गुरुवार, 21 जनवरी 2016

शम्भुक्

मैं शंबूक बोल रहा हूँ ...
सुनिए , मैं शंबूक बोल रहा हूँ , जी हाँ ! वही शुद्र
शंबूक जिसकी कहानी आपने बाल्मीकि रामायण के
उत्तरकाण्ड के सर्ग 85 में पढ़ी होगी । आप सोच
रहे होंगे की मरने के हजारो साल बाद मैं
यंहा क्या कर रहा हूँ ?
वैसे मेरे असली माता पिता कौन थे इसके बारे में
मुझे स्वयं भी ठीक से याद नहीं ,पर कहा जाताहै
की ( आनंद रामायण और रंगनाथ रामायण के
अनुसार ) मेरी माता का नाम
शुपर्णखा ( स्वरुपनी या चंद्र्नाखा) था ,
जिसकी नाक काट के लक्ष्मण ने अपमानित
किया था ।
मेरे बारे में किसी को कुछ ज्ञात नहीं था पर
जब एक ब्रह्मण ने अपने पुत्र के मर जाने पर
राम को दोषी ठहराया और कहा की उन्होंने अपने
राजा होने का कर्तव्य ठीक से नहीं निभाया ।
क्यों की राम राज्य में पिता के रहते पुत्र की मृत्यु
नहीं हो सकती थी , इसलिए अपने पुत्र की मृत्यु
का सार दोष उसने राम पर डाल दिया।
अत: ऋषि वशिष्ट के कहने पर इस मामले में सलाह
देने के लिए राज्य के प्रमुख आठ ब्रह्मणों का एक
समिति बनायीं गयी , जिसने बड़े सोच विचार के ये
निर्णय दिया की राज्य में किसी शुद्र के
तपस्या करने के कारण ब्रह्मण के पुत्र की मृत्यु
हुयी है( वा . र. उ. सर्ग 87) ।
सारे राज्य में बहुत गहनखोज बीन की गयी और
आखिर में शिवालिक की पहाड़ियों की तराई में के
झील के किनारे एक वृक्ष के नीचे शीर्षासन से तप
करता हुआ राम के सैनिको  को मैं मिला ,
उन्होंने बिना देरी किये राम को बुलाया । राम
ने मुझ से मेरा परिचय पुछा , मैंने बिना कुछ छुपाये
उन्हें अपने शूद्र होने के बारे में बताया ।
मेरी जाती सुनते ही बिना देरी किये राम ने
अपनी चमकती हुयी और तेज तलवार निकाल के
मेरा सरधड से अलग कर दिया ।
ये दृश्य देख कर देवतागण आकाश से पुष्प वर्षा करने
लगे , आखिर राम की कृपया से एक शूद्र स्वर्ग जाने
से रोक लिया गया । इस "महान" कार्य के लिए
अगस्त्य ने राम को पुरष्कार स्वरूप
विश्वकर्मा रचित आभूषण दिया ( उ. कांड , सर्ग
89)
ऐसा नहीं था की मुझे ज्ञात नहीं था की मैं
( शूद्र) तप नहीं कर सकता था , मुझे ज्ञात
था फिर भी मैंने शांति पूर्वक तथा अहिंसक मार्ग
द्वारा तप , शिक्षा , ज्ञान प्राप्त करने के उन
नियमो का विरोध किया जिस पर केवल ब्राह्मण
और सवर्णों का एका अधिकार था और इसके
परिणामो को भुगतने के लिए भी मैं तैयार था ,
तभी मैंने राम से कुछ नहीं छुपाया था ।
मैं देखना चाहता था की जिस राम के "न्याय" और
'उदारता" के गुण सारे राज्य में गए जा रहे थे
वो कितना न्यायी है ? क्या वो उन गलत
नियमो को बदल सकता है जिसको एक वर्ग ने
अपनी मर्जी से समाज पर थोपा था? नहीं, शायद
राम में भी उस"ब्राह्मणवाद" के खिलाफ जाने
की शक्ति नहीं थी ।उन्हें डर था उनका हाल
भी उनके पूर्वज"त्रिशंकु " जैसा न हो जाये और
उन्हें भी राज्य से हाथ धोना पड़ जाये ।
यंहा तक की नारद ने
भी मेरी हत्या को न्यायोचित बताया उन्होंने
कहा की " अन्य वर्णों की सेवा ही शूद्र के लिए
श्रेष्ठ धर्म है ( वाल्मीकि रामयण , उत्तर कांड ,
सर्ग 87)
निरंकुश और सर्व सत्तावादी शासन में
भी अपराधी को अपनी सफाई मेंकुछ कहने
का या अपराध स्वीकार और क्षमा मांगने का एक
अवसर अवश्य दिया जाता है पर मुझ जैसे शूद्र को ये
मूलभूत अधिकार भी नहीं था , धन्य था ऐसा राम
राज और उसी राम राज्य की आज भी कल्पना करने
वाले ।
अच्छा, आज बस यहीं विराम लेता हूँ ,आप
सभी को एक बार फिर से प्रणाम॥
शंबूक

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