिया  था?

उत्त र :-102 तीन महीनें  पहले  ही  उनको  पत्ता  चला  गया था1 और  बुद्ध ने  पहले ही  अपने  चेलों  को  बता  दिया था !

प्रशन :-103. अपनी  अंतिम  सांस लेने  से पहले  बुद्ध ने   क्या  कोई  अंतिम उपदेश दिया ?

उत्तर :- हाँ ,बुद्ध  ने भिक्षुओं को  कहा  अपने  और  दुनिया  के  कल्याण  के काम  करते  रहो ,और इस  तरह  बुद्ध  ने  अंतिम साँस  ली !बुद्ध जीवन ब सन्देश

रविवार, 3 मई 2015

गजब हिन्दू धर्म

जरूर पढे मेरा मकसद किसी की  भावना आहत करना नही पर इंसान होने के कारण सोचता हु आपसे पुछता हुगजराज ( हाथी ) का पैर मगरमच्छ ने पकड़ लिया तो उसने हरि को पुकारा । हरि नंगे पाँव दौड़े आये और मगरमच्छ का वध कर गज को मुक्त कराया ।
दुशासन ने द्रोपदी का चीर हरण किया तो उसने भी हरि को पुकारा हरि ने आकर उसको भी बचाया ।
होलिका ने प्रह्लाद को जलाने की कोशिश की तो प्रह्लाद ने हरि को पुकारा हरि उसको भी बचाने आया ।
गोकुल ग्रामवासियों ने इंद्र के प्रकोप बाड़ से बचाने हरी को बुलाया, हरी ने गोवेर्धन पर्वत एक उँगली से उठाकर उनको बचाया |
दो चार आप खुद जोड़ लीजिये।

अब वास्तविक घटनाओं पर आ जाइये
महमूद गजनवी ने भारत पर 17 आक्रमण किये,सोमनाथ का मंदिर लूटा और भयानक मार काट की । भक्तो ने फिर भगवान को पुकारा । गजनवी के सैनिक रक्तपात करते रहे लेकिन कोई भगवान नही आया ????
भारत पर हमला करने शक, तुर्क, गौरी, ख़िलजी, तुगलक, सैयद, लोदी, मुग़ल , डच, अंग्रेज़ आये, लेकिन भारत भुमि को लम्बी गुलामी से बचाने कोई हरी नहीं आये ?????
औरंगज़ेब ने आपके भक्तों को मार मार मुसलमान बनाया, लेकिन आप सहायता को नहीं आये ???
अब केदारनाथ में प्रलय आ गयी , 20000 भक्त मारे गए। भक्त फिर भगवान को सहायता के लिए पुकारते रहे लेकिन कोई भगवान नही आया । भक्त मरते रहे और भगवान देखते रहे ?????? आपने सिर्फ अपना घर यानि मंदिर बचाया ???
अब नेपाल में भूकंप आया । भक्त फिर भगवान से प्रार्थना करने लगे लेकिन कोई भगवान नही आया बचाने ।
इससे पहले भी भूकंप दंगे फसाद या कोई अन्य त्रासदी होने पर भी सब भगवान को पुकारते रहे लेकिन कभी कोई भगवान नही आया ।
इससे क्या सिद्ध होता है ?????
इससे सिर्फ एक ही बात सिद्ध होती है कि भगवान बचाने को तो आता है लेकिन सिर्फ मिथकीय किस्से कहानियों में ।
अब अगला सवाल होता है कि भगवान कब सहायता करने आता हैं ? सीधी सी बात है जब लेखक भांग खाकर लिखने लग जाये तब।
अगला सवाल भगवान किसकी मदद करता है ?
निष्कर्ष कहता है भगवान पौराणिक कथाओं के सिर्फ अपने जैसे ही काल्पनिक पात्रों की रक्षा करता हैं ।
अगला सवाल भगवान कहाँ रहता है ?
ईश्वर का अस्तित्व मानव मस्तिष्क के अलावा कहीं नहीं है। वो कुछ लोगों के दिमाग में डर के रूप में बसे होने के अतिरिक्त मिथकीय किस्से कहानियों में ही रहता है ।
इन तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष यह निकलता है की
यथार्थ और वास्तविकता के धरातल पर न तो कभी किसी ने ईश्वर को देखा है और ना ही कभी कोई भगवान किसी की मदद आयें है।

बाबा साहेब हमें समझाते है की हमें अपनी मदद खुद करनी होगी जो की सबसे अच्छी मदद होती है।

