रविवार, 17 जनवरी 2016

डॉ भीमराव आंबेडकर की विशेषताए

बाबासाहब अंबेडकर 9 भाषाएँ जानते थे।
1) मराठी
2) हिन्दी
3) संस्कृत
4) गुजराती
5) अंग्रेज़ी
6) पारसी
7) जर्मन
8) फ्रेंच
9) पाली

उन्होंने
पाली व्याकरण और शब्दकोष (डिक्शनरी)
भी लिखी थी जो महाराष्ट्र
सरकार ने Dr.Babasaheb Ambedkar Writing and
Speeches Vol.16 में प्रकाशित की हैं।

*** बाबासाहब अंबेडकर जी ने संसद में पेश किए हुए
विधेयक

महार वेतन बिल
हिन्दू कोड बिल
जनप्रतिनिधि बिल
खोती बिल
मंत्रीओं का वेतन बिल
मजदूरों के लिए वेतन (सैलरी) बिल
रोजगार विनिमय सेवा
पेंशन बिल
भविष्य निर्वाह निधी (पी.एफ्.)

*** बाबासाहब के सत्याग्रह (आंदोलन)
1) महाड आंदोलन 20/3/1927
2) मोहाली (धुले) आंदोलन 12/2/1939
3) अंबादेवी मंदिर आंदोलन 26/7/1927
4) पुणे कौन्सिल आंदोलन 4/6/1946
5) पर्वती आंदोलन 22/9/1929
6) नागपूर आंदोलन 3/9/1946
7) कालाराम मंदिर आंदोलन 2/3/1930
8) लखनौ आंदोलन 2/3/1947
9) मुखेडका आंदोलन 23/9/1931

*** बाबासाहब अंबेडकर द्वारा स्थापित सामाजिक संघटन
1) बहिष्कृत हितकारिणी सभा - 20 जुलै 1924
2) समता सैनिक दल - 3 मार्च 1927
राजनीतिक संघटन
1) स्वतंत्र मजदूर पार्टी - 16 अगस्त 1936
2) शेड्युल्ड कास्ट फेडरेशन- 19 जुलै 1942
3) रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया- 3 अक्तूबर 1957

धार्मिक संघटन
1) भारतीय बौद्ध महासभा - 4 मई 1955
शैक्षणिक संघटन
1) डिप्रेस क्लास एज्युकेशन सोसायटी- 14 जून
1928
2) पीपल्स एज्युकेशन सोसायटी- 8 जुलै
1945
3) सिद्धार्थ काॅलेज, मुंबई- 20 जून 1946
4) मिलींद काॅलेज, औरंगाबाद- 1 जून 1950

अखबार, पत्रिकाएँ
1) मूकनायक- 31 जनवरी 1920
2) बहिष्कृत भारत- 3 अप्रैल 1927
3) समता- 29 जून 1928
4) जनता- 24 नवंबर 1930
5) प्रबुद्ध भारत- 4 फरवरी 1956

*** बाबासाहब अंबेडकर जी ने अपने जीवन में विभिन्न
विषयों पर 527 से ज्यादा भाषण दिए।

***बाबासाहब अंबेडकर को प्राप्त सम्मान
1) भारतरत्न
2) The Greatest Man in the World (Columbia
University)
3) The Universe Maker (Oxford University)
4) The Greatest Indian (CNN IBN & History Tv
18)

*** बाबासाहब अंबेडकर जी इनकी
निजी किताबें (उनके पास थी)
1) अंग्रेजी साहित्य- 1300 किताबें
2) राजनिती- 3,000 किताबें
3) युद्धशास्त्र- 300 किताबें
4) अर्थशास्त्र- 1100 किताबें
5) इतिहास- 2,600 किताबें
6) धर्म- 2000 किताबें
7) कानून- 5,000 किताबें
8) संस्कृत- 200 किताबें
9) मराठी- 800 किताबें
10) हिन्दी- 500 किताबें
11) तत्वज्ञान (फिलाॅसाफी)- 600 किताबें
12) रिपोर्ट- 1,000
13) संदर्भ साहित्य (रेफरेंस बुक्स)- 400 किताबें
14) पत्र और भाषण- 600
15) जिवनीयाँ (बायोग्राफी)- 1200
16) एनसाक्लोपिडिया ऑफ ब्रिटेनिका- 1 से 29 खंड
17) एनसाक्लोपिडिया ऑफ सोशल सायंस- 1 से 15 खंड
18) कैथाॅलिक एनसाक्लोपिडिया- 1 से 12 खंड
19) एनसाक्लोपिडिया ऑफ एज्युकेशन
20) हिस्टोरियन्स् हिस्ट्री ऑफ दि वर्ल्ड- 1 से 25
खंड
21) दिल्ली में रखी गई किताबें- बुद्ध
धम्म, पालि साहित्य, मराठी साहित्य- 2000 किताबें
22) बाकी विषयों की 2305 किताबें
बाबासाहब जब अमेरिका से भारत लौट आए तब एक बोट दुर्घटना में
उनकी सैंकडो किताबें समंदर मे डूबी।

