बुधवार, 25 नवंबर 2015

कठिन नही है शुद्ध हिन्दी -भाग -36

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 36
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बहुत सारे शब्द हमेशा बहुवचन में रहते हैं; जैसे प्राण, दर्शन, आँसू, लोग, अक्षत, होंठ (ओठ), हस्ताक्षर, दस्तख़त, दाम, भाग्य, कयास (संभवतः), हिज्जे, होश, समाचार आदि। 'मेरा प्राण ले लो', 'आपका दर्शन पाकर हम धन्य हो गए', 'तुम्हारा होंठ फट गया', 'आँसू बहता है', 'लोग कहता है' (बिहार में खूब चलता है यह!), 'छात्र का हस्ताक्षर ', 'आपका दस्तख़त नहीं है', 'मेरा होश उड़ गया' जैसे प्रयोग ग़लत हैं। इनमें बहुवचन की जगह एकवचन मान लिया गया है उपरोक्त शब्दों को। 'मेरे प्राण ले लो', 'आपके दर्शन पाकर हम धन्य हो गए', 'आँसू बहते हैं', 'छात्र के हस्ताक्षर, 'आपके दस्तख़त नहीं हैं', 'लोग कहते हैं ', 'होंठ फट गए', 'मेरे भाग्य बड़े अच्छे हैं', 'फलों के दाम बढ़ गए हैं', 'मेरे होश उड़ गए' आदि उदाहरण सही प्रयोग को स्पष्ट करते हैं। बिहार में 'लोग कहेगा' जैसे वाक्य भी चलते हैं, जो एकदम ग़लत हैं।
कुछ शब्द हमेशा एकवचन में रहते हैं; जैसे पानी, प्रत्येक, हर एक, दूध, सामान, समर्थन, जनता आदि। जिसने, उसने, इसने, कोई, जिस, उस, उसमें, वह, उसको, उसे, उससे, उसका, उसकी, इसका, इसकी, इसको, इससे, यह, इसमें, उसके, इसपर, उसपर, जिसपर, जिसका, जिसके, जिसकी, जिसमें, जिससे, किसी, किसका, किसकी, किसके, किससे, किसको, किसमें, किसपर, किसने आदि भी एकवचन के शब्द हैं। 'हो' और 'हों' को क्रियारूपों पर बात करते समय स्पष्ट किया जा चुका है। 'हो' एकवचन में और 'हों' बहुवचन में लगता है। द्रव्यवाचक शब्द (मैटेरियल नाउन) एकवचन में होते हैं। सोना, धन, चाँदी, तेल आदि इसके उदाहरण हैं। यदि द्रव्य के भिन्न-भिन्न प्रकारों का बोध हो, तो कई बार एकवचन की जगह बहुवचन भी होता है; जैसे 'कई प्रकार के लोहे जमशेदपुर में मिलते हैं', 'चमेली, गुलाब, तिल आदि के तेल अच्छे होते हैं' आदि।
खूबी, कमी, सुन्दरता, मित्रता, शत्रुता, जवानी, बचपन, बुढ़ापा, ऊँचाई, पढ़ाई, दौड़, सुस्ती, मिठास, करुणा, दया, लिखावट, बीमारी जैसे भाववाचक शब्द (एब्सट्रैक्ट नाउन) एकवचन में रहते हैं। जहाँ संख्या या प्रकार का बोध होता है, वहाँ ऐसे शब्दों के बहुवचन रूप भी मिलते हैं, जैसे 'कमियाँ', 'विशेषताएँ', 'खूबियाँ' आदि। ध्यान रखें कि 'ऐं' या 'एैं' किसी शब्द के अन्त में नहीं हो सकते और 'एै' हिन्दी में होता ही नहीं। 'मोहब्बतें', 'चाहतें', 'पूजाएँ' जैसे शब्द कहीं से सही नहीं हैं, लेकिन फ़िल्मों में 'मोहब्बतें', 'मेहरबानियाँ' और 'चाहतें' जैसे शब्द चल रहे हैं। इनका प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिए।
'फुट' के लिए अंग्रेज़ी में बहुवचन 'फीट' है, लेकिन हिन्दी में हम 'फुट' का ही प्रयोग करते हैं। किसी भाषा में शब्द भले विदेशी हों, व्याकरण तो उस भाषा का ही होना चाहिए, जिसमें बात हो रही है। 'मकान', 'कागज', 'सवाल' जैसे शब्दों के बहुवचन फ़ारसी या अरबी में 'मकानात', 'कागजात', 'सवालात' हैं, लेकिन हिन्दी में हम 'मकान' 'कागज' 'सवाल' ही प्रयोग करते हैं। वैसे कागजात जैसे शब्दों का प्रयोग भी हिन्दी में किया जाता रहा है।
