कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 45० ० ०'अनाधिकार' हिन्दी और संस्कृत में कोई शब्द ही नहीं है, फिर भी इसका प्रयोग जमकर होता है। आप कहीं भी लिखादेख सकते हैं - अनाधिकार प्रवेश निषेध। इस भाग में हमविलोम (विपरीत यानी उल्टा अर्थ वाले शब्द; विपरीतार्थक शब्द; अंग्रेज़ी में एंटोनिम) शब्दों और हिन्दी के कई उपसर्गों पर चर्चा करेंगे।हिन्दी में आने वाले जो शब्द स्वर वर्ण से शुरू होते हैं (मुख्य रूप से संस्कृत के शब्द) , उनमें कई बार 'अन्' जोड़कर विलोम बनाया जाता है, जैसे अनिच्छा (अन्+ इच्छा), अनुदार (अन् + उदार), अनन्त (अन् + अन्त), अनन्तिम (अन् + अन्तिम), अनधिकार (अन् + अधिकार), अनुपमा (अन् + उपमा), अनुपयोगी (अन् + उपयोगी), अनेक (अन् + एक), अनीश्वरवादी (अन् + ईश्वरवादी), अनाचार (अन् + आचार), अनूह (अन् + ऊह), अनैच्छिक (अन् + ऐच्छिक), अनौपचारिक (अन् + औपचारिक), अनृत (अन् + ऋत) आदि। 'अनधिकार' को 'अन्-धिकार' न पढ़कर, 'अनधि-कार' पढ़ना चाहिए। 'न' का पूरा उच्चारण (अ के साथ) होना चाहिए। यह ध्यान रखना चाहिए कि किसी आधे व्यंजन में स्वर वर्ण मिलने पर संगत मात्रा जुड़ जाती है, जैसे क् में आग के मिलने पर काग होगा, द् में ओना मिलने पर दोना बनेगा। द (पूरा अ मिला द) में ओना मिलने से दोना नहीं, दौना बनेगा; इसी कारण अन् में अधिकार के मिलने पर अनधिकार बनता है, न कि अनाधिकार।संस्कृत से हिन्दी में आए उस शब्द में, जो व्यंजन से शुरू होता है; 'अ' या दूसरा उपसर्ग लगाकर विलोम बनाया जाता है, जैसे शुद्ध से अशुद्ध, ज्ञात से अज्ञात आदि। अनमोल, अनगिनत, अनपढ़, अनहित (अहित शब्द होना चाहिए, लेकिन यह भी चलन में है), अनजान आदि में 'अन' उपसर्ग लगा है, 'अन्' नहीं। अनजान को अंजान नहीं लिखा जाना चाहिए।एक शब्द 'अभिज्ञ' है, जिसे 'भिज्ञ' का विलोम मान लिया जाता है, 'भिज्ञ' शब्द हिन्दी में है ही नहीं। मूल शब्द 'अभिज्ञ' है, जिसका विलोम 'अनभिज्ञ' ('अभिज्ञ' में 'अन्' जोड़ने से बना) होता है। यह भी दिलचस्प है कि 'असुर' का मूल अर्थ 'राक्षस' नहीं, 'देवता' था, लेकिन अब यह 'सुर' के विलोम के रूप में ही माना और समझा जाता है।शब्दों के विलोम कई प्रकार से बनते हैं। लिंग बदल कर, जैसे माता से पिता, बेटा से बेटी, गाय से बैल और भिन्न शब्द द्वारा, जैसे लाभ से हानि, उत्थान से पतन, कृष्ण से शुक्ल आदि विलोम शब्द बनते हैं।विलोम बनाने का एक तरीका उपसर्ग जोड़ना है। अब हम विलोम बनाने वाले उपसर्गों पर नज़र डालते हैं।1) अप - इसका प्रयोग बुरा, हीन, अभाव, छोटा या लघु, विरुद्ध आदि के अर्थ में होता है। यश से अपयश, मान से अपमान आदि इसके प्रयोग से बने विलोम के उदाहरण हैं। अपहरण, अपकार, अपव्यय, अपवाद आदि इससे बने कुछ और शब्दहैं।2) अव- अनादर, हीनता, पतन या नीचे के अर्थ वाला यह उपसर्ग रोह से अवरोह, मानना से अवमानना, मूल्यन से अवमूल्यन जैसे शब्द बनाता है। इसकी जगह 'औ' भी मिलता है कई बार, जैसे औढर।3) आ- यह सीमा, समेत, ओर, विपरीत, कमी या तक का अर्थ देता है। गमन से आगमन इसके कारण बनता है। आजन्म, आजीवन, आमरण आदि शब्द इससे बने हैं। आजन्म, आमरण और आजीवन, तीनों एक ही भाव बताते हैं।4) दुर् और दुस्- दुर्गम, दुर्जेय, दुर्दशा, दुर्लभ, दुष्कर्म, दुर्गुण आदि इनके उदाहरण हैं। बुरा, कठिन, दुष्ट, हीन आदि इन उपसर्गों के अर्थ हैं। दुष्, दुश् और दु भी इसी तरह के उपसर्ग हैं। वास्तव में दुस् के दो अन्य रूप दुष् और दुश् हैं।