*** बाबासाहब अंबेडकर जी
1) महान समाजशास्त्री
2) महान अर्थशास्त्री
3) संविधान शिल्पी
4) आधुनिक भारत के मसीहा
5) इतिहास के ज्ञाता और रचियाता
6) मानवंशशास्त्र के ज्ञाता
7) तत्वज्ञानी (फिलाॅसाॅफर)
8) दलितों के और महिला अधिकारों के मसिहा
9) कानून के ज्ञाता (कानून के विशेषज्ञ)
10) मानवाधिकार के संरक्षक
11) महान लेखक
12) पत्रकार
13) संशोधक
14) पाली साहित्य के महान अभ्यासक
(अध्ययनकर्ता)
15) बौध्द साहित्य के अध्ययनकर्ता
16) भारत के पहले कानून मंत्री
17) मजदूरों के मसिहा
18) महान राजनितीज्ञ
19) विज्ञानवादी सोच के समर्थक
20) संस्कृत और हिन्दू साहित्य के गहन अध्ययनकर्ता थे।

*** बाबासाहब अंबेडकर की कुछ विशेषताएँ
1) पानी के लिए आंदोलन करनेवाले विश्व के पहले
महापुरुष
2) लंदन विश्वविद्यालय के पुरे लाईब्ररी के किताबों
की छानबीन कर उसकी
जानकारी रखनेवाले एकमात्र महामानव
3) लंदन विश्वविद्यालय के 200 छात्रों में नंबर 1 का छात्र होने
का सम्मान प्राप्त होनेवाले पहले भारतीय
4) विश्व के छह विद्वानों में से एक
5) विश्व में सबसे अधिक पुतले बाबासाहब अंबेडकर
जी के हैं।
6) लंदन विश्वविद्यालय मे डी.एस्.सी.
यह उपाधी पानेवाले पहले और आखिरी
भारतीय
7) लंदन विश्वविद्यालय का 8 साल का पाठ्यक्रम 3 सालों मे पूरा
करनेवाले महामानव

*** बाबासाहब अंबेडकर जी के वजह से
ही भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना हुईं।
बाबासाहब अंबेडकर जी ने अपने डाॅक्टर ऑफ सायंस
के लिए ' दि प्राॅब्लेम ऑफ रूपी' यह शोध प्रबंध लिखा
था। Indian Money & Finance इसके अभ्यास के लिए
ब्रिटिशों ने जो कमिशन चुना था उनको बाबासाहब ने एक निवेदन
(स्टेटमेंट) प्रस्तुत किया था।

इतने महान थे बाबा साहब.....��

बाबा साहेब के विचार

डॉ.बाबासाहेब अम्बेडकर के शिक्षा के प्रति विचार:
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_8.html

1930 में  डॉ. आंबेडकर ने यह कहा था -"अधिक बच्चे पैदा करना एक सामाजिक अपराध है।"
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/1930.html

बाबासाहब अंबेडकर जी ने संसद में पेश किए हुए विधेयक
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_35.html

डॉ भीमराव अम्बेडकर के जीवन की सच्ची प्रेरणादायक बातें - संकलन: निखिल सबलानिया
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_3.html

देश के करंसी नोटों में आंबेडकर और विवेकानंद की एंट्री
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_60.html

डॉ. आंबेडकर बीमार हिंदू की नब्ज पर हाथ रखकर कहते हैं कि...
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_82.html
 