आस्तिक लोग कहते है कि भगवान की मर्जी के बिना तिनका भी नहीं हिल सकता। जो कुछ होता है वो सब काल्पनिक भगवान की मर्जी से होता है।
वैसे तो उसकी औकात तिनका हिलाने की भी नहीं, पर बलात्कार डाका लूटपाट धोखाधड़ी और जातियों के नाम पे शोषण अगर उसी काल्पनिक भगवान की मर्जी है और उसी के इशारे पे ये सब होता है तो वो पूजने लायक कैसे हुआ।
कैसा गजब है हिन्दू धर्म?
सनी लियोनी के पवित्र चरण सिद्धि
बिनायक मन्दिर में पड़ने से मन्दिर पवित्र
होता है जबकि रिटायर आई ए एस व सांसद
पी एल पूनिया के जगन्नाथ पुरी मन्दिर में
जाने से मन्दिर अपवित्र हो जाता है।
पंढरपुर मन्दिर में दुनिया के महान विद्वान
डा अम्बेडकर व उनकी पत्नी रमा बाई
अम्बेडकर को जाने से रोक दिया जाता है
क्योकि इससे मन्दिर अपवित्र हो जाएगा।
काशी-विश्व्नाथ मन्दिर में शूद्र प्रवेश
कराने पर राजनारायण जी पण्डो द्वारा
डंडो से पीटे जाते हैं और करपात्री जी
महाराज अलग मन्दिर स्थापित करते हैं
क्योकि शूद्र प्रवेश से मन्दिर की पवित्रता
नष्ट हो गयी थी।
राजीव गांधी जी को सोनिया जी के
साथ नेपाल के पशुपति नाथ मन्दिर में जाने
से रोक दिया जाता है क्योकि सोनिया
गैर हिन्दू थीं।
मदनमोहन मालवीय जी ने अम्बेडकर जी से
अपने वर्तन तक छुआना मुनासिब नही समझा
क्योकि अम्बेडकर साहब अछूत थे।
जगजीवन राम जी,लालू प्रसाद यादव जी
,जीतन राम मांझी जी के छूने मात्र से पत्थर
की निर्जीव मूर्तियां अपवित्र हो गयी
और उन्हें गंगाजल या दूध से धुलना पड़ा।
देश भर में हिन्दू मन्दिरो में कथित अछूत
हिन्दुओ का मन्दिर प्रवेश या कुछ भी छूना
आज भी वर्जित है।ये कथित हिन्दू आज भी
जाति के नाते भले ही कर्म श्रेष्ठ हों,निम्न
कोटि के हैं जबकि सनी लियोनी?
जी हाँ ये वही सनी लियोनी हैं जो मशहूर
सेक्स वर्कर व अब ऐक्ट्रेस हैं।भगवान का
मन्दिर, जी हां सिद्धि बिनायक भगवान
का मन्दिर इनके चरण रज से धन्य-धन्य हो
गया।
कैसा गजब है हिन्दू धर्म?

