सोमवार, 1 फ़रवरी 2016

कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-48

पूज्यनीय हिन्दी या संस्कृत में कोई शब्द नहीं है, लेकिन इसका प्रयोग अक्सर लोग कर देते हैं। या तो पूज्य कहा जा सकता है या फिर पूजनीय! पूज्यनीय में एक साथ समान अर्थ देने वाले दो प्रत्यय लगा दिया गए हैं, जो अनुचित है। ऐसा ही मान्यनीय के साथ है। मान्य या माननीय हो सकता है, मान्यनीय नहीं। पूजा से पूज्य, पाठसे पाठ्य, काट से काट्य, खाना से खाद्य, बजाना से वाद्यआदि बनते हैं।अनीय (संस्कृत में अनीयर्) एक प्रत्यय है और पठनीय, दर्शनीय, स्मरणीय, अनुकरणीय, स्थानीय जैसे शब्द बनाताहै। यह ज़रूर ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्यय शब्द के अन्त में तो लगते ही हैं, वे शब्द में कुछ दूसरे बदलाव(जैसे पहले वर्ण में) भी कर सकते हैं। हिन्दी में 200 से अधिक प्रत्यय हैं। इनमें कुछ संस्कृत के, कुछ फ़ारसी के, कुछ अरबी के और कुछ अंग्रेज़ी के हैं। इनके अतिरिक्त सैकड़ों शब्द ऐसे हैं, जो किसी दूसरे शब्द के अन्त में लगकर नया शब्द बनाते हैं और अर्थ परिवर्तन करते हैं। अंग्रेज़ी में भी बहुत से प्रत्यय (सफ़िक्स - suffix) हैं, जैसे नेस (ness), लेस (less), इङ्ग (ing), एड (ed), फुल (ful), हूड (hood), इकल (ical) आदि।हम यहाँ सबपर विस्तृत चर्चा नहीं करेंगे।ता प्रत्यय लगाने से सुन्दर सुन्दरता में, सम समता में, निर्धन निर्धनता में बदल जाता है। सुन्दरता, समता और निर्धनता आदि के लिए सौन्दर्य, साम्य, नैर्धन्य जैसे शब्द भी हैं। ऐसे शब्दों की संख्या हिन्दी में काफी है। हमने पहले ही विस्तार से इक प्रत्यय पर चर्चा की है। अ या आ सम्बन्ध आ से; इ या ई का सम्बन्ध ए, ऐ और य् से; उ या ऊ का सम्बन्ध ओ, औ और व् से तथा ऋ का सम्बन्ध अर् और र् से ह। यह इतनी महत्त्वपूर्ण बात है कि संस्कृत सीखनी हो, तो यह आपकीमेहनत को बहुत कम कर सकती है और हिन्दी में हज़ारों शब्दों की संरचना, अर्थ और रूप को स्पष्ट कर सकती है। इस सूत्र को हम शब्दों के निर्माण में कैसे लागू करेंगे, इसके कुछ उदाहरण देखते हैं -सुन्दर के पहले वर्ण में उकार है, इसे सौ (उ का सम्बन्ध औ से है) बनाकर सौन्दर शब्द बनाते हैं। अगले चरण में अन्तिम वर्ण को आधा कर उसमें य जोड़ते हैं। इस तरह सौन्दर्य शब्द बन जाता है। यह सुन्दरता का समानार्थी (समान अर्थ वाला) है।विषम में इकार है, तो वि को वै (इ का सम्बन्ध ऐ से है) बनाते हैं, फिर अन्तिम वर्ण म को म् बनाकर य जोड़ते हैं और इस तरह वैषम्य शब्द बनता है।धीर, सुजन, एक, अधिक, दरिद्र, उदार, विविध, भाषा आदि से क्रमशः धैर्य, सौजन्य, ऐक्य, आधिक्य, दारिद्र्य, औदार्य, वैविध्य, भाष्य आदि इसी तरह बनते हैं। पाश्चात्य, शौर्य, आर्य, मान्य, त्याज्य, पाठ्य, धार्य, आचार्य जैसे शब्दों में भी हम उपरोक्त सूत्र को लागू होते हुए देख सकते हैं।संस्कृत की शरण में चलकर कुछ उदाहरण देखते हैं। लिख् से लेखक या लेखन, दृश् से दर्शक, कृ से कारक, स्मृ से स्मारक, वच् से वाचक या वाचिका, पठ् से पाठक या पाठिका आदि बनते हैं। दृश् से द्रष्टा, नी (ले जाने) से नेता, श्रु से श्रोता, हृ से हरण, चि से चयन, श्रु से श्रवण,बुध् से बोध आदि में भी हम इस सूत्र को पा सकते हैं।