मंगलवार, 21 मार्च 2017

मार्शल आर्ट का इतिहास

*मार्शल आर्ट का इतिहास*
आज भारतीय जन अपनी संस्कृति और संभ्यता भूलने के दौर में जी रहा है या यूँ कहे कि भारतीयों ने अपनी संस्कृति और सभ्यता भुला ही दी तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी l जिन संस्कृतियो और मूल्यों को हम भुला चुके या फिर नकार चुके, उन्ही को अपनाकर कई देश आज विकसित अवस्था में हमारे सामने खड़े है और हम कहाँ है आज ये बताने की आवश्यकता नही l
आज जिस मार्शल आर्ट की कला के दीवाने भारतीय है और वो इसे सीखने के लिए हमेशा उत्सुक रहते है उसके बारे में यही सोचते है कि ये चीन की देन है, जबकि हकीकत कुछ और ही है l दरअसल इस कला का ज्ञान चीन ने नही बल्कि चीन के साथ सम्पूर्ण विश्व को हमने दिया l परन्तु विडम्बना तो ये है कि इस अद्भुत विद्या के जनक का नाम ही भारतीयों को नही मालूम l ये सब मैकाले की शिक्षा नीति का ही प्रतिफल है |
आज जिसे चीन, जापान, थाईलैंड आदि देशों में जिसे भगवन की तरह पूजा जाता है ; वह हमारे देश के हैं और हम उनका नाम भी नहीं जानते हैं, इससे बड़ी शर्म की बात क्या हो सकती है |
आज आवश्यकता है हमें अपने गौरवमय इतिहास को जानने की, जो भी प्राचीन ग्रन्थ हैं उनका अध्ययन करने की, जो भी ज्ञान हमारे हमारे ऋषि – मुनियों ने हमें प्रदान किया हुआ है उस पर अमल करने की |
पश्चिम और दुनिया के अन्य देशों में मार्शल आर्ट को चर्चित करने का श्रेय काफी हद तक स्वर्गीय ब्रूस ली को दिया जाता है। बाद में 1960 और 1970 के दशक में मार्शल कलाकार और हॉलीवुड अभिनेता ब्रूस ली से प्रभावित मीडिया की दिलचस्पी मार्शल आर्ट के प्रति देखी गई । एशियाई और हॉलीवुड मार्शल आर्ट फिल्मोंको भी आंशिक रूप से इसका श्रेय दिया जाता हैं जहां जैकी चेन और ब्रूस ली जैसे प्रख्यात फिल्मी हस्तियों को हाल के वर्षों में चीनी मार्शल आर्ट को बढ़ावा देने के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

मार्शल आर्ट में सबसे अच्छी विद्या मानी जाती है कुंग्फु और इसको सिखाने का सबसे अच्छा विद्यालय माना जाता है चीन में स्थित सओलिन मन्दिर | आपको यह जानकार बेहद आश्चर्य होगा की इस विद्यालय की आधारशिला रखने वाले और चीन को इस कला का ज्ञान देने वाले भारतीय थे | उस भारतीय का नाम था – ” बोधिधर्मन ” |
550 ई.पू. दक्षिण भारत के पल्लव वंश के राजकुमार, बोधिधर्मन (जिन्हे धरुमा नाम से भी पुकारा गया) नाम के भिक्षु बन गये। बोधिधर्मन आत्मरक्षा कला के अलावा एक महान चिकित्सक भी थे | उन्होंने अपने ग्रन्थ में डीएनए के माध्यम से बीमारियों को ठीक करने की विधि के बारे में भी आज से १६०० साल पहले बता दिया था | बोधिधर्मन के माध्यम से ही चीन, जापान और कोरिया में बौद्ध धर्म का विस्तार हुआ था। 520-526 ईश्वी में चीन जाकर उन्होंने चीन में ध्यान संप्रदाय की नींव रखी थी जिसे च्यान या झेन कहते हैं। ओशो रजनीश ने बोधिधर्मन के बारे में बहुत कुछ कहा है।
माना जाता है कि यह भिक्षु दक्षिण भारत के कांचीपुरम के राजा सुगंध के तीसरे पुत्र थे। बौद्ध धर्म के ज्ञान को भगवान बुद्ध ने महाकश्यप से कहा। महाकश्यप ने आनंद से और इस तरह यह ज्ञान चलकर आगे बोधिधर्मन तक आया। बोधिधर्मन उक्त ज्ञान व गुरु शिष्य परंपरा के अट्ठाइसवें गुरु थे।
उत्तरी चीन के तत्कालीन राजा बू-ति बोधिधर्मन से प्रभावित थे। बू-ति के निमन्त्रण पर बोधिधर्मन की उनसे नान-किंग में भेंट हुई। यहीं पर नौ वर्ष तक रहते हुए बोधिधर्मन ने ध्यान का प्रचार-प्रसार किया। माना जाता है कि बोधिधर्म जब तक चीन में रहे मौन ही रहे और मौन रहकर ही उन्होंने ध्यान-सम्प्रदाय की स्थापना कर ध्यान के रहस्य को बताया। बाद में उन्होंने कुछ योग्य व्यक्तियों को चुना और अपने मन से उनके मन को बिना कुछ बोले शिक्षित किया। इसे हम मानसिक संवाद कह सकते हैं | यही ध्यान-सम्प्रदाय कोरिया और जापान में जाकर विकसित हुआ।