ऐसा ही एक अशोभनीय चलन बन गया है हिन्दी में आए अंग्रेज़ी शब्दों में अंग्रेज़ी प्रत्ययों का अंधाधुंध प्रयोग। 'स्कूल्स', 'कॉलेजेज़', 'टीचर्स', 'स्टुडेंट्स' जैसे शब्दों का प्रयोग बिलकुल नहीं करना चाहिए हिन्दी में। क्या अंग्रेज़ी में ऐसा कोई कह सकता है- 'समोसे आर बीइंग इटेन', 'साड़ियाँ आर सोल्ड', 'द टीचर्स मेट ऑल द गुरुओं' आदि! नहीं, तो हिन्दी में अंग्रेज़ी शब्दों के बहुवचन अपने मूल रूप में कैसे रह सकते हैं! हमें 'कम्प्यूटर्स', 'स्कूल्स', 'कॉलेजेज़', 'प्रोफेसर्स' जैसे शब्दों का हिन्दी में प्रयोग नहीं करना चाहिए। हिन्दी में 'स्कूलों', 'प्रोफेसरों', 'कम्प्यूटरों' जैसे शब्द ही लिखे और बोले जाने चाहिए।
पिछले भाग में विभक्ति चिन्हों के बारे में बताया गया था। विभक्ति चिन्ह सहित बहुवचन बनाते समय इकारांत या ईकारान्त शब्दों में अन्त में 'यों' जोड़ते हैं; जैसे मुनि से मुनियों, गली से गलियों, नदी से नदियों, कवि से कवियों, कहानी से कहानियों आदि। यों के पहले ईकार को इकार में बदलने की बात यहाँ भी लागू होती है। उकारान्त, ऊकारान्त और औकारान्त शब्दों में अन्त में 'ओं' जोड़कर बहुवचन बनाते हैं, जैसे साधु से साधुओं, भालू से भालुओं, डाकू से डाकुओं, वस्तु से वस्तुओं, बिन्दु से बिन्दुओं, गौ से गौओं आदि। यहाँ भी अन्त में ऊकार हटाकर उकार बनाने के बाद ओं जोड़ा गया है।
अकारान्त शब्दों में ओं लगाकर बहुवचन बनाते हैं, जैसे छात्र से छात्रों, घर से घरों, बालक से बालकों, किरण से किरणों आदि।
आकारान्त शब्द अगर तत्सम हों, तो ओं लगाकर बहुवचन बनाते हैं, जैसे माता से माताओं, लता से लताओं, पिता से पिताओं आदि। जब आकारान्त शब्द संस्कृत के न हों यानी तत्सम न होकर तद्भव या अन्य प्रकार के हों, तब अन्त में ओ की मात्रा और बिन्दी लगाकर बहुवचन बनाते हैं जैसे लड़का से लड़कों, घोड़ा से घोड़ों, छाता से छातों आदि।
एकारान्त शब्द दूबे से दूबों बनता है। अन्त में आने वाला आ, अ या ए ओं से विस्थापित हो जाता है। बात से बातों, दादा से दादों आदि इसके उदाहरण हैं।
विभक्ति चिन्ह सहित बहुवचनों के कुछ उदाहरण :
माताओं ने, पिताओं को, कारणों की, साँपों में, वेदों पर, डाकुओं से, भाषाओं में, ऋषियों की, छात्रों के लिए, लड़कियों से, तालों में, बातों से, दवाइयों का, कठिनाइयों पर, कविताओं में, किताबों से, मुनियों की, मुखियों पर, नालियों में, क्रांतिकारियों का, बाबुओं से, बाबाओं ने, दुआओं (दुआ से दुए या दुओं नहीं बनता) का आदि।
ध्यान रहे कि बच्चे को बच्चें नहीं लिखा जा सकता। बिन्दी का प्रयोग वहीं किया जा सकता है, जहाँ यह आवश्यक हो।
चाहिए में बिन्दी लगाकर चाहिएँ नहीं बनाया जाता। इसी प्रकार खाइए, जाइए, लीजिए, दीजिए आदि में भी अन्त में बिन्दी नहीं लगाई जाती। चाहिएँ जैसे प्रयोग प्रायः देखने को मिलते हैं। इनपर ध्यान देकर सुधार किया जा सकता है। 
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जारी...