रघु से बने राघव, गुरु से बने गौरव, लघु से बने लाघव, पाण्डु से बने पाण्डव, यदु से बने यादव, मधु से बने माधव, मनु से बने मानव, कुरु से बने कौरव आदि में हम देखते हैं कि शुरू के वर्ण के साथ ही अन्तिम वर्ण में भी उपरोक्त सूत्र के अनुसार बदलाव हो रहा है। कुन्ती से बना कौन्तेय हो या बुद्ध से बना बौद्ध, पृथा से बनापार्थ हो या पुत्र से बना पौत्र, शिव से बना शैव हो या व्याकरण से बना वैयाकरण, इन्द्र से बना ऐन्द्र हो या विष्णु से बना वैष्णव; हम हर जगह सूत्र को काम करते हुए देखते हैं। वसुदेव, कश्यप, भरत, मगध, मथुरा, मिथिला, शिशु, भरद्वाज आदि से बने वासुदेव, काश्यप, भारत, मागध, माथुर, मैथिल, शैशव, भारद्वाज आदि भी इस सूत्र के अनुसार बने हैं। इनमें संतान या 'से सम्बन्धित' का अर्थ मिलता है। भरत की संतान भारत या कुरु की संतान कौरव होगी। महाभारत में पाण्डव भी कौरव (कुरु वंश के कारण) ही हैं, लेकिन धृतराष्ट्र के पुत्रों के लिए कौरव शब्द स्थिर कर लिया गया है। सिंधु, पशु, वस्तु आदि से बने सैंधव, पाशविक, वास्तव, वास्तविक आदि भी उ से व बनने के नियम की पुष्टि करते हैं। पंडित, पुरुष आदि से बने पांडित्य, पौरुष आदि भी सूत्र के प्रयोग उदाहरण हैं।तर, तम, आलु, इष्ठ, इमा, त्व, दा, था, आनी आदि प्रत्यय उच्चतर, निकटतम, महत्तम, लघुतम, दयालु, कृपालु, गरिष्ठ, कनिष्ठ, महिमा, गरिमा, लघुत्व, महत्त्व, यदा, सर्वदा, सर्वथा, तथा, रुद्राणी, इन्द्राणी, भवानी आदि बनाते हैं। लघुतम को लघुत्तम और महत्तम को महतम नहीं कहा जासकता। महत् शब्द में त् होने से वह महत्तम, महत्ता और महत्त्व बनाता है; जबकि लघु बिना त के द्वित्व के लघुत्व, लघुतम, लघुता आदि बनाता है। महती में त का द्वित्व नहीं होता।वान् या मान् को जोड़ने का नियम स्पष्ट है। शब्द के अन्त में इ, ई, उ, ऊ और ऋ की मात्रा रहने पर मान् लगता हैऔर अ या आ रहने पर वान् लगता है। बुद्धि, श्री, अंशु, मातृ आदि से बुद्धिवान्, श्रीवान्, अंशुवान्, मातृवान् नहीं बना सकते। बुद्धिमान्, श्रीमान्, अंशुमान्, मातृमान्, शक्तिमान् आदि शब्दों का निर्माण उचित है। श्रद्धा, भग, बल, रूप, गुण, धन, दया, ज्ञान आदि के अन्त में अकार या आकार होने से इनमें वान् जोड़ेंगे, न कि मान्। रूपवती, पुत्रवती, गुणवत्ता, अर्थवत्ता आदि शब्दों में भी यह नियम लागू होता है। वान् का नियम वती, वत्ता आदि पर भी लागू होताहै। मान् का नियम मत्ता, मती आदि के लिए भी सही है। श्रीमती, बुद्धिमत्ता, शक्तिमत्ता आदि इसके उदाहरण हैं। मान् या वान् का अर्थ 'वाला' है, जैसे धनवान् का अर्थ धन वाला या शक्तिमान् का अर्थ शक्ति वाला है। विद्यमान् संस्कृत की क्रिया से बना है और इस कारण वहअपवाद जैसा है। आयुष्मान् और आयुष्मती भी इसी तरह अपवाद जैसे हैं। प्रमाण या परिमाण को मान् से नहीं जोड़ सकते। इनमें मान है, मान् नहीं। लोकभाषा भोजपुरी में फूलमती जैसे नाम भी मिलते हैं। मधुमती नाम से दिलीप कुमार की फ़िल्म भी है। रमावती, कलावती, सत्यवती जैसे शब्द भी मिलते हैं।आगार से मिलकर शस्त्र, कारा, कोश आदि शस्त्रागार, कारागार, कोशागार आदि बनाते हैं।इत प्रत्यय लगाने पर शब्द के पहले वर्ण में कोई परिवर्तन नहीं होता, जबकि इक लगाने पर पहले वर्ण की मात्रा बदलती है। परिभाषा से पारिभाषिक और परिभाषित बनेंगे, लेकिन परिभाषिक और पारिभाषित नहीं बन सकते। इत संस्कृत के शब्दों में ही लगता हैं।तव्य की मदद से कर्तव्य, गन्तव्य, वक्तव्य, द्रष्टव्य,ज्ञातव्य आदि बनेंगे। तव्य 'के योग्य' या 'चाहिए' का अर्थ देता है।

कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-47

अंतर्राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय में अर्थभेद है, लेकिन पहले शब्द का प्रयोग ही अधिक प्रचलित है। हम पहले भी अंतः और अंतर के अर्थ और उसके प्रभाव पर बात कर चुके हैं, इसलिए यहाँ थोड़े शब्दों में कह कर आगे बढ़ते हैं। अंतर दो या अधिक के बीच में होना चाहिए, जबकि अंतः (अंतर्) एक के ही अंदर का अर्थ देता है, जैसेअंतरदेशीय का अर्थ दो या अधिक देशों के बीच से होना चाहिए और अंतर्देशीय का अर्थ एक ही देश के अन्दर होनाचाहिए। वैसे अंतर्देशीय (पत्र के लिए इसका प्रयोग होता था) अब बीते दिनों की बात हो चुका है।हिन्दी में ऐसे कई शब्द (या शब्दखंड) हैं, जो उपसर्ग नहीं हैं, लेकिन उपसर्ग की तरह शब्द बनाते हैं। अंतर्(अंतः) और अंतर भी इसी प्रकार के शब्द हैं। हम अब ऐसे ही कुछ शब्दों पर एक नज़र डालते हैं।अंतः- अपने में, मध्य या भीतर का अर्थ देता है। इससे बने शब्द अंतःकोण, अंतर्गत, अंतर्जातीय, अंतर्निहित, अंतस्तल, अन्तःप्रेरणा आदि हैं।अधः- अधो या अधः का अर्थ नीचे है। अधोलिखित, अधोवस्त्र, अधःपतन आदि इससे बने शब्द हैं।विसर्ग और उपविराम (:) में अंतर समझना ज़रूरी है। 'अधःपतन' में 'अधः' के बाद बिना स्थान छोड़े 'पतन' लिखतेहैं, जबकि 'हिन्दी : एक परिचय' में 'हिन्दी' के बाद स्थान छोड़कर उपविराम (अंग्रेज़ी में कोलोन) लगाते हैं और फिर एक अक्षर का स्थान छोड़ देते हैं। 'अंतःकरण' सही है और 'अंत :करण' या 'अंत: करण' ग़लत है। जिन शब्दों के बीच में विसर्ग आता है, उनमें विसर्ग के बाद बिना खाली स्थान छोड़े अगला वर्ण लिखना और छापना चाहिए। 'अंतः प्रेरणा', 'अधः शयन' आदि को 'अंतःप्रेरणा', 'अधःशयन' लिखना या छापना चाहिए।चिर- यह पुराना, बहुत या देर तक का अर्थ देता है और चिरकाल, चिरनिद्रा, चिरयुवा, चिरपरिचित, चिरंजीवी या चिरजीवी जैसे शब्द बनाता है।तत्- यह उसी या वही का अर्थ देता है। कहीं कहीं यह तन्या तद् में भी बदल जाता है। तत्काल, तत्कालीन, तत्पश्चात्, तद्रूप, तद्भव, तन्मय, तत्पर आदि इससे बनेशब्द हैं।पुनः- फिर के अर्थ का यह शब्द पुनर् या पुनश् में बदलता है। पुनर्विचार, पुनरावृत्ति, पुनरीक्षण, पुनरुत्थान, पुनरुद्धार, पुनर्जन्म, पुनर्जागरण, पुनर्रचना, पुनर्मुद्रण, पुनर्वास, पुनर्विवाह, पुनश्च जैसे शब्द इससे बनते हैं।पूर्व- पहले या पीछे के अर्थ का यह शब्द पूर्वज, पूर्वजन्म, पूर्वानुमान, पूर्वाभ्यास जैसे शब्द बनाता है।बहु- बहुज्ञ, बहुदर्शी, बहुभाषी, बहुपति, बहुमत, बहुमूल्य, बहुविवाह, बहुसंख्यक, बहुरूपिया, बहुपद, बहुभुज, बहुमंज़िला, बहुराष्ट्रीय, बहुउद्देशीय आदि इससे बनते हैं और बहुत या अधिक का अर्थ देते हैं।सत्- सत्कर्म, सत्संग, सच्चरित्र, सज्जन, सद्भावना, सदाचार, सद्गति, सन्मार्ग, सन्निकट जैसे शब्दों को बनाने वाला यह शब्द 'अच्छा' अर्थ देता है। इसके रूप सन् और सद् आदि भी हैं।सह- साथ के अर्थ वाले इस शब्द से सहकर्मी, सहजात, सहभागी, सहपाठी, सहयोग, सहमति, सहानुभूति, सहवास, सहोदर, सहचर आदि बनते हैं। स भी इसी अर्थ का शब्दखंड है, जो सक्रिय, सक्षम, सचेत, सजल, सजातीय, सजीव, सदेह, सपरिवार, सफल, सशस्त्र, सश्रम, सानंद जैसे शब्द बनाता है।स्व- इससे अपना, स्वयं या अपने आप के अर्थ वाले स्वदेश, स्वभाव, स्वराज्य, स्वशासन, स्वरूप, स्वचालित,स्वतंत्र, स्वावलम्बन, स्वेच्छा, स्वाधीनता आदि बनाते हैं।अर्ध (अर्द्ध)- यह आधा का अर्थ देता है और अर्धनिर्मित, अर्धवार्षिक, अर्धवृत्त, अर्द्धांगिनी जैसे शब्द बनाता है।