बोधिधर्मन के प्रथम शिष्य और उत्तराधिकारी का नाम शैन-क्कंग था, जिसे शिष्य बनने के बाद उन्होंने हुई-के नाम दिया। पहले वह कन्फ्यूशस मत का अनुयायी था। बोधिधर्मन की कीर्ति सुनकर वह उनका शिष्य बनने के लिए आया था। बोधिधर्म का कोई ग्रंथ नहीं है, लेकिन ध्यान सम्प्रदाय की इतिहास पुस्तकों में उनके कुछ वचनों का उल्लेख मिलता है।
मार्शल आर्ट या लड़ाई की कलाएं विधिबद्ध अभ्यास की प्रणाली और बचाव के लिए प्रशिक्षण की परंपराएं हैं। सभी मार्शल आर्ट्स का एक समान उद्देश्य है : ख़ुद की या दूसरों की किसी शारीरिक ख़तरे से रक्षा. इसके अलावा कुछ मार्शल आर्ट को जहां आस्था जैसे हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म, दाओवाद,कन्फ्यूशीवाद या शिन्टो से जोड़ा जाता है, वहीं दूसरी सम्मान के एक विशेष नियम का पालन करती हैं। मार्शल आर्ट को विज्ञान और कला दोनों माना जाता है। इनमें से कई कलाओं का प्रतिस्पर्धात्मक अभ्यास भी किया जाता है, ज़्यादातर लड़ाई के खेल में, लेकिन ये नृत्य का रूप भी ले सकती हैं।
मार्शल के गुण अनुशासन, विनम्रता, संयम और सम्मान इसी दर्शन शास्त्री की देन माने जाते हैं। दारुमा को चीन में ज़ैनबौद्धवाद के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है। इसीलिए नैतिक आचरण और आत्मानुशासन पुरातन काल से ही मार्शल अभ्यास का हिस्सा बन गये। इसी के साथ भारतीय ध्यान गुरू बुद्धभद्र (मैंडेरिन में इसे बाटुओ बुलाया जाता है) चीन के शाओलिन मंदिर के पहले महंत बने ! उत्तरी वी राजवंश के राजा झीआओवेन ने 477 ई. पू. शाओलिन मठ का निर्माण करवाया.आज भी केरल में मार्शल आर्ट के इस कौशल को इसके मूल स्वरुप में देखा जा सकता है |
इसी विषय पर कुछ समय पूर्व एक फिल्म भी आई थी आपने चेन्नई V / s चाईन

हमेशा ध्यान रखें

*यह हमेशा ध्यान रखे*

1) ������ *निम्बू-मिर्च* खाने के लिये है.. कही *टाँगने* के लिए नहीं है....