बुधवार, 11 नवंबर 2015

वह सिर्फ ब्राह्मण था

अगर हिन्दू लोग दलितों को भी हिन्दू मानते है तो ये सौतेला व्यवहार क्यों ? दलित हिन्दू नहीं है। ब्राह्मणों का हिन्दू धर्म दलितों को गुलाम बनाता है।  ब्राह्मण और ब्राह्मणों का बनाया हिन्दू धर्म गुलामी का एक पिंजरा है। दलितों को हिन्दू कहने वाले इन तथ्यों को पढ़े।
��जाति बनाने वाले वाले हिन्दू ��ब्राह्मण है।
��जातिगत भेदभाव निर्माण करने वाले हिन्दू ब्राह्मण है। ��
��बहुजनो के खिलाफ षड़यंत्र रच उनके खिलाफ विधान लिखने वाला मनु ��ब्राह्मण हिन्दू था।
��संत रविदास के हत्यारे हिन्दू ब्राह्मण थे। ��
��संत कबीर का मजाक बनाने वाले हिन्दू ब्राह्मण ही थे।
��बहुजनो के बुद्ध धम्म को ख़त्म करने वाले हिन्दू थे।
��बौद्ध राजा बृहद्रथ मौर्या की हत्या करने वाला पुष्यमित्र शुंग���� हिन्दू था।
��एक बौद्ध भिक्षु के सर के बदले 100 स्वर्ण मुद्राए देने वाला पातंजलि और उसका चेला पुष्यमित्र शुंग हिन्दू थे।
��बहुजनो के गले में हांड़ी और पीछे झाड़ू लटकाने वाले हिन्दू थे।
��बहुजनो को अछूत कह दुत्कारने वाले हिन्दू थे।
��शुद्र और नारी को सिर्फ ताड़ने का अधिकारी बताने वाला तुलसीदास ब्राह्मण हिन्दू था।
��शुद्र ऋषि शम्भुक् की हत्या करने वाला राम हिन्दू था।
��महान धनुर्धर भील बालक एकलव्य का अंगूठा मांगने वाला द्रोणाचार्य ब्राह्मण हिन्दू था।
��शिवाजी महाराज का राजतिलक पाँव के अंगूठे से करने वाला ब्राह्मण हिन्दू था।
��शाहू जी महाराज को शुद्र कह अपमानित करने वाला ब्राह्मण हिन्दू था।
��देश की गुलामी के समय शुद्रो को हथियार ना उठाने का ज्ञान देने वाले ब्राह्मण हिन्दू थे।
��शुद्रो द्वारा ज्ञान प्राप्ति को और धन संचय को गलत ठहराने वाले सब उच्च जातीय हिन्दू थे।
��राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले को अपमानित करने वाले सब हिन्दू थे।
��बहुजन शिक्षा की देवी माता सावित्रीबाई फुले पर गोबर फेंकने वाले सब उच्च जातीय हिन्दू थे।
��नारी शिक्षा के विरोधी हिन्दू ब्राह्मण थे।
��1857 की क्रांति के जनक मातादीन भंगी को बन्दुक की बट से मारने वाला नशेड़ी मंगल पाण्डे ब्राह्मण हिन्दू ही था।
��अछूतो के हाथ का खाना ना खाने की सलाह देने वाला मूलशंकर ब्राह्मण उर्फ़ दयानंद सरस्वती हिन्दू ही था।
��बाबा साहब द्वारा बहुजन हितों के लिए लड़ी जा रही लड़ाई में हर कदम पर रोड़ा अटकाने वाले सब हिन्दू थे।
��अछूतो के मताधिकार का विरोध करने वाले सब उच्च जातीय हिन्दू थे।
��तेली, तमोली और कुनभट लोगो के राजनितिक अधिकारो का मजाक उड़ाने वाला तिलक�� ब्राह्मण हिन्दू था।
��अछूतो को हरिजन और गिरिजन कहकर गाली देने वाला बनिया मोहनदास गांधी �� हिन्दू था।
��गोलमेज सम्मलेन में अछूतो के अधिकारो का विरोध करने वाला गांधी�� बनिया हिन्दू था।
��कम्युनल अवार्ड के विरोध में मरण व्रत करने वाला गांधी�� हिन्दू था।
��बाबा साहब पर हमले करने वाले सब हिन्दू थे।
��महाड़ तालाब सत्याग्रह के दौरान बाबा साहब को जान से मारने की कोशिस करने वाले सब उच्च जातीय हिन्दू ही थे।
��कालाराम मंदिर सत्याग्रह के दौरान बाबा साहब पर पत्थर बरसाने वाले सब पंडित पुजारी हिन्दू थे।
��बड़ोदा में बाबा साहब को पानी ना पिने देने वाले सब ब्राह्मण हिन्दू थे।
��संविधान सभा में बाबा साहब के आने का विरोध करने वाले सब उच्च जातीय हिन्दू थे।
��साहब कांशीराम का विरोध करने वाले सब हिन्दू थे।
��दुलिना गाव में बहुजन समाज के 9 लोग जिनमे एक 10 साल का बच्चा भी शामिल था को जिन्दा जलाने वाले सब आर्य समाजी ��हिन्दू ही थे।
��BBC की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में सबसे ज्यादा गुलाम है। इसके लिए जिम्मेदार सब उच्च जातीय हिन्दू ही है।
�� UNO की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 18वे मिनट एक दलित का उत्पीड़न होता है। ये सब उत्पीड़न उच्च जातीय हिन्दू ही करते है।
��अछूतो का मंदिर में घुसने का विरोध करने वाला शंकराचार्य ब्राह्मण हिन्दू है।
��हिमाचल प्रदेश के एक मंदिर के बाहर "अछूत मंदिर में प्रवेश ना करे" का बोर्ड लगाने वाले सब पण्डे हिन्दू ही है।
��गांधी नेहरू को हीरो बनाने वाले और आंबेडकर को कोसने वाले सब हिन्दू ही है।
��बहुजनो के प्रतिनिधित्व और आरक्षण के विरोधी�� सब उच्च जातीय हिन्दू�� ही है।
.................जारी है।
बहुजनो।। एक बनो।। ब्राह्मणवाद को लात मारो। और लात मारो ऐसे धर्म को जो तुम्हे इंसान ना समझता हो। गुलामी को तोड़ो।। गुलामी की जड़ को नष्ट करो।। बाबा साहब को जानो।। बाबा साहब की मानो।।