आविः- इससे आविष्कार, आविर्भाव जैसे शब्द बनते हैं औरयह दिखाई पड़ने या बाहर होने का भाव रखता है।तिरः (तिरस्)- दिखाई नहीं पड़ना, परे होना आदि के अर्थवाले इस शब्दखंड से तिरस्कार, तिरोहित, तिरोभाव जैसे शब्द बनते हैं।पुरा- पहले के अर्थ के इस शब्द से पुरातत्त्व, पुरापाषाण, पुरालेख आदि इतिहास से सम्बन्धित शब्द बनते हैं।बहिः (बहिष्)- बाहर के अर्थ वाले बहिष्कार, बहिर्भाग, बहिर्जगत् जैसे शब्द इससे बनते हैं।सर्व- सभी के अर्थ वाले सर्वनाश, सर्वदलीय, सर्वप्रथम, सर्वभक्षी, सर्वाहारी, सर्वमान्य, सर्वशक्तिमान्, सर्वसत्तावाद आदि इससे बनते हैं।महा- अच्छा, बड़ा, महान् आदि का अर्थ रखने वाला यह शब्दखंड महात्मा, महाकवि, महादेश, महानगर, महाद्वीप, महापुरुष, महामहिम, महामंत्री, महारथी, महाराज, महाराष्ट्र, महावीर, महविद्यालय, महाडाकपाल, महाधिवक्ता आदि शब्द बनाता है। महामूर्ख, महामारी जैसे बुरे अर्थ वाले शब्द भी इससे बने हैं।स्वयं- इससे स्वयंसेवक, स्वयंवर स्वयंसिद्ध जैसे शब्द बनते हैं, जो खुद या खुदपसन्द का अर्थ रखते हैं।सूक्ष्म- बहुत छोटा का अर्थ रखने वाला यह शब्द सूक्ष्मजीव, सूक्ष्मदर्शी जैसे शब्द बनाता है।हिमपात, हिमखंड, हिमवृष्टि, हस्तकला, हस्तक्षेप, हस्तगत, हस्तरेखा, स्वर्णकार, स्वर्णपदक, स्वर्णमुद्रा, सुखकर, सुखदायक, सारहीन, सारगर्भित, समाजवाद, समाजशास्त्र, समाजसेवा, समबाहु, समतल, समकोण,समरूप, श्रमजीवी, श्रमदान, शोधकर्ता, शोधग्रंथ, शुभकामना, शुभचिंतक, शीतयुद्ध, शीतनिद्रा, शिक्षाविद्, शिक्षापद्धति, वृत्तचित्र, वृत्तखंड, विश्वकोश, विश्वयुद्ध, विचारधारा, विचारपूर्ण, वायुदाब, वायुमंडल, वायुयान, वनवासी, वनमानुष, वंशवृक्ष, वंशज, लोकसभा, लोकतंत्र, लोकप्रिय, रूपांतर,रूपवती, राष्ट्रवाद, राष्ट्रगान, राजनीति, राजतंत्र, राजमाता, रणनीति, रणभूमि, रणपोत, रंगकर्म, रंगभूमि, योगदान, योगनिद्रा, मेघनाद, मेघनाथ, मानवनिर्मित, मानवशास्त्र, मनमुटाव, मनमौजी, मनपसंद, मनोबल, मनोकामना, मनश्चिकित्सा, मतदान, मतपेटी, भूतकाल, भूतपूर्व, भूकंप, भूविज्ञान, बुद्धिजीवी, बुद्धिमत्ता, परमहंस, परमाणु, पदभार, पदच्युत, न्यायपालिका, न्यायविद्, नामकरण , नामधारी, नवजात, नवयुवती, धर्मगुरु, धर्मपत्नी, द्विखंडित, द्विपद, द्विध्रुवीय, देशद्रोह, देशवासी, देवदूत, देवनागरी, दृष्टिकोण, दृष्टिहीन, दूरगामी, दूरदर्शी, दूरभाष, दीर्घकाल, दीर्घसूत्रता, दिलदार, दिलकश, दिलफेंक, दिनकर, दिनचर्या, दरबान, दरगाह, दरकार, त्रिशंकु, त्रिभुज, तापमान, तापक्रम, जीवकोष, जीवविद्या, जनतंत्र, जनवाद, जनसंहार, चौपाया, चौपहिया, चरित्रहीन,चरित्रवान, चतुष्कोण, चतुर्भुज, गृहत्याग, गृहकार्य, गुणधर्म, गुणगान, गतिविधि, गतिशील, गणतंत्र, गणराज्य, क्षेत्रमिति, क्षेत्रफल, कीटनाशक, कीटाणु, कुलपति, कुलवधू, कार्यक्रम, कार्यकाल, कार्यकारिणी, कामचोर, कामगार, कामधेनु, कामदेव, कर्मचारी, कर्मभूमि, एकाधिक,एकाग्र, आत्मघाती, आत्मज, अग्रज, अग्रलिखित, जलमग्न, जलज, राज्यपाल, राज्यसभा आदि में हिम, हस्त, स्वर्ण, सुख, सार, समाज, सम, श्रम, शोध, शुभ, शीत, शिक्षा, वृत्त, विश्व, विचार, वायु, वन, वंश, लोक, रूप, राष्ट्र, राज, रण, राज्य, योग, मेघ, मानव, मन, मनः (मनश्, मनो) , मत, भूत, भू, बुद्धि, परम, पद, न्याय, नाम, नव, दृष्टि, दूर, दीर्घ, दिल, दिन, दर, त्रि, ताप, जीव, जन, चौ, चरित्र, चतुः (चतुष्या चतुर्), गृह, गुण, गति, क्षेत्र, कीट, कुल, कार्य, कर्म, काम, एक, गण, आत्म, अग्र, जल जैसे शब्द उपसर्गों की तरह ही आए हैं।

कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-46

शायद आपने वह चुटकुला सुना हो, जिसमें पिता अपने बच्चे को बताता है कि सु लगाने से अच्छे का बोध होता है और कु लगाने से बुरे का। एक दिन कुँअर जी को बच्चा पिता के सामने ही सुअर जी कह देता है। यह प्रयोग 60 दिनों में धाराप्रवाह 'अंग्रेज़ी बोलना सीखें' गुट केलिए हो सकता है, जो समझता है कि कोई भाषा शुद्धता और गुणवत्ता के साथ इतनी जल्दी सीखी जा सकती है! न तो घंटे भर में कोई डॉक्टर बन सकता है और न ही चार दिन में बढ़ई! भाषा पर भी बिना ध्यान और समय दिए अधिकार नहीं पाया जा सकता। हमने एक उपसर्ग के नासमझी भरे प्रयोग का उदाहरण लिया है। यहाँ हिन्दी के कई उपसर्गों पर नज़र डालते हैं।1) अति- अधिक, उस पार, ऊपर आदि के अर्थ का यह उपसर्ग अतिक्रमण, अतिरंजित, अत्यन्त, अत्याचार, अत्यधिक जैसेशब्द बनाता है।2) अधि- अधिक, बड़ा, ऊपर, स्थान में श्रेष्ठ आदि के अर्थ वाला यह उपसर्ग अधिनियम, अधिनायक, अधिग्रहण, अध्यक्ष, अध्यात्म, अधिवक्ता, अधीक्षक जैसे शब्द बनाता है।3) अनु- पीछे या बाद, छोटे, क्रम, समानता आदि के अर्थ के इस उपसर्ग से अनुसंधान, अनुशासन, अनुराग, अनुज, अनुचर, अनुदान, अनुपूरक, अनुप्रयोग, अनुरूप, अनुसूची, अनुक्रम आदि बनते हैं।4) अभि- अभयारण्य जैसे शब्द को प्रायः अभ्यारण्य लिख और बोल दिया जाता है, जो उचित नहीं है। अभि उपसर्ग अधिकता, सामीप्य (निकटता), ओर, सामने, इच्छा प्रकट करने आदि के भाव में आता है और अभिनेता, अभिज्ञ, अभिमत,अभिमान, अभिलेख, अभियोग, अभ्यास, अभ्यर्थी जैसे शब्द बनाता है।5) उत् या उद्- उत्कर्ष, ऊपर आदि के अर्थ वाले उद्गम, उत्तोलक, उत्पात, उद्बोधन, उद्भेदन, उन्नत, उन्नायक आदि इससे बने हैं। उत्पीड़न, उद्घोषणा, उद्भट आदि में अधिक या प्रबल होने का अर्थ है, जबकि उद्दंड, उद्बोधन, उन्नति आदि में ऊपर उठे होने का अर्थ है।6) उप- इससे उपवन, उपमुख्यमंत्री, उपग्रह, उपाख्यान, उपाध्यक्ष, उपायुक्त, उपसंपादक, उपभोग, उपलब्ध, उपहार,उपहास आदि बने हैं, जो मूल शब्द को छोटा, निकट, समीप, सहायक, हीनता आदि के भाव से संयुक्त करते हैं। उपग्रह,उपवन, उपभाषा, उपबंध आदि छोटा के अर्थ में हैं, तो उपस्थित, उपभोग आदि पास या निकट का अर्थ देने वाले हैं।7) प्र- आगे, अधिक, ऊपर, यश आदि के अर्थ वाले प्रक्रिया,प्रकृति, प्रयोग, प्रबल, प्रगति आदि इससे बने हैं।8) परि- चारों ओर, घेरा, पूरा, त्याग, अतिशय आदि के अर्थवाले शब्द परिक्रमा, परिमाप, परिमिति, परिकलन, परिभाषा, परिमार्जन, परियोजना, परिरक्षण, परिवर्धन, पर्यावरण आदि इस उपसर्ग से बनते हैं।यह अक्सर देखा जाता है कि लोग परीक्षा का अर्थ पर + इच्छा = परीक्षा यानी दूसरे की इच्छा लगाते हैं। यह मूर्खतापूर्ण और आधारहीन है। पर में इच्छा मिलाने परपरेच्छा बनेगा, परीक्षा नहीं। परीक्षा में न तो पर है,न इच्छा; वास्तव में परि उपसर्ग ईक्षा (अर्थ- दृष्टि, विचार, जाँच) से मिलकर परीक्षा बनाता है।9) सु- सुखी, सुन्दर, अच्छा, श्रेष्ठ, सहज आदि भाव वाले सुगंध, सुगम, सुदर्शन, सुपुत्र, सुभाष, सुयश, सुरक्षा, सुलभ, सुसंगति, सुसंस्कृत, स्वागत आदि शब्द इस उपसर्ग से बने शब्द हैं।