बौद्ध संगीति

भारत का संक्षित इतिहास
भारत का इतिहास
▶ इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता(3200 BC से पहले)
आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पूर्व (3200 BC से पहले) भारत मे इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता का इतिहास मिलता है और यह सभ्यता दुनिया के अग्रणी सभ्यताओ मे मानी जाती थी। यह सभ्यता महान नागवंशियों और द्रविड़ों द्वारा स्थापित की गयी थी जिनको आज एससी, एसटी, ओबीसी और आदिवासी कहा जाता है, यह लोग भारत के मूलनिवासी है। इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता एक नगर सभ्यता थी जो कि आधुनिक नगरो की तरह पूर्णतः योजनाबद्ध एवं वैज्ञानिक ढंग से बसी हुयी थी।
▶ विदेशी आर्य आक्रमण (3100BC-1500)
विदेशी आर्य ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य जोकि असभ्य, जंगली एवं ख़ानाबदोश थे और यूरेशिया से देश निकाले की सजा के द्वारा निकले गए लोग थे। इन युरेशियनों  के आगमन से पूर्व हमारे समाज के लोग प्रजातान्त्रिक एवं स्वतंत्र सोच के थे एवं उनमे कोई भी जाति व्यस्था नहीं थी। सब लोग मिलकर प्रेम एवं भाईचारे के साथ मिलजुल कर रहते थे। ऐसा इतिहास इंडस वैली (सिन्धु घाटी) की सभ्यता का मिलता है। फिर विदेशी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य लगभग 3100 ईसा पूर्व भारत आये और उनका यहाँ के मूलनिवासियो के साथ संघर्ष हुआ।
▶ वैदिक काल (1500-600BC)
यूरेशियन लोग (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) साम, दाम, दंड एवं भेद की नीत से किसी तरह संघर्ष में जीत गए। परन्तु युरेशियनों की समस्या थी कि बहुसंख्यक मूलनिवासी लोगों को हमेशा के लिए नियंत्रित कैसे रखा जाए। इसलिए उन्होंने मूलनिवासियो को पहले वात्य-स्तोम (धर्म परिवर्तन) करवाके अपने धर्म में जोड़ा। फिर युरेशियनों ने मूलनिवासियों को नीच साबित करने के लिए वर्ण व्यवस्था स्थापित की, जिसमें मूलनिवासियों को चौथे वर्ण शूद्र मे रख दिया। समय के साथ यूरेशियन ब्राह्मण, क्षत्रिय और विषयों ने मूलनिवासियों को वर्ण पर आधारित कानून बना कर शिक्षा (ज्ञान बल), अस्त्र-शस्त्र रखने (शस्त्र बल), और संपति(धन बल) के अधिकार से वंचित कर दिया। इस नियम को ऋग वेद मे डालकर और ऋग वेद को ईश्वरीकृत घोषित कर दिया और इस तरह बहुसंख्यक आबादी को (ज्ञान बल), अस्त्र-शस्त्र रखने (शस्त्र बल), और संपति रखने (धन बल), के अधिकार से वंचित कर मानसिक रूप से गुलाम और लाचार बना दिया। इसे वैदिक संस्कृति, आश्रम संस्कृति या ब्राह्मण संस्कृति कहते है जो श्रेणी बद्ध असमानता का सिधांत पर समाज को चारो वर्णो मे विभक्त करती है।
▶तथागत गौतम बुद्ध (श्रमण संस्कृति का उत्थान) 563 BC-483BC
तथागत बुद्ध ने वैदिक संस्कृति के विरुद्ध आंदोलन किया और अनित्य, अनात्म एवं दुख का दर्शन देकर वेद के “ईश्वरी कृत” होने और “आत्मा” के सिधान्त को चुनौती दी। उन्होने वैदिक संस्कृत के “जन्मना सिधान्त” को नकार “कर्मणा सिधान्त” का प्रतिपादन किया और वर्ण व्यवस्था के सिधान्त को नकार दिया और समतावादी और मानवतावादी दर्शन का प्रचार किया। वैदिक संस्कृति के यज्ञों मे पशुओ की बली दी जाती थी। इस तरह के कर्म कांड को भी तथागत ने नकार दिया। बुद्ध के मानवीय शिक्षाओं के प्रसार के बाद ब्राह्मणों का वैदिक धर्म बुरी तरह हीन माना जाने लगा था। तथागत ने अपने पुरे जीवन को इस दर्शन को स्थापित करने मे लगाया और पुनः श्रमण संस्कृत को स्थापित किया। जोकि मूलनिवासियों की संस्कृति थी। तब भारतीय इतिहास का सम्राट अशोक का स्वर्ण काल आया।

▶प्रथम बौद्ध संगीति’ का आयोजन (483BC)
‘प्रथम बौद्ध संगीति’ का आयोजन 483 ई.पू. में राजगृह (आधुनिक राजगिरि), बिहार की ‘सप्तपर्णि गुफ़ा’ में किया गया था। तथागत गौतम बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद ही इस संगीति का आयोजन हुआ था। इसमें बौद्ध स्थविरों (थेरों) ने भाग लिया और तथागत बुद्ध के प्रमुख शिष्य महाकाश्यप ने उसकी अध्यक्षता की। चूँकि तथागत बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं को लिपिबद्ध नहीं किया था, इसीलिए प्रथम संगीति में उनके तीन शिष्यों-‘महापण्डित महाकाश्यप’, सबसे वयोवृद्ध ‘उपालि’ तथा सबसे प्रिय शिष्य ‘आनन्द’ ने उनकी शिक्षाओं का संगायन किया।

▶द्वितीय बौद्ध संगीति (383 BC)
एक शताब्दी बाद बुद्धोपदिष्ट कुछ विनय-नियमों के सम्बन्ध में भिक्षुओं में विवाद उत्पन्न हो जाने पर वैशाली में दूसरी संगीति हुई। इस संगीति में विनय-नियमों को कठोर बनाया गया और जो बुद्धोपदिष्ट शिक्षाएँ अलिखित रूप में प्रचलित थीं, उनमें संशोधन किया गया।