जय भीम। जय भारत। जय मूलनिवासी

बुधवार, 4 नवंबर 2015

कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-35

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 35
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हम कुछ और क्रियारूपों पर चर्चा करेंगे। 'मैं पढ़ता हूँगा (होऊँगा)', 'मैं पढ़ती हूँगी (होऊँगी), 'तुम पढ़ते होगे', 'मैं पढ़ रहा हूँगा (होऊँगा)', 'मैं पढ़ रही हूँगी (होऊँगी)' आदि में क्रियारूपों में बिन्दी पर ध्यान देकर यह समझा जा सकता है कि कहाँ बिन्दी है और कहाँ नहीं। 'तुम' के साथ 'पढ़ेगी' के स्थान पर 'पढ़ोगी' लिखना और बोलना चाहिए। 'तू' के साथ 'पढ़ेगी' होना चाहिए, 'पढोगी' नहीं। बिहार में 'तुम जाएगी' जैसे अशुद्ध प्रयोग भी धड़ल्ले से चल रहे हैं।
एक खास बात यह है कि सम्बोधन के समय बिन्दी नहीं लगती! लिखते और बोलते समय यह ग़लती 100 में 99 बार की जाती है! 'भाइयो और बहनो', 'देवियो और सज्जनो', 'मित्रो!', 'साथियो', 'मेरे दोस्तो', 'प्यारे बच्चो', 'देशवासियो', 'देशप्रेमियो' आदि के स्थान पर 'मेरे प्यारे दोस्तों', 'भाइयों 'और बहनों', 'मित्रों! आज हम सब रहीम को याद कर रहे हैं!' आदि का प्रयोग उचित नहीं है। ध्यान रहे कि सम्बोधन या उद्बोधन में ही बिन्दी नहीं होती, शेष सभी स्थानों पर वचन के अनुसार हो सकती है। आप अगर मोहम्मद रफी का गाया 'कर चले हम फिदा जानोतन साथियो' सुनें, तो वहाँ 'साथियो' स्पष्ट सुनाई देगा', साथियों' नहीं।
चंद्रबिन्दु का बहुवचन से भी सीधा सम्बन्ध है। ने, को आदि के प्रयोग पर चर्चा करने के पहले वचन पर नज़र डालते हैं। संस्कृत में तीन वचन हैं, एकवचन, द्विवचन और बहुवचन! अंग्रेज़ी में टू राम्स या राम्स जैसे प्रयोग पर कोई सोचेगा भी नहीं, लेकिन संस्कृत में (रामौ या रामाः के रूप में) यह सामान्य बात है। संस्कृत में थोड़ी जटिलता संख्या तक के तीन वचनों में मिलने के कारण भी है! हिन्दी संस्कृत की तुलना में सरल ही कही जाएगी! 10 लकारों में एक ही क्रिया के 90 रूप होने पर भी हिन्दी के सभी प्रकार के वाक्य आसानी से संस्कृत में सीधे अनूदित नहीं हो सकते। क्रियारूपों पर भी संस्कृत से हिन्दी सरल है। हिन्दी भोजपुरी या अंग्रेज़ी की ही तरह दो वचनों वाली भाषा है। एकवचन और बहुवचन, वचन के दो प्रकार हैं।
कुछ लोग समझते हैं कि शेर, हंस, बाघ, बिन्दु आदि के बहुवचन शेरें, हंसें, बाघें, बिन्दुएँ आदि होते हैं। छोटी कक्षाओं को पढ़ाने वाले शिक्षकों को ऐसा लिखते हमने देखा है। यह बिलकुल ग़लत है। भोजपुरी में यह बिलकुल स्पष्ट है, जैसे 'एगो आदमी जाता', 'दस गो हाथी बारन सन', 'ढेरे बानर रहेलन सन' आदि में 'आदमी', 'हाथी', 'बानर' शब्द एकवचन की तरह ही हैं, इनके मूल रूप में कोई बदलाव नहीं हुआ है।
'ने', 'को', 'से', 'के लिए', 'में' आदि विभक्ति चिन्ह हैं। इनके लिए अंग्रेज़ी में प्रिपोज़िशन का इस्तेमाल होता है।
बहुवचन दो प्रकार से बनते हैं, पहला विभक्ति चिन्ह रहित और दूसरा विभक्ति चिन्ह सहित। घर, डाकू, गुरु आदि के विभक्ति चिन्ह रहित बहुवचन और एकवचन रूप एक ही हैं। घर बहुवचन और एकवचन दोनों है। विभक्ति चिन्ह होने पर गुरुओं, घरों, शेरों, हंसों, डाकुओं जैसे रूप बनते हैं। 'चार डाकू जा रहे हैं' और 'चार डाकुओं ने मुझे घेर लिया', इन दो वाक्यों में पहली स्थिति में डाकू के बाद कोई विभक्ति चिन्ह नहीं है, जबकि दूसरी स्थिति में 'ने' विभक्ति चिन्ह होने के कारण डाकुओं हुआ।
बालक, नर जैसे अकारांत पुलिंग; ऋषि, मुनि, कवि जैसे इकारांत पुलिंग; भाई, स्वामी, सिपाही जैसे ईकारांत पुलिंग; साधु, बिन्दु, कृपालु जैसे उकारांत पुलिंग; भालू, उल्लू जैसे ऊकारांत पुलिंग के एकवचन और बहुवचन रूप विभक्ति चिन्ह रहित होने पर समान होते हैं।
कर्ता, दाता, राजा, योद्धा, युवा, देवता, आदि आकारांत (आ की मात्रा से समाप्त होने वाले) शब्द भी विभक्ति चिन्ह रहित होने पर दोनों वचनों में समान होते हैं। विभक्ति चिन्ह रहित सम्बन्ध वाचक शब्द जैसे मामा, काका, दादा, चाचा, भैया, नाना आदि के रूप भी दोनों वचनों में समान होते हैं। 'हरि तुम्हारे मामा हैं' में मामा एकवचन है, जबकि 'नारायण और सुशील हमारे मामा हैं' में मामा बहुवचन है। 'किशोर एक वीर योद्धा है' में योद्धा एकवचन है, जबकि 'बड़े-बड़े योद्धा मारे गए हैं' में योद्धा बहुवचन है।
विभक्ति चिन्ह रहित अन्य आकारांत पुलिंग शब्दों के आकार के स्थान पर एकार रखकर बहुवचन बनाते हैं; जैसे दिया से दिए; पैसा से पैसे; बच्चा से बच्चे; गधा से गधे आदि।
फिलहाल हम विभक्ति चिन्ह रहित शब्दों पर ही बात करते हैं। अकारान्त स्त्रीलिंग के अन्त में एँ जोड़कर बहुवचन बनाते हैं, जैसे बात से बातें, किताब से किताबें, रात से रातें, सड़क से सड़कें, बहन से बहनें, आदत से आदतें आदि। इकारान्त स्त्रीलिंग होने पर याँ जोड़कर बहुवचन बनाते हैं, जैसे तिथि से तिथियाँ, विधि से विधियाँ आदि। ईकारान्त स्त्रीलिंग होने पर अन्तिम ईकार को इकार में बदलकर याँ जोड़ते हैं यानी इयाँ जोड़ते हैं, जैसे नदी से नदियाँ, गा

शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2015

शुद्रो का इतिहास

HShudro Ka Itihas
आज कल हमारे भारत के स्कूलों और कॉलेजों में जो भारत का इतिहास पढाया जाता है, उस इतिहास और वास्तविक इतिहास में बहुत अंतर है । वेदों और पुराणों में जो इतिहास वर्णित है, वो भी मात्र एक कोरा झूठ है । क्या कभी किसी ने सोचा जो भी इतिहास हमारे पुराणों, वेदों और किताबों में वर्णित है उस में कितना झूठ लिखा है । जो कभी घटित ही नहीं हुआ उसे आज भारत का इतिहास बना कर भारत की नयी पीढ़ी को गुमराह किया जा रहा है । पुराणों-वेदों में वर्णित देवता और असुरों का इतिहास? क्या कभी भारत में देवता का हुआ करते थे‌? जो हमेशा असुरों से लड़ते रहते थे. आज वो देवता और असुर कहाँ है?
भारत में कभी भी ना तो कभी देवता थे, ना है और ना ही कभी होंगे । ना ही भारत में कभी असुर थे, ना है और ना ही कभी होंगे । ये शास्वत सत्य है ।
shudro ka itihas
1आज नहीं तो कल पुरे भारत को यह बात माननी ही होगी । क्योकि इन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है । जिन बातों का कोई वैज्ञानिक आधार ही नहीं है, उन बातों को इतिहासकारों ने सच कैसे मान लिया? इतिहासकारों ने बहुत घृणित कार्य किया है । उन्होंने बिना किसी वैज्ञानिक आधार पर बिना कोई शोध किये देवी-देवताओं को भारत के इतिहास की शान बना दिया । देवता भी इसे अजीब अजीब की कोई भी बुद्धिमान व्यक्ति विश्वास ही नहीं कर सकता । विष्णु जो एक अच्छा खासा इन्सान हुआ करता था, आज वेदों और पुराणों के झूठ के कारण सारी दुनिया का पालक भगवान् बना बैठा है । ऊपर से विष्णु के नाम के साथ ऐसे ऐसे कार्य जोड़ दिए है कि आज स्वयं विष्णु इस धरती पर आ जाये तो बेचारा शर्म के मारे डूब मरे । ये सिर्फ एक विष्णु की ही बात नहीं है, कुल मिला कर 33 करोड़ ऐसे अजीब नमूने हमारे इतिहास में भरे पड़े है । ऊपर से इतिहास में ब्राह्मणों के ऐसे कृत्य लिखे हुए है, अगर ब्राह्मणों में शर्म नाम की और मानवता नाम की कोई चीज होती तो आज पूरा ब्राह्मण समाज डूब के मर जाता । क्या पूरा देश सिर्फ एक ही वर्ग के लोगों ने चलाया? क्या पिछले 2000 सालों में समाज के दुसरे वर्गों ने भारत के लोगों के लिए कुछ भी नहीं किया? अगर किया.. तो इतिहासकारों ने दुसरे वर्गों के बारे क्यों नहीं लिखा? और जो लिखा है उस में इतना झूठ क्यों? इन सब बातों का एक ही अर्थ निकालता है कि भारत के इतिहासकार बिकाऊ थे और आज भी भारत के बिकाऊ इतिहासकार चंद सिक्को के बदले पुरे देश की जनता की भावनाओं से खेल रहे है । हमारे समाज के 5% ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों को दुनिया की सबसे ऊँची जाति लिख कर बाकि सभी जातियों (95% लोगों) के साथ इन इतिहासकारों ने नाइंसाफी की है । अगर किसी से पूछा जाये कि ईसा से 3200 साल पहले के इतिहास का कोई वर्णन क्यों नहीं है? तो उत्तर मिलाता है इस पहले कोई विवरण कही नहीं है । लेकिन हम पूछते है, क्या इतिहासकरों ने कोई अच्छा शोध किया? इतिहासकारों ने इतिहास लिखने से पहले पुराणी किताबों को पढ़ा? क्या इतिहासकारों ने देश के सभी एतिहासिक स्थानों पर शोध किये? अगर किये तो वो शोध साफ़ और स्पष्ट क्यों नहीं है? तो कहा है भारत का इतिहास?
आज भारत के बाहर निकालो तो सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है । अगर कोई भारतीय विदेशियों को अपना इतिहास बताता है तो सभी विदेशी बहुत हंसते है, मजाक बनाते है । सारी दुनिया को भारत का इतिहास पता है, फिर भी भारत के 95% लोगों को अँधेरे में रखा गया है । क्योकि अगर भारत का सच्चा इतिहास सामने आ गया तो ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों द्वारा समाज के सभी वर्गों पर किये गए अत्याचार सामने आ जायेंगे, और देश के लोग हिन्दू नाम के तथाकथित धर्म की सचाई जानकर हिन्दू धर्म को मानने से इनकार कर देंगे । कोई भी भारतवासी हिन्दू धर्म को नहीं मानेगा । ब्राह्मणों का समाज में जो वर्चस्व है वो समाप्त हो जायेगा ।