5) निर् और निस्- निषेध या बाहर का अर्थ देने वाले ये उपसर्ग निर्भय, निष्फल, निष्काम, निस्सहाय, निस्संकोच, निर्दोष, निरपराध, निर्मल जैसे शब्द बनाते हैं। इनकी जगह 'नि' भी कई बार आता है, जैसे निढाल,निकम्मा आदि। निष् और निश् भी निस् के ही रूप हैं।6) वि- यह विशेषता, हीनता, भिन्नता, असमानता आदि का अर्थ देता है। विदेश, विस्मरण, वियोग, विमुख आदि इससे बने विलोमों के उदाहरण हैं। ज्ञान, शुद्ध, वाद, भाग, नाश, भिन्न आदि से बने विज्ञान, विशुद्ध, विवाद, विभाग,विनाश, विभिन्न जैसे शब्द मूल शब्द को विशेष अर्थ देते हैं।7) अ- अथाह, अज्ञात, अशान्त, अनाम आदि बनाने वाला यह उपसर्ग अभाव या निषेध का अर्थ देता है।8) अन- अनपढ़, अनजान, अनमोल, अनबीता जैसे शब्द बनाने वाला यह उपसर्ग भी निषेध या अभाव का अर्थ देता है। यह ध्यान रहे कि अन और अन् दोनों अलग अलग हैं।9) कु- बुराई या हीनता के अर्थ का यह उपसर्ग कुपुत्र, कुमार्ग, कुपात्र, कुरूप जैसे शब्द बनाता है। कई बार इसकी जगह 'क' भी होता है, जैसे कपूत।10) बिन- अभाव का अर्थ देने वाला यह उपसर्ग बिनदेखा, बिनब्याहा जैसे शब्दों में देखा जा सकता है।11) न- नास्तिक, नपुंसक, नग जैसे शब्द बनाने वाला यह उपसर्ग अभाव और निषेध का अर्थ रखता है।12) ग़ैर- निषेध या विरोध के अर्थ वाला यह उपसर्ग ग़ैरकानूनी, ग़ैरसरकारी, ग़ैरवाजिब जैसे शब्द बनाता है।13) ना- नहीं या अभाव के अर्थ वाले इस उपसर्ग से नालायक, नामुमकिन, नाराज, नापसन्द, नाचीज जैसे शब्द बनते हैं।14) बद- बदनाम, बदकिस्मत, बदबू, बदहजमी, बदसूरत जैसे शब्द बनाने वाला यह उपसर्ग 'बुरा' अर्थ देता है।15) बे- इसका अर्थ बिना है और इससे बेईमान, बेइज्जत, बेरहम, बेतरह जैसे शब्द बनते हैं।16) ला- इसका अर्थ भी बिना है। लाइलाज, लाजवाब, लावारिस, लापरवाह, लापता जैसे शब्द इससे बनते हैं।17) बिला- यह भी 'बिना' के अर्थ का शब्द बनाता है, जैसे बिलाशक।18) अन- यह अंग्रेज़ी के शब्दों में जोड़ा जाता है। अनफ़िट, अनबैलेंस जैसे शब्द इससे बनते हैं।19) नन- यह भी अंग्रेज़ी का ही उपसर्ग है और ननमैट्रिक, ननसेंस, ननटेक्निकल जैसे शब्द बनाता है। इल, इर, इम, ए आदि भी इसी तरह के उपसर्ग माने जा सकते हैं।20) परा- उल्टा, अनादर, नाश, अधिक आदि के अर्थ के इस उपसर्ग से पराजय जैसे शब्द बनते हैं।21) प्रति- प्रत्येक, बदले में, विरोध, बराबरी, परिवर्तन आदि के अर्थ के इस उपसर्ग से प्रतिकार, प्रतिक्रिया, प्रतियोगिता, प्रतिवाद, प्रतिदान आदि बनते हैं।अ, अन, क और बिन हिन्दी के अपने उपसर्ग हैं, जबकि ना, बद और बे फ़ारसी के। ग़ैर, बिला और ला अरबी के उपसर्ग हैं। अन, नन आदि अंग्रेज़ी के उपसर्ग हैं। निर्, निस्,वि आदि संस्कृत के उपसर्ग हैं। इन सबका प्रयोग हिन्दी में होता है।कई बार उपसर्गों को बदलने से विलोम बनता है, जैसे आदान से प्रदान, सुलभ से दुर्लभ, आयात से निर्यात, संयोग से वियोग आदि।शब्दों के अन्त में प्रत्यय जोड़कर भी विलोम शब्द बनाया जाता है। हीन, शून्य, रहित, लेस आदि प्रत्ययों के प्रयोग से बने विलोम शब्द बुद्धिहीन, गंधहीन, रंगहीन, स्वादहीन, विवेकशून्य, बैकलेस, आदि हैं।केन्द्राभिगामी का विलोम केन्द्रापसारी है। 'बेफजूल', 'निखालिस', 'बेवाहियात' जैसे शब्दों में उपसर्गों का चुनाव ग़लत है। फजूल, खालिस, वाहियात शब्द बिना उपसर्ग के ही अपने अर्थ स्पष्ट करते हैं। 'बेजिम्मेदार' की जगह 'ग़ैरज़िम्मेदार' होना चाहिए।० ० ०जारी...
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