10) सम्- संयोग, साथ या इकट्ठा के भाव वाले संचार, समारोह, सम्मेलन आदि और पूर्णता, सौन्दर्य के भाव वाले संगीत, सम्मोहन, समालोचना, समीक्षा, सम्बोधन, सम्मान, सम्प्रेषण, संचालन, संक्रमण आदि इससे बने हैं।11) अध- अपूर्ण या आधे के अर्थ वाले अधपका, अधमरा, अधखुला आदि इस उपसर्ग से बने हैं।12) उन- एक कम का भाव रखने वाला यह उपसर्ग उनचास, उनसठ,उनतीस, उनहत्तर, उन्नीस, उनतालीस जैसे शब्द बनाता है।13) भर- भरपेट, भरमार, भरपूर, भरसक आदि पूरा या ठीक का अर्थ रखने वाले शब्द इससे बने हैं।14) पर- दूसरा का अर्थ देने वाला और स्व (निज) का विलोम यह उपसर्ग पराधीन, परलोक, परतंत्र, परजीवी, परदेस, परोपकार, परदादा जैसे शब्द बनाता है।15) कम- फ़ारसी का यह उपसर्ग अल्प, न्यून, हीन आदि का अर्थ देता है; जैसे कमनसीब, कमजोर, कमअक़्ल, कमबख़्त आदि।16) खुश- यह भी फ़ारसी का अच्छा या श्रेष्ठ के भाव का उपसर्ग है। खुशनुमा, खुशनसीब, खुशबू, खुशमिजाज, खुशगवार, खुशकिस्मत, खुशखबरी आदि इससे बने शब्द हैं।17) नेक- यह भी 'अच्छा' के भाव का फ़ारसी उपसर्ग है, जो नेकनीयत, नेकदिल जैसे शब्द बनाता है।18) ब- अनुसार, साथ, से आदि के भाव के लिए फ़ारसी के इस उपसर्ग का इस्तेमाल बनाम, बदस्तूर, बखूबी जैसे शब्द बनाने के लिए करते हैं।19) बा- साथ, सहित के भाव के इस उपसर्ग से बाकायदा, बाइज़्ज़त जैसे शब्द बनते हैं। यह भी फ़ारसी का उपसर्ग है।20) हम- बराबर, अपना आदि के अर्थ का यह फ़ारसी का उपसर्ग हमवतन, हमराह, हमदर्द, हमशक्ल, हमनाम, हमउम्र आदि बनाता है।21) डबल- अंग्रेज़ी का यह उपसर्ग दुगना का अर्थ देता है। डबलरोटी इसका उदाहरण है।22) हेड- मुख्य के अर्थ के साथ लिए यह हेडमास्टर, हेडक्लर्क जैसे शब्द बनाता है।इसके अतिरिक्त डिप्टी (उप के लिए) से डिप्टी साहब, डिप्टी कमिश्नर; फुल से फुल स्वेटर; सब (अर्थ- अवर) से सब रजिस्ट्रार;हाफ;हाफ से हाफ शर्ट आदि; रि (दुबारा या पुनः के अर्थ में) से रिचार्ज, रिचेक, रिमेक जैसे शब्द बनते हैं।हर, सर, बर जैसे फ़ारसी के उपसर्ग हर दिन, हर रोज़, हरदम, हरसाल, सरपंच, सरताज, सरज़मीन, सरफ़रोश, सरहद, बरक़रार, बरखास्त, बरदाश्त, बरअक्स, बरखिलाफ, बरबाद, जैसे शब्द बनाते हैं।दो बातों का ध्यान हमेशा रखना चाहिए-1) पहली यह कि एक ही अर्थ कई उपसर्ग दे सकते हैं, लेकिनसबका प्रयोग हर बार नहीं कर सकते, जैसे ज्ञान में दुर् मिलाकर दुर्ज्ञान नहीं होता, अ लगाकर अज्ञान होता है।2) संस्कृत शब्दों में संस्कृत का, अंग्रेज़ी शब्दों में अंग्रेज़ी का, हिन्दी में हिन्दी का और उर्दू (हम फ़ारसी और अरबी कह सकते हैं) में उर्दू का उपसर्ग लगाना ठीक रहता है। सुनसीब (बदनसीब की जगह), फुलपेट (भरपेट की जगह), खुशदर्शन (सुदर्शन की जगह) जैसे प्रयोग बेहूदा और भद्दे हैं। अत्यन्त खूबसूरत की जगहबेहद खूबसूरत, बेहद कठिन की जगह बहुत मुश्किल का प्रयोग अच्छा और जायज़ रहता है।भोजपुरी में बेदरूप (बदरूप) का प्रयोग भी लोग करते हैं।ज़िलाधिकारी, लाठीचार्ज, रेलगाड़ी, पॉकेटमार, टिकटघर,रामइक़बाल, जेलयात्रा, डाल्टेनगंज, घड़ीसाज, चौकीदार,समझदार, राजमहल, चमकदार आदि दो भाषाओं से मिलकर बने कुछ बहुप्रचलित शब्द हैं।