बहुत से लोग ये नहीं जानते कि भारत में कभी देवता थे ही नहीं, और न ही असुर थे । ये सब कोरा झूठ है, जिसको ब्राह्मणों ने अपने अपने फायदे के लिए लिखा था, और आज भी ब्राह्मण वर्ग इन सब बातों के द्वारा भारत के समाज के हर वर्ग को बेबकुफ़ बना रहा है । अगर आम आदमी अपने दिमाग पर जोर डाले और सोचे, तो सारी सच्चाई सामने आ जाती है । ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य ईसा से 3200 साल पहले में भारत में आये थे । आज ये बात विज्ञान के द्वारा साबित हो चुकी है । लेकिन ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य इतने चतुर है कि वो विज्ञान के द्वारा प्रमाणित इतिहास और जानकारी भारत के अन्य लोगों के साथ बांटना ही नहीं चाहते । क्योकि अगर ये जानकारी भारत के लोगो को पता चल गई तो भारत के लोग ब्राह्मणों, राजपूतो और वैश्यों को देशद्रोही, अत्याचारी और अधार्मिक सिद्ध कर के देश से बाहर निकल देंगे । भारत के लोगों को सच्चाई पता ना चले इस के लिए आज भी ब्राह्मणों ने ढेर सारे संगठन जैसे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी, शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी बना रखे है. हजारों धर्मगुरु बना रखे है. जो सिर्फ ढोग, पाखंड और भारत के लोगों को झूठ बता कर अँधेरे में रखते है, क्यों रखते है? ताकि भारत के 95% लोगों को भारत का सच्चा इतिहास पता ना चल जाये । और वो 95% लोग ब्राह्मणों को देशद्रोही करार दे कर भारत से बाहर ना निकल दे । भारत से ब्राह्मणों का वर्चस्व ही ख़त्म ना हो जाये ।

यह भारत के सच्चे इतिहास की शुरुआत है तो यहाँ कुछ बातों पर प्रकाश डालना बहुत जरुरी है । ताकि लोगों को थोडा तो पता चले कि आखिर ब्राह्मणों, राजपूतों और वैश्यों ने भारत में आते ही क्या किया जिस से उनका वर्चस्व भारत पर कायम हो पाया:
1.ईसा से 3200 साल पहले जब भारत में रुद्रों का शासन हुआ करता था । भारत में एक विदेशी जाति आक्रमण करने और देश को लूटने के उदेश्य आई । वह जाति मोरू से यहाँ आई जिनको “मोगल” कहा जाता था । मोरू प्रदेश, काला सागर के उत्तर में यूरेशिया को बोला जाता था । यही यूरेशियन लोग कालांतर में पहले “देव” और आज ब्राह्मण कहलाते है । यूरेशियन लोग भारत पर आक्रमण के उदेश्य से यहाँ आये थे । लेकिन भारत में उस समय गण व्यवस्था थी, जिसको पार पाना अर्थात जीतना युरेशिनों के बस की बात नहीं थी । भारत के मूल-निवासियों और यूरेशियन आर्यों के बीच बहुत से युद्ध हुए । जिनको भारत के इतिहास और वेद पुराणों में सुर-असुर संग्राम के रूप में लिखा गया है । भारत की शासन व्यवस्था दुनिया की श्रेष्ठतम शासन व्यवथा थी । जिसे गण व्यवस्था कहा जाता था और आज भी दुनिया के अधिकांश देशों ने इसी व्यवस्था को अपनाया है । ईसा पूर्व 3200 के बाद युरेशियनों और मूल निवासियों के बीच बहुत से युद्ध हुए जिन में यूरेशियन आर्यों को हार का मुंह देखना पड़ा।

2.पिछले कई सालों में भारत में इतिहास विषय पर हजारों शोध हुए । जिस में कुछ शोधों का उलेख यहाँ किया जाना बहुत जरुरी है । जैसे संस्कृत भाषा पर शोध, संस्कृत भाषा के लाखों शब्द रूस की भाषा से मिलते है । तो यह बात यहाँ भी सिद्ध हो जाती है ब्राहमण यूरेशियन है । तभी आज भी इन लोगों की भाषा रूस के लोगों से मिलती है । कालांतर में यूरेशिया में इन लोगों का अस्तिव ही मिट गया तो भारत में आये हुए युरेशियनों के पास वापिस अपने देश में जाने रास्ता भी बंद हो गया और यूरेशियन लोग भारत में ही रहने पर मजबूर हो गए । युरेशियनों को मजबूरी में भारत में ही रहना पड़ा और आज यूरेशियन भारत का ही एक अंग बन गए है, जिनको आज के समय में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य कहा जाता है ।

3.ईसा पूर्व 3200 में यूरेशिया से आये लोगों की चमड़ी का रंग गोरा था, आँखों का रंग हल्का था और इनकी खोपड़ी लम्बाई लिए हुए थी । ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य यूरेशिया से आये है. यह बात 2001 में प्रसिद्ध शोधकर्ता माइकल बामशाद ने वाशिंगटन विश्वविद्यालय में भारत की सभी जातियों के लोगों का DNA परिक्षण करके सिद्ध कर दी थी । DNA परिक्षण में यह बात साफ़ हो गई थी कि क्रमश: ब्राह्मण का 99.90%, राजपूत का 99.88% और वैश्य का 99.86% DNA यूरेशियन लोगों से मिलता है । बाकि सभी जाति के लोगों का DNA सिर्फ भारत के ही लोगों के साथ मिलाता है ।

4.जब यूरेशियन भारत में आये तो यह आक्रमणकारी लोग नशा करते थे । जिसको कालांतर में “सोमरस” और आज शराब कहा जाता है । यूरेशियन लोग उस समय सोमरस पीते थे तो अपने आपको “सुर” और अपने समाज को “सुर समाज” कहते थे । यूरेशियन लोग ठंडे प्रदेशों से भारत में आये थे, ये लोग सुरापान करते थे तो इन लोगों ने भारत पर कुटनीतिक रूप से विजय पाने के लिए अपने आपको देव और अपने समाज को देव समाज कहना प्रारम्भ कर दिया ।