2) ���� *बिल्लियाँ* जंगली या पालतू जानवर है, बिल्ली के *रास्ता काटने* से कुछ गलत नहीं होता.. बल्कि चूहों से होनेवाले नुक्सान को बचाया जा सकता है.....
.
3) ���� *छींकना* एक नैसर्गिक क्रिया है , छींकने से कुछ *अनहोनी* नहीं होती ना हि किसी काम में बाधा आती है- छींकने से शरीर की *सुप्त पेशियां* सक्रीय हो जाती है...

4) ���� *भूत* पेड़ों पर नहीं रहते - पेड़ों पर *पक्षी*रहते है.....

5) ���� *चमत्कार* जैसी कोई चीज नहीं होती - हर घटना के पिछे *वैज्ञानिक* कारण होता है.....

6) ⛄☃ *भोपा, बाबा* जैसे लोग *झुठे* होते है- जिन्हें *शारारिक मेहनत* नहीं करनी ये वही लोग है.....

7) ⛈������ *जादू टोणा*, या *किसी ने कराया* ऐसा कुछ नहीं होता, ये दुर्बल लोगोंके *मानसिक विकार* है....
जादू-टोणा करके आपके ग्रहो की दिशा बदलने वाले बाबा, हवा और मेघों की दिशा बदलकर बारिश नहीं ला सकते...?⛈☁����

8 ) ���� *वास्तुशास्त्र* भ्रामक है. सिर्फ दिशाओ का *डर* दिखाकर लूट...
वास्तविक तो पृथ्वी ही खुद हर क्षण *अपनी दिशा* बदलती है....  अगर *कुबेर जी* उत्तर दिशा में है तो एक ही स्थान या दिशा में *अमीर* और *गरीब* दोनों क्यों पाये जाते है?..... .

9) ���������� *मन्नत,पूजा, बलि, टिप* या *चढ़ावे* से भगवान प्रसन्न होकर *फल* देते है, तो क्या भगवान् *रिश्वतखोर* है?.....    आध्यात्म *मोक्ष* के लिए है, *धन* कमाने के लिए नहीं.....

10) �� ये जो *पढ़* रहे हो इसका अनुकरण करे, और अपने *मित्रों* को भी send करे...

यह मेसैज 15 दूसरे ग्रूप्स में भेजने से कोई *खुशखबरी* नहीं मिलेगी...और इसको डिलीट करने पर कोई अनहोनी भी नहीं होगी। पर Farword करने से आपके कई मित्र *मेहनत*और *कर्म* का महत्त्व जरूर जान सकेंगे..

गद्दारो के लिए कविता

समाज के गद्दार नेताओं और उनके बिकाऊ संगठनों पर कटाक्ष और पोल खोलती हमारे मिशनरी कवि की यह कविता जरूर पढ़े और आत्मचिंतन करें।

चल यार मिशन चलाते है,
खर्चे हेतु 1 संस्था बनाते है...!!!
दो चार चेलो को पाले,
उनसे नारे लगवाते है....!!!
चल यार मिशन चलाते है........1
4 मैं जोडू और 4 तू जोड़,
अपनी संख्या बढ़ायेंगे...!!!
मैं अध्यक्ष तू महामन्त्री,
ये सबको बतलायेंगे,....!!!
चन्दा बटोर कम्पनी बन,
आधा-आधा माल खाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....2
विधायक जी के पास चले,
कुछ चन्दा हिस्से आयेगा...!!!
100-100 अगर मांगे हमने,
50 तो जरूर मिल जायेगा...!!!
वरना सुन 10 हजार का ,
1 मुख्य अतिथि बनाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....3
जितना लम्बा भाषन होगा,
उतना घर में राशन होगा...!!!
भीम मिशन की आड़ में,
फिर तो अपना शासन होगा...!!!
हम है कट्टर भीम सैनिक,
दुनिया को बतलाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....4
अमा एक काम करो मियां,
एक कार्यक्रम रखवायेंगे...!!!
मंच, माला के संग माइक,
स्वागत अपना करवाएंगे....!!!
एक दो गायक, कवि,
शायर को भी बुलवाते है....!!!
*चल यार मिशन चलाते है....5
अपनी संस्था सबसे ऊँची, गला फाड़-2 बतलायेंगे...!!!
भीम मिशन को गड्ढे भीतर,
निम्न द्वार लेकर जायेंगे...!!!
ऐसे कर्मो को करने वाले,
केवल नेता  कहलाते है....!!!
*चल यार मिशन चलाते है.....6
दो चार आंदोलन करके,
फ़ोटो 100 खिंचवाएंगे....!!!
व्हाट्सएप-सोशल मीडिया ,
खूब उन्हें हम फैलाएंगे...!!!
बड़ी पार्टियों से घूस को लेकर,आंदोलन को दबाते हैं...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....7
चमचा बनकर किसी भगोने,
के अंदर हम घुस जाएंगे.....!!!
चरण में पड़कर बड़े नेता के,
मन्त्री पद भी पायेंगे.....!!!
मिशन का काम हुआ पूरा,
चल अब मौज उड़ाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है.....8