माँ झूठ बोलती है

...........माँ बहुत झूठ बोलती है............

सुबह जल्दी जगाने, सात बजे को आठ कहती है।
नहा लो, नहा लो, के घर में नारे बुलंद करती है।
मेरी खराब तबियत का दोष बुरी नज़र पर मढ़ती है।
छोटी छोटी परेशानियों का बड़ा बवंडर करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

थाल भर खिलाकर, तेरी भूख मर गयी कहती है।
जो मैं न रहूँ घर पे तो, मेरी पसंद की
कोई चीज़ रसोई में उससे नहीं पकती है।
मेरे मोटापे को भी, कमजोरी की सूज़न बोलती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

दो ही रोटी रखी है रास्ते के लिए, बोल कर,
मेरे साथ दस लोगों का खाना रख देती है।
कुछ नहीं-कुछ नहीं बोल, नजर बचा बैग में,
छिपी शीशी अचार की बाद में निकलती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

टोका टाकी से जो मैं झुँझला जाऊँ कभी तो,
समझदार हो, अब न कुछ बोलूँगी मैं,
ऐंसा अक्सर बोलकर वो रूठती है।
अगले ही पल फिर चिंता में हिदायती होती है।
.........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

तीन घंटे मैं थियटर में ना बैठ पाऊँगी,
सारी फ़िल्में तो टी वी पे आ जाती हैं,
बाहर का तेल मसाला तबियत खराब करता है,
बहानों से अपने पर होने वाले खर्च टालती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

मेरी उपलब्धियों को बढ़ा चढ़ा कर बताती है।
सारी खामियों को सब से छिपा लिया करती है।
उसके व्रत, नारियल, धागे, फेरे, सब मेरे नाम,
तारीफ़ ज़माने में कर बहुत शर्मिंदा करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

भूल भी जाऊँ दुनिया भर के कामों में उलझ,
उसकी दुनिया में वो मुझे कब भूलती है।
मुझ सा सुंदर उसे दुनिया में ना कोई दिखे,
मेरी चिंता में अपने सुख भी किनारे कर देती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

मन सागर मेरा हो जाए खाली, ऐंसी वो गागर,
जब भी पूछो, अपनी तबियत हरी बोलती है।
उसके "जाये " हैं,  हम भी रग रग जानते हैं।
दुनियादारी में नासमझ, वो भला कहाँ समझती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

उसके फैलाए सामानों में से जो एक उठा लूँ
खुश होती जैसे, खुद पर उपकार समझती है।
मेरी छोटी सी नाकामयाबी पे उदास होकर,
सोच सोच अपनी तबियत खराब करती है।
..........माँ बहुत झूठ बोलती है।।