बाबासाहेब अम्बेडकर को जब काका कालेलकर कमीशन 1953 में मिलने के लिऐ गये
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/1953.html

डा. बी आर अम्बेडकर द्वारा धम्म परिवर्तन के अवसर पर
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_54.html

यदि बाबा साहब भीम राव आंबेडकर होते
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_77.html

"स्त्री तब तक 'चरित्रहीन' नहीं हो सकती, जब तक पुरुष चरित्रहीन न हो "- गौतम बुद्ध
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_47.html

भारत के मूल निवासी चूंकि जंगल की रक्षा करते थे इसलिए उन्हें रक्षक यानी राक्षस कहा गया
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_72.html

वर्तमान हिन्दू धर्म,वैदिक ब्राह्मणों ने बौद्ध धर्म से चुराया और अपना लेबल चिपकाकर मार्किट में उतारा है
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_55.html

एक षड्यंत्र के तहत जातियां बनाकर उनमें ऊंच नीच के आधार पर भेदभाव करने की घटिया हरकतों को धर्म कह रहे हैं
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_65.html

ब्राह्मण दिन रात हिन्दू हिन्दू क्यों चिल्लाते रहता है इसका एक सनसनीखेज खुलासा
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_53.html

देश को गुलाम बनाए रखने में ब्राह्मणग्रंथों का बहुत बड़ा योगदान है
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_91.html

ऐतिहसिक घटना जलियॉ वाला बाग़ की घटना के बारे में
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_59.html

हम हिन्दू नही हैं
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_19.html

शंकराचार्य स्वरुपानंद जी का भारत देश के लिये क्या योगदान है ?
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_39.html

यदि विश्व में सोने के तख्त पर कोई व्यक्ति बैठता है तो वह एक व्यक्ति भारत का गुरू शंकराचार्य ही है
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_56.html

एक षड्यंत्र के तहत जातियां बनाकर उनमें ऊंच नीच के आधार पर भेदभाव करने की घटिया हरकतों को धर्म कह रहे हैं
http://ambedkartimes.blogspot.in/2016/01/blog-post_65.html

In posts ko likhne ke liye Ambedkarwadiyo ka dhanyawad. - Nikhil Sablania. M. +918527533051. Jai Bhim.

रविवार, 20 दिसंबर 2015

क्या है पूना पैक्ट ?

पूना पैक्ट क्या है?
----------------------------------बाबा साहेब ने अछूतों की समस्याओं को ब्रिटिश सरकार के सामने रखा था....

और उनके लिए कुछ विशेष सुविधाएँ प्रदान किये जाने की मांग की....

बाबा साहेब की तर्कसंगत बातें मानकर ब्रिटिश सरकार ने विशेष सुविधाएँ देने के लिए बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जी का आग्रह मान लिया.....

और 1927 में साइमन कमीशन भारत आया,

मिस्टर गांधी को साइमन कमीशन का भारत आना पसंद नहीं आया,

अतः उन्होंने जबर्दस्त नारे लगवाया, "साइमन कमीशन गो बैक"

बाबा साहेब ने ब्रिटिश सरकार के सामने यह स्पष्ट किया कि....

अस्पृश्यों का हिन्दुओं से अलग अस्तित्व है....

वे गुलामों जैसा जीवन जी रहे है,

इनको न तो सार्वजानिक कुओं से पानी भरने की इज़ाज़त है न ही पढ़ने लिखने का अधिकार है,

हिन्दू धर्म में अछूतों के अधिकारों का अपहरण हुआ है....

और इनका कोई अपना अस्तित्व न रहे इसी लिए इन्हें हिन्दू धर्म का अंग घोषित करते रहते है....

सन 1930, 1931, 1932, में लन्दन की गोलमेज कॉन्फ्रेंस में बाबा साहेब डा. अम्बेडकर जी ने अछूत कहे जाने वाले समाज की वकालत की....

उन्होंने ब्रिटिश सरकार को भी नहीं बख्सा और कहा कि.....

क्या अंग्रेज साम्राज्यशाही ने छुआ-छूत को ख़त्म करने के लिए कोई कदम उठाया.....

ब्रिटिश राज्य के डेढ़ सौ वर्षों में अछूतों पर होने वाले जुल्म में कोई कमी नहीं आई....