▶तृतीय बौद्ध संगीति (249 BC)
बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार बुद्ध के परिनिर्वाण के 236 वर्ष बाद सम्राट अशोक के संरक्षण में तृतीय संगीति 249 ईसा पूर्व में पाटलीपुत्र में हुई थी। इसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ ‘कथावत्थु’ के रचयिता तिस्स मोग्गलीपुत्र ने की थी। विश्वास किया जाता है कि इस संगीति में त्रिपिटक को अन्तिम रूप प्रदान किया गया। यदि इसे सही मान लिया जाए कि अशोक ने अपना सारनाथ वाला स्तम्भ लेख इस संगीति के बाद उत्कीर्ण कराया था, तब यह मानना उचित होगा, कि इस संगीति के निर्णयों को इतने अधिक बौद्ध भिक्षु-भिक्षुणियों ने स्वीकार नहीं किया कि अशोक को धमकी देनी पड़ी कि संघ में फूट डालने वालों को कड़ा दण्ड दिया जायेगा।

▶चतुर्थ बौद्ध संगीति
चतुर्थ और अंतिम बौद्ध संगीति कुषाण सम्राट कनिष्क के शासनकाल (लगभग 120-144 ई.) में हुई। यह संगीति कश्मीर के ‘कुण्डल वन’ में आयोजित की गई थी। इस संगीति के अध्यक्ष वसुमित्र एवं उपाध्यक्ष अश्वघोष थे। अश्वघोष कनिष्क का राजकवि था। इसी संगीति में बौद्ध धर्म दो शाखाओं हीनयान और महायान में विभाजित हो गया।

     हुएनसांग के मतानुसार सम्राट कनिष्क की संरक्षता तथा आदेशानुसार इस संगीति में 500 बौद्ध विद्वानों ने भाग लिया और त्रिपिटक का पुन: संकलन व संस्करण हुआ। इसके समय से बौद्ध ग्रंथों के लिए पाली भाषा का प्रयोग हुआ और महायान बौद्ध संप्रदाय का भी प्रादुर्भाव हुआ। इस संगीति में नागार्जुन भी शामिल हुए थे। इसी संगीति में तीनों पिटकों पर टीकायें लिखी गईं, जिनको ‘महाविभाषा’ नाम की पुस्तक में संकलित किया गया। इस पुस्तक को बौद्ध धर्म का ‘विश्वकोष’ भी कहा जाता है।

     सम्राट अशोक प्राचीन भारत के मौर्य सम्राट बिंदुसार का पुत्र था और चंद्रगुप्त का पौत्र था । जिसका जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में चैत्र शुक्ल अष्टमी को माना जाता है। 272 ईसा पूर्व अशोक को राजगद्दी मिली और 232 ई. पूर्व तक उसने शासन किया। अशोक ने 40 वर्ष राज्य किया। चंद्रगुप्त की सैनिक प्रसार की नीति ने वह स्थायी सफलता नहीं प्राप्त की, जो अशोक की धम्म विजय ने की थी। कलिंग के युद्ध के बाद अशोक ने व्यक्तिगत रूप से बौद्ध धर्म अपना लिया। अशोक के शासनकाल में ही पाटलिपुत्र में तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोगाली पुत्र तिष्या ने की। इसी में अभिधम्मपिटक की रचना हुई और बौद्ध भिक्षु विभिन्नी देशों में भेजे गये जिनमें अशोक के पुत्र महेन्द्र एवं पुत्री संघमित्रा को श्रीलंका भेजा गया । बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के फ़लस्वरुप अशोक द्वारा यज्ञों पर रोक लगा दिये जाने के बाद यूरेशियन ब्राह्मणों ने “पुरोहित का कर्म त्यागकर” सैनिक वृति को अपना लिया था। पुष्यमित्र शुंग नाम के एक ब्राह्मण ने घुसपैठ करके मौर्य वंश के 10 वे उत्तराधिकारी “वृहदत्त” का सेनापति बनकर एक दिन सेना का निरिक्षण करते समय धोखे से उसका कत्ल कर दिया। उसने ‘सेनानी’ की उपाधि धारण की थी। दीर्घकाल तक मौर्यों की सेना का सेनापति होने के कारण पुष्यमित्र इसी रुप में विख्यात था तथा राजा बन जाने के बाद भी उसने अपनी यह उपाधि बनाये रखी। शुंग काल में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान हुआ तथा मनुस्मृति के वर्तमान स्वरुप की रचना इसी समय में हुई। वैदिक धर्म एवं आदेशों की जो अशोक के शासनकाल में अपेक्षित हो गये थे को पुनः कठोरता से लागू किया। इसी कारण इसका काल वैदिक प्रतिक्रांति अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल कहलाता। पुष्यमित्र शुंग ने घोषणा किया जो बुद्धिस्ट भिख्खु (Monk) का सिर लाकर देगा वो उसे 100 सोने की सिक्के देगा। बहुत कत्ले आम हुआ।