" ��हर माँ को समर्पित�� .��������������

अध्यात्म बड़ा या विज्ञान

:~ अध्यात्म बड़ा या विज्ञान ~:
एक बार मैं ट्रेन में सफर कर रहा था, उस ट्रेन में एक ब्राह्मण जी लोगों को प्रवचन दे रहे थे, कि जहाँ विज्ञान खत्म होता है,
वहाँ से आध्यात्मिक ज्ञान शुरू होता है।
मैंने ब्राह्मण से पूछा : आप आध्यात्म को श्रेष्ठ मानते हैं या विज्ञान को..
ब्राह्मण ने कहा - हम आध्यात्मिक ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हैं, विज्ञान को नही।
मैंने ब्राह्मण से पूछा - आप यात्रा करने के लिए किस साधन का प्रयोग करते हैं..?
ब्राह्मण ने कहा - बस, ट्रेन, हवाई जहाज इत्यादि का प्रयोग करते हैं।
मैंने ब्राह्मण से पूछा - क्या आप यात्रा करने अर्थात एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने के लिए तुम्हारे भगवानों के आध्यात्मिक ज्ञान का प्रयोग करते हैं, जिसके माध्यम से देवता या मनुष्य आँख बंद करते ही एक स्थान से दूसरे स्थान पर पलक झपकते ही पहुँच जाते थे।
ब्राह्मण ने कहा - नही..
मैंने कहा - उक्त संसाधनों का आविष्कार विज्ञान शक्ति ने किया है या आध्यात्मिक शक्ति ने..??
ब्राह्मण ने कहा - उक्त संसाधनों का अविष्कार विज्ञान की शक्ति ने किया है, आध्यात्मिक शक्ति ने नही..
मैंने पूछा - अब बताओ कि विज्ञान शक्ति श्रेष्ठ या आध्यात्मिक शक्ति...?
ब्राह्मण ने कहा - विज्ञान शक्ति श्रेष्ठ है लेकिन आध्यात्मिक शक्ति भी कम नही है!
फिर मैंने पूछा - यदि आध्यात्मिक शक्ति भी कम नही है तो आप अपने बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा दिलाते हैं या विज्ञान की..?
ब्राह्मण ने कहा - विज्ञान की शिक्षा!
मैंने पूछा - आप अपने बच्चों को आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा श्रेष्ठ मानते हैं या विज्ञान की शिक्षा..?
ब्राह्मण ने कहा - विज्ञान की शिक्षा!
मैंने पूछा - फिर आध्यात्मिक ज्ञान की शिक्षा क्यों नही दिलाते हैं?
ब्राह्मण ने कहा - आध्यात्मिक ज्ञान सिर्फ कल्पनात्मक है, सम्यक अर्थात यथार्थ नही है।
मैंने पूछा - मनुष्य जीवन के लिए यथार्थ ज्ञान की आवश्यकता है या काल्पनिक ज्ञान की...?
ब्राह्मण ने कहा - मनुष्य जीवन के लिए यथार्थ ज्ञान अर्थात विज्ञान की आवश्यकता है।
फिर मैंने पूछा - आध्यात्मिक ज्ञान की कहाँ आवश्यकताहै?
ब्राह्मण ने कहा - मोक्ष प्राप्ति के लिये..
मैंने पूछा - मोक्ष प्राप्ति कब होती है?
ब्राह्मण बोला - मनुष्य की मृत्यु के बाद..
तो मैंने कहा - जब मृत्यु के उपरांत आपकी सभी ज्ञानेन्द्रियाँनष्ट हो जाती हैं और आपका शरीर नष्टहो चुका होता है तो आप उस मोक्ष के सुख को अनुभव कर पायेंगे।
ब्राह्मण ने कहा - नही...
मैंने कहा - कोई भी सुख और दुःख मनुष्य शरीर के जिंदे रहने पर ही प्राप्त किया जाता है या मृत्यु के उपरांत...??
ब्राह्मण बोले - शरीर जिंदा रहने पर...
मैंने कहा - मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन के लिए विज्ञान की आवश्यकता है या आध्यात्मिक ज्ञान की..?
ब्राह्मण ने कहा - विज्ञान की आवश्यकता है।
मैंने फिर पूछा - हे ब्राह्मण अब बताओ कि विज्ञान बड़ाया आधात्मिक ज्ञान बड़ा...
ब्राह्मण ने कहा - मैं आपके विज्ञान को स्वीकारता हूँ और मानता हूँ कि विज्ञान ही बड़ा है, आध्यात्मिक नही...पर फिर भी मैं, मेरा समाज और मेरे अनुयायी (अन्य जाति वाले) तेरी बात नहीं मानेंगे, हम सब जानते हैं पर अंधविश्वास मिटने नहीं देंगे।

तुम जैसे 'नास्तिक' फडफडाते रहेंगे।