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

१२ ज्योतिर्लिंग

12 ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा ��

1- सोमनाथ

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चन्द्र देव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है। 

2- मल्लिकार्जुन

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। 

कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं। 

3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

4- ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

5- केदारनाथ

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

6- भीमाशंकर

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

7- काशी विश्वनाथ

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे। 

8- त्र्यंबकेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। 

9- वैद्यनाथ 

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड राज्य (पूर्व में बिहार ) के देवघर जिला में पड़ता है। 

10- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है। 

12- धृष्णेश्वर मन्दिर

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगोंb hv में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

आरक्षण अन्य देशो में

RESERVATION IN OTHER COUNTRIES
दुनिया के निम्नलिखित देशो में मिलता है आरक्षण (Reservation/Affirmative Action):-
आजकल देश में दलित (OBC, SC & ST) आरक्षण के विरोध मे आंधी सी चल रही है। आरक्षण के खिलाफ बेहूदे और बेतुके तर्क किये जाते है। सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे देशो मे आरक्षण नहीं दिया जाता इसलिये वे देश हमसे ज्यादा प्रगितिशील है जो बिल्कुल गलत है। विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है और इसे ईमानदारी से दिया जाता है।
बाहरी देशों में आरक्षण को Affirmative Action कहा जाता है। Affirmative Action का मतलब समाज के "वर्ण " तथा "नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।
1961 को संयुक्त राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण, नस्लभेद व रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बनाया गया। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित वर्ग (दलित) की मदद करके उन्हें समाज की मुख्य धारा मे स्थापित करने का निर्णय लिया। इसी फैसले के तहत ही शोषितों और वंचितो को उठाने के लिए अलग अलग देशो ने अपने अपने तरीके से आरक्षण लागु किया है।
ऊपर कहे गए देश अमेरिका, जापान और भारत के अलावा अन्य देशो ने भी आरक्षण दिया है जिन मे से कुछेक निम्नलिखित हैं :-
1. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान मे बडी मुश्किल से 5% दलित हैं लेकिन उन्हें ईमानदारी से 6% आरक्षण दिया जाता है।
2. आरक्षण के कारण दक्षिण अफ्रीका टीम में 6 अश्वेत खिलाडियों का चयन जरूरी होता है।
3. अमेरिका में affirmative action) के तहत अश्वेतों को आरक्षण मिला हुआ है। वहां की पिक्चरों में भी अश्वेत कलाकारों का आरक्षण निर्धारित है। वहाँ कोई पिक्चर या विभाग ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें अश्वेत/काले न हो। अमेरिका ने तो आज से 155 साल पहले 4 मार्च, 1861 को (अब्राहम लिंकन) मोची जाति को अपना राष्ट्रपति बना दिया था। अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी एक अश्वेत, मुस्लिम और छोटे तबके के थे। तभी तो अमेरिका तरक्की की दुनिया में अन्य देशों से काफी आगे हैं। भारत में तो सम्पूर्ण हिस्सेदारी पर कुछे लोग कुंडली मारकर कब्जा जमा रखा है जबकि 50 प्रतिशत आरक्षण उन्ही 15 प्रतिशत लोगों को अप्रत्यक्ष रूप में मिल रहा है। इसीलिये वे समाज मे भ्रांति बनाये रखने के लिए आरक्षण/
हिस्सेदारी का आऐ दिन विरोध करते रहते हैं।
4. ब्राझील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है ।
5. कनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामान्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है ।
6. चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है ।
7. फिनलैंड मे स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है ।
8. जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
9. इसरायल में Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।
10. जापान जैसे सबसे प्रगतिशिल देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के हक वंचित दलित लोग हैं )
11. मॅसेडोनिया में अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।
12. मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत आरक्षण लागू हुआ है ।
13. न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
14. नॉर्वे के पीसीएल बोर्ड मे 40 % महिला आरक्षण हें।
15. रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
16. दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
17. दक्षिण कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
18. श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
19. स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण दिया जाता है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। भारत में तो लोग सबसे ज्यादा जातिभेद के ही शिकार हैं । भारतीय शुद्रो/दलितो को तो हजारों सालों से उनके मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर गुलाम बना कर रखा। तो फिर भारतीय दलितो को आरक्षण क्यों न मिले?
जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, सेना, सभी प्रकार की नौकरी, संसाधन तथा सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तक देश वांछनीय प्रगति नहीं कर पाएगा। अगर सभी देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहे हैं तो फिर भारत क्यों नहीं।