5.भारत के लोग अत्यंत उच्च कोटि के विद्वान हुआ करते थे । इस बात का पता गण व्यवस्था के बारे अध्ययन करने से चलता है । आज जिस व्यवथा को दुनिया के हर देश ने अपनाया है, और जिस व्यवस्था के अंतर्गत भारत पर सरकार शासन करती है । वही व्यवस्था 3200 ईसा पूर्व से पहले भी भारत में थी । पुरे देश का एक ही शासन कर्ता हुआ करता था । जिसको गणाधिपति कहा जाता था । गणाधिपति के नीचे गणाधीश हुआ करता था, और गणाधीश के नीचे विभिन्न गण नायक हुआ करते थे जो स्थानीय क्षेत्रों में शासन व्यवस्था देखते या संभालते थे । यह व्यवस्था बिलकुल वैसी थी । जैसे आज भारत का राष्ट्रपति, फिर प्रधानमंत्री और प्रधानमंत्री के नीचे अलग अलग राज्यों के मुख्मंत्री । कालांतर में भारत पर रुद्रों का शासन हुआ करता था । भारत में कुल 11 रूद्र हुए जिन्होंने भारत पर ईसा से 3200 साल के बाद तक शासन किया। सभी रुद्रों को भारत का सम्राट कहा जाता था और आज भी आप लोग जानते ही होंगे कि शिव से लेकर शंकर तक सभी रुद्रों को देवाधिदेव, नागराज, असुरपति जैसे शब्दों से बिभुषित किया जाता है । रुद्र भारत के मूल निवासी लोगों जिनको उस समय नागवंशी कहा जाता था पर शासन करते थे । इस बात का पता “वेदों और पुराणों” में वर्णित रुद्रों के बारे अध्ययन करने से चलता है । आज भी ग्यारह के ग्यारह रुद्रों को नाग से विभूषित दिखाया जाता है । नागवंशियों में कोई भी जाति प्रथा प्रचलित नहीं थी । इसी बात से पता चलता है कि भारत के लोग कितने सभ्य, सुशिक्षित और सुशासित थे । इसी काल को भारत का “स्वर्ण युग” कहा जाता था और भारत को विश्व गुरु होने का गौरव प्राप्त था ।

6.असुर कौन थे? ये भी एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रश्न है । क्योकि भारत के बहुत से धार्मिक गर्न्थो में असुरों का वर्णन आता है । लेकिन ये बात आज तक सिद्ध नहीं हो पाई कि असुर थे भी या नहीं । अगर थे, तो कहा गए? और आज वो असुर कहा है? इस प्रश्न का उत्तर पाने के लिए हमे वेदों और पुराणों का अध्ययन करना पड़ेगा । आज भी हम खास तौर पर “शिव महापुराण” का अध्ययन करे तो असुरों के बारे सब कुछ स्पष्ट हो जाता है । असुराधिपति भी रुद्रों को ही कहा गया है । शिव से लेकर शंकर तक सभी रुद्रों को असुराधिपति कहा जाता है । आज भी रुद्रों को असुराधिपति होने के कारण अछूत या शुद्र देवता कहा जाता है । कोई भी ब्राह्मण रूद्र पूजा के बाद स्नान करने के बाद ही मंदिरों में प्रवेश करते है या गंगा जल इत्यादि अपने शरीर पर छिड़क कर दुसरे देवताओं की पूजा करते है । नागवंशी लोग सांवले या काले रंग के हुआ करते थे और नागवंशी सुरापान नहीं करते थे । आज भी आपको जगह जगह वेदों और पुराणों में लिखा हुआ मिल जायेगा कि नाग दूध पीते है कोई भी नाग “सूरा” अर्थात शराब का सेवन नहीं करते थे । अर्थात भारत के मूल निवासी कालांतर में असुर कहलाये और आज उन्ही नागवंशियों को शुद्र कहा जाता है ।

7.युरेशियनों ने भारत कूटनीति द्वारा भारत की सता हासिल की और पहले तीन महत्वपूर्ण नियम बनाये जिनके करना आज भी ब्राहमण पुरे समाज में सर्वश्रेठ माने जाते है:

8.वर्ण-व्यवस्था: युरेशियनों ने सबसे पहले वर्ण-व्यवस्था को स्थापित किया अर्थात यूरेशियन साफ़ रंग के थे तो उन्हों ने अपने आपको श्रेष्ठ पद दिया । यूरेशियन उस समय देवता कहलाये और आज ब्राह्मण कहलाते है । भारत के लोग देखने में सांवले और काले थे तो मूल निवासियों को नीच कोटि का बना दिया गया । 400 ईसा पूर्व या उस से पहले भारत के मूल निवासियों को स्थान और रंग के आधार पर 3000 जातियों में बांटा गया । आधार बनाया गया वेदों और पुराणों को, जिनको यूरेशियन ने संस्कृत में लिखा । भारत के मूल निवासियों को संस्कृत का ज्ञान नहीं था तो उस समय जो भी यूरेशियन बोल देते थे उसी को भारत के मूल निवासियों ने सच मान लिया । जिस भी मूल निवासी राजा ने जाति प्रथा का विरोध किया उसको युरेशियनों ने छल कपट या प्रत्यक्ष युद्धों में समाप्त कर दिया । जिस का वर्णन सभी वेदों और पुराणों में सुर-असुर संग्रामों के रूप में मिलाता है । लाखों मूल निवासियों को मौत के घाट उतारा गया । कालांतर में उसी जाति प्रथा को 3000 जातियों को 7500 उप जातियों में बांटा गया ।