श्रमण संस्कृत के मानने वाले चार वर्ग मे विभक्त हो गए —
1. जो उनकी अधीनता स्वीकार कर लिए वो सछूत शूद्र बने अर्थात आज का ओबीसीOBC
2. जो लड़ाई से दूर जंगल और पहाड़ मे चले गए अर्थात आज का अनुसूचित जन जाति ST
3. जो ब्राह्मणवाद के सामने नहीं झुका वो है आज का अछूत शूद्र अर्थात अनुसूचित जाति SC
4. जो आज भी ब्राह्मणवाद के आगे नहीं झुके है और जंगलों में रहते है अर्थात आदिवासी

     मनुस्मृति की रचना के बाद ब्राह्मणों ने एक बहुत बड़ा जातिप्रथा नाम का षड्यंत्र रचा और फिर इस बार मूलनिवासियों (SC, ST, OBC ) को 6743 जतियों/टुकडो में तोड़ कर जन बल से भी वंचित कर दिया गया। ऐसा तंत्र तैयार किया गया कि इसको तोड़ना अत्यंत कठिन रहे। और उनमे श्रेणीबध असमानता का सिधांत अर्थात जातिव्यवस्था का सिधांत, लागु किया और उनको धर्म, वेदों एवं शास्त्रों के माध्यम से मानसिक रूप से गुलाम बनाया।

     उसके बाद समय समय पर ब्राह्मणों ने बहुत से धर्म शास्त्रों की रचना करके जो अंधश्रधा और अन्धविश्वास पर आधारित है लिखे और उनको मूलनिवासियों पर जबरदस्ती धर्म के नाम पर थोप दिया। इस प्रकार हम देखते है कि धर्म ही मूलनिवासियों की गुलामी का मुख्य आधार है यही वो षड्यंत्र है जिसके कारण आज भी मिल्निवासी मानसिक तौर से गुलाम है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आज भी इसी षड्यंत्र के माध्यम से देश पर राज कर रहे है।

     इतिहास में हजारों मूलनिवासी महापुरुष हुए जिन्होंने मानवता पर आधारित मानव जीवन की शिक्षा दी, लेकिन किसी भी महापुरुष ने ना तो कोई धर्म बनाया और ना ही किसी धर्म की कभी बात की। हमारे महापुरुष जानते थे कि धर्म का सही अर्थ सिर्फ शोषण है। रविदास, नानक, कबीर, ज्योति राव फुले, नारायण गुरु, पेरियार, सावित्री बाई फुले और बाबा साहब भीम राव अम्बेडकर ने कोई भी धर्म नहीं बनाया। महापुरुष जानते थे कि अगर हम कोई धर्म बनाते है तो यह वही बात हो जायेगी कि लोगों को एक अंधे कुए से निकल कर दूसरे अंधे कुए में धकेल देना। कोई भी महापुरुष मूलनिवासी लोगों को अंधश्रधा और अविश्वास के कुए में नहीं धकेलना चाहता था। बाबा साहब ने अपने जीवन काल में धर्म का त्याग करके धम्म को अपनाया क्योकि बाबा साहब जानते थे कि आडम्बरों, पाखंडों और ढोंगों पर आधारित धर्मों से कभी भी मूलनिवासियों का भला नहीं हो सकता। इसीलिए बाबा साहब ने धर्म छोड़ कर बुद्धि और तर्क पर आधारित धम्म को अपने का सन्देश दिया।

     सभी मूलनिवासियों से प्रार्थना है कि धर्म का त्याग करे और धम्म को अपनाये। शायद कुछ लोग यहाँ तर्क भी करेंगे कि हम धम्म को ही क्यों अपनाये तो उन लोगों से प्रार्थना है कि फालतू में सोच कर या तर्क करके अपना समय और उर्जा खर्च ना करे। आप सभी को ज्ञात ही है कि जब तक हम ब्राह्मण निर्मित धर्म में रहेंगे हम शुद्र, नीच आदि कहलाते रहेंगे। आप सभी धर्म को छोड़ दे और मानवीय मूल्यों के आधार पर जीवन जीना शुरू कर दे। जब आप सभी लोग धर्म को त्याग कर मानवीय मूल्यों पर आधारित जीवन जीना शुरू करेंगे तो निश्चय ही देश के मूलनिवासियों का भला ही होगा।