जय संविधान.....जय भारत।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
www.facebook.com/rpvishal

गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

समान शिक्षा ,इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय

                                                                     इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?
                                                                    आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान किये गए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावी   व्यवस्था करे “ /
                                                                      हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू किया जा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समान शिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है।
                                                                       पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये |

                                                                      निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरु किये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी।
                                                                     परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़े स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।
                                                                     डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा।
                                                                     यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।
                                                                 असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है|
                                                                कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यह तो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूल की दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |
                                                                भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | पर इस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब  शिक्षा की ही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |
                           यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।
                                                              जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे | तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |
                                                               आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य की इनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |
                     सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :-
-------------------------------------------------------------------------
01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण  ,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार            करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन की  जानकारिया जुटाना  आदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को
       राष्ट्रिय कार्य का नाम देकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारत का न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी ,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमो का न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक
      सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं
      पढाई लिखाई पर ध्यान देने का ढुलमुल रवैया |
                                                                 यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथ ही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |
समाज पर प्रभाव :-
--------------------
01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससे सभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा |
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई –लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारी के पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरू
कर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों को
गुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगा
यह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है |इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे |
नरेन्द्र कुमार पासी
भूगोल ( वरिष्ठ अध्यापक )
शास. बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सरवन 
 पोस्ट- सैलाना ,जिला-रतलाम(मध्यप्रदेश)
भारत