9.शिक्षा-व्यवस्था: इस व्यवस्था के अंतर्गत युरेशियनों ने भारत के लोगों के पढ़ने लिखने पर पूर्ण पाबन्दी लगा दी । कोई भी भारत का मूल-निवासी पढ़ लिख नहीं सकता था । सिर्फ यूरेशियन ही पढ़ लिख सकते थे । भारत के लोग पढ़ लिख ना पाए इस के लिए कठोर नियन बनाये गए । मनु-स्मृति का अध्ययन किया जाये तो यह बात सामने आती है । कोई भी भारत का मूल निवासी अगर लिखने का कार्य करता था तो उसके हाथ कट देने का नियम था । अगर कोई मूल-निवासी वेदों को सुन ले तो उसके कानों में गरम शीशा या तेल से भर देने का नियम था । इस प्रकार भारत के लोगों को पढने लिखने से वंचित कर के युरेशियनों ने वेदों और पुराणों में अपने हित के लिए मनचाहे बदलाव किये । ये व्यवस्था पहली इसवी से 1947 तक चली । जब 1947 में देश आज़ाद हुआ तो डॉ भीमा राव अम्बेडकर के प्रयासों से भारत के मूल-निवासियों को पढ़ने लिखने का अधिकार मिला । आज भी ब्राह्मण वेदों और पुराणों में नए नए अध्याय जोड़ते जा रहे है और भारत के मूल निवासियों को कमजोर बनाने का प्रयास सतत जारी है ।

10.धर्म व्यवस्था: धर्म व्यवस्था ही भारत के मूल निवासियों के पतन के सबसे बड़ा कारण था । धर्म व्यवस्था कर के युरेशियनों ने अपने आपको भगवान् तक घोषित के दिया । धर्म व्यवस्था कर के युरेशियनों ने खुद को देवता बना कर हर तरह से समाज में श्रेष्ठ बना दिया । धर्म व्यवस्था में “दान का अधिकार” बना कर युरेशियनों ने अपने आपको काम करने से मुक्त कर दिया और अपने लिए मुफ्त में ऐश करने प्रबंध भी इसी दान के अधिकार से कर लिया । धर्म व्यवस्था के नियम भी बहुत कठोर थे । जैसे कोई भी भारत का मूल निवासी मंदिरों, राज महलों और युरेशियनों के आवास में नहीं जा सकता था । अगर कोई मूल निवासी ऐसा करता था तो उसको मार दिया जाता था । आज भी यूरेशियन पुरे भारत में अपने घरों में मूल निवासियों को आने नहीं देते । आज भी दान व्यवस्था के चलते भारत के मंदिरों में कम से कम 10 ट्रिलियन डॉलर की संम्पति युरेशियनों के अधिकार में है । जो मुख्य तौर पर भारत में गरीबी और ख़राब आर्थिक हालातों के लिए जिमेवार है । संम्पति के अधिकार हासिल कर के तो युरेशियनों ने मानवता की सारी सीमा ही तोड़ दी । यहाँ तक भारत में रूद्र शासन से समय से पूजित नारी को भी संम्पति में शामिल कर लिया । नारी को संम्पति में शामिल करने से भी भारत के मूल निवासियों का पतन हुआ । संम्पति के अधिकार भी बहुत कठोर थे । जैसे यूरेशियन सभी प्रकार की संम्पतियों का मालिक था । भारत के मूल निवासियों को संम्पति रखने का अधिकार नहीं था । यूरेशियन भारत की किसी भी राजा की संम्पति को भी ले सकता था । यूरेशियन किसी भी राजा की उसके राज्य से बाहर निकल सकता था । यूरेशियन किसी की भी स्त्री की ले सकता था । यहाँ तक युरेशियनों को राजा की स्त्री के साथ संम्भोग की पूर्ण आज़ादी थी । अगर किसी राजा के सन्तान नहीं होती थी तो यूरेशियन राजा की स्त्री के साथ संम्भोग कर बच्चे पैदा करता था । जिसे कालांतर में “नियोग” पद्धति कहा जाता था । इस प्रकार राजा की होने वाली संतान भी यूरेशियन होती थी । शुद्र व्यवस्था के द्वारा तो युरेशियनों ने सारे देश के मूल निवासियों को अत्यंत गिरा हुआ बना दिया । हज़ारों कठोर नियम बनाये गए । मूल निवासियों का हर प्रकार से पतन हो गया । मूल निवासी किसी भी प्रकार से ऊपर उठने योग्य ही नहीं रह गए । मूल निवासियों पर शासन करने के लिए और बाकायदा मनु-स्मृति जैसे बृहद ग्रन्थ की रचना की गई । आज भी लोग 2002 से पहले प्रकाशित के मनु-स्मृति की प्रतियों को पढेंगे तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी ।

ये कुछ महत्वपूर्ण बातें थी जिन पर भारत का इतिहास लिखने से पहले प्रकाश डालना जरुरी था । यही कुछ बातें है जिनका ज्ञान भारत के मूल निवासियों को होना बहुत जरुरी है । अगर भारत के मूल निवासी युरेशियनों के बनाये हुए नियमों को मानने से मना कर दे । युरेशियनों की बनायीं हुई वर्ण व्यवस्था, जाति व्यवस्था, संम्पति व्यवस्था, वेद व्यवस्था, धर्म व्यवस्था को ना माने । सभी मूल निवासी ब्राह्मणों के बनाये हुए जातिवाद के बन्धनों से स्वयं को मुक्त करे और सभी मूल निवासी नागवंशी समाज की फिर से स्थापना करे । सभी मूल निवासी मिलजुल कर देश का असली इतिहास अपने लोगों को बताये । सभी नागवंशी अपनी क़ाबलियत को समझे । तभी भारत के मूल निवासी पुन: उसी विश्व गुरु के पद को प्राप्त कर सकते है और भारत में फिर से स्वर्ण युग की स्थापना कर सकते है । जल्दी ही भारत का विस्तृत इतिहास अलग अलग अध्यायों के रूप में प्रस्तुत किया जायेगा । हमारी टीम रात दिन भारत के इतिहास पर हुए हजारों शोधों और पुस्तकों का अध्ययन कर रही है, और भारत का सच्चा इतिहास लिखा जा रहा है ।

आप सभी से विनम्र प्रार्थना है कि भारत का इतिहास सभी लोगों तक पहुंचाए।