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

बाबा साहेब ने इस्तीफा क्यों दिया।

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा क्यू दिया..???*****************************मुख्य चार कारण:-
(01.) डा० बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 340 में OBC आरक्षण के विषय मे लिखा उसकी सच्चाई
        और महत्वपूर्ण तथ्य..(1) अनुच्छेद 341 के अनुसार शेड्यूल कास्ट (SC) को 15% प्रतिनिधित्व दिया....
(2 )  अनुच्छेद 342 के अनुसार..शेड्यूल ट्राईब (ST) को 7.5% प्रतिनिधित्व दिया...और इन वर्गो का विचार              करने से पहले डा. अंबेडकर ने सर्वप्रथम OBC अर्थात अन्य पिछड़ी जातियों का विचार किया... इसीलिये           डा.अंबेडकर ने अनुच्छेद 340 के अनुसार OBC को सर्वप्रथम प्राथमिकता दी....
(3)   अनुच्छेद 340 के अनुसार OBC को 52% प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया, उस समय लौह-पुरूष                 "सरदार पटेल" इसका विरोध करते हुए बोले...."ये OBC कोन है"...???ऐसा प्रश्न सरदार पटेल स्वत:                  OBC होते हुए भी पूछा...!!!क्युकि उस समय तक SC और ST मे शामिल जातियों की पहचान हो चुकी            थी.... और OBC में शामिल होने वाली जातियों की पहचान....(जो आज 6500 से अधिक है) का कार्य पूर्ण        नहीं हुआ था.......कोई भी "अनुच्छेद" लिखने के बाद.. डा० अंबेडकर को उस"अनुच्छेद" को...प्रथम तीन            लोगो को दिखाना पड़ता था.....
                       1) पंडित नेहरू2) राजेंद्र प्रसाद3) सरदार पटेल..इन तीनों की मंजूरी के बाद... उस अनुच्छेद का       विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी...उस समय संविधान सभा में कुल 308 सदस्य होते थे, उसमें से       212 Congress के थे....अनुच्छेद 340, अनुच्छेद 341 और 342 के पहले है... सभी पिछड़ी जातियों को इस         महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देनाचाहिए..340 वां अनुच्छेद असल में क्या है... ???जिस समय बाबासाहब            डा० अंबेडकर ने 340 वां अनुच्छेद का प्रावधान किया और सरदार पटेल को दिखाया.. उस पर सरदार पटेल        ने बाबासाहेब से प्रश्न किया " ये OBC कौन है".... "हम तो SC और ST को ही backward मानते हैं"... ये            OBC आपने कहा से लाये......???सरदार पटेल भी बॅरिस्टर थे, और वह स्वयं OBC होते हुए भी ...उन्होंने          OBC से संबधित अनुच्छेद 340 का विरोध किया...!!!किंतु इसके पीछे की बुद्धि.. सिर्फ गांधी और नेहरू की        थी......तब डा. अंबेडकर ने सरदार पटेल से कहा... "it's all right Mr. Patel " मै आपकी बात संविधान मे डाल       देता हूँ कि" संविधान के अनुच्छेद 340 में सरदार पटेल के मुख से बोले गये वाक्य के अाधार पर ... 340 वें      अनुच्छेद के अनुसार ...इस देश के राष्ट्रपति को OBC कौन है...?? "येमालूम नहीं है"....और इनकी पहचान     करने के लिए एक "आयोग गठित" करने का आदेश दे रहे हैं "......गांधी..... नेहरू...पटेल....प्रसाद और उनकी      Congress की, OBC को प्रतिनिधित्व देने की इच्छा नहीं है... ये बाबासाहेब को दिखा देना था....परंतु 340 वें      अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने OBC कौन है..इन्हें पहचानने के लिए आयोग नहीं बनाया.!!      इसलिए दि. 27 Sept 1951 को बाबासाहेब ने केन्द्रीय कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया..मतलब OBC के          कल्याण के लिए केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले पहले और अंतिम व्यक्ति डॉ बाबासाहेब आंबेडकर         है...परंतु आज भी यह घटना अपने OBC जाति के मित्र को शायद मालूम नहीं है इस बात पर बहुत आश्चर्य     और दुख होता है.... !!!!...सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बाबासाहेब डा. अंबेडकर को त्यागपत्र पंडित नेहरू ने     संसद में पढ़ने नहीं दिया.. !!!अंत में 10 Oct 1951 को बाबासाहेब ने यह बात संसद के बाहर प्रसार माध्यम       के सामने रखी..." यह बात उल्लेखनीय है कि...अगर संसद में "त्यागपत्र" को पढ़ने दिया जाता तो... भविष्य     में OBC को असलियत का पता चलता की OBC के लिए डा.अंबेडकर ने कानूनमंत्री पद से इस्तीफा दिया...     !!!डा. अंबेडकर ने कानूनमंत्री पद से इस्तीफा दिया उसके चार मुख्य कारण...1) अनुच्छेद 340 के अनुसार       आयोग की नियुक्ति नहीं की...2)नेहरू का परराष्ट्रीय ऐजंडा गलत था...3)हिन्दू कोड बिल...4)प्रधानमंत्री            नेहरू ने कैबिनेट वितरण में बाबासाहेब से किया भेदभाव...पर डा. अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल के लिए              इस्तीफा दिया... इस बात का प्रचार किया जाता है... !!!इस्तीफा देने के कारण का क्रम देखा जाए तो                डा.अंबेडकरने किस बात को महत्व दिया ...आपके ध्यान में आयेगा.....।