बाबा साहेब ने गोलमेज कॉन्फ्रेंस में जो तर्क रखे वो इतने ठोस और अधिकारपूर्ण थे कि ब्रिटिश सरकार को बाबा साहेब के सामने झुकना पड़ा....

1932 में रामसे मैक्डोनल्ड ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए एक तत्कालीन योजना की घोषणा की....

इसे कम्युनल एवार्ड के नाम से जाना गया....

इस अवार्ड में अछूत कहे जाने वाले समाज को दुहरा अधिकार मिला....

1⃣प्रथम वे सुनिश्चित सीटों की आरक्षित व्यवस्था में अलग चुनकर जाएंगे.....

2⃣और दूसरा दो वोटों का अधिकार मिला,

एक वोट आरक्षित सीट के लिए और दूसरा वोट अनारक्षित सीट के लिए....

यह अधिकार दिलाने से बाबा साहेब डा. अम्बेडकर का कद समाज में काफी ऊँचा हो गया,

डा. अम्बेडकर जी ने इस अधिकार के सम्बन्ध में कहा....

पृथक निर्वाचन के अधिकार की मांग से हम हिन्दू धर्म का कोई अहित नहीं करने वाले है,

हम तो केवल उन सवर्ण हिन्दुओं के ऊपर अपने भाग्य निर्माण की निर्भरता से मुक्ति चाहते है....

मिस्टर गांधी कम्युनल एवार्ड के विरोध में थे....

वे नहीं चाहते थे कि अछूत समाज हिन्दुओं से अलग हो....

वे अछूत समाज को हिन्दुओं का एक अभिन्न अंग मानते थे....

लेकिन जब बाबा साहेब डा. अम्बेडकर ने गांधी से प्रश्न किया कि....

अगर अछूत हिन्दुओं का अभिन्न अंग है तो फिर उनके साथ जानवरों जैसा सलूक क्यों..?

लेकिन इस प्रश्न का जवाब मिस्टर गांधी बाबा साहेब को कभी नहीं दे पाएं....

बाबा साहेब ने मिस्टर गांधी से कहा कि....

मिस्टर मोहन दास करम चन्द गांधी....

आप अछूतों की एक बहुत अच्छी नर्स हो सकते है....

परन्तु मैं उनकी माँ हूँ....

और माँ अपने बच्चों का अहित कभी नहीं होने देती है....

मिस्टर गांधी ने कम्युनल एवार्ड के खिलाफ आमरण अनशन कर दिया....

उस समय वह यरवदा जेल में थे और यही वह अधिकार था जिस से देश के करोड़ों अछूतों को एक नया जीवन मिलता और वे सदियों से चली आ रही गुलामी से मुक्त हो जाते.....

लेकिन मिस्टर गांधी के आमरण अनशन के कारण बाबा साहेब की उमीदों पर पानी फिरता नज़र आने लगा,

मिस्टर गांधी अपनी जिद्द पर अडिग थे तो बाबा साहेब किसी भी कीमत पर इस अधिकार को खोना नहीं चाहते थे....

आमरण अनशन के कारण गांधी जी मौत के करीब पहुँच गए इस बीच बाबा साहेब को धमकियों भरे बहुत से पत्र मिलने लगे....

जिसमे लिखा था कि वो इस अधिकार को छोड़ दें अन्यथा ठीक नहीं होगा....

बाबा साहेब को ऐसे पत्र जरा सा भी विचलित नहीं कर सके....

उन्हें अपने मरने का डर बिलकुल नहीं था....

मिस्टर गांधी की हालत दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी....

इसी बीच बाबा साहेब को और खत प्राप्त हुए कि अगर गांधी जी को कुछ हुआ तो हम अछूतों की बस्तियों को उजाड़ देंगे....

बाबा साहेब ने सोचा जब अछूत ही नहीं रहेंगे तो फिर मैं किसके लिए लड़ूंगा,

बाबा साहेब के जो मित्र थे उन्होंने भी बाबा साहेब को समझाया कि....

अगर एक गांधी मर गया तो दूसरा गांधी पैदा हो जायेगा लेकिन आप नहीं रहेंगे तो फिर आप के समाज का क्या होगा....

बाबा साहेब ने काफी गंभीरता से विचार करने के बाद पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करने का मन बना लिया....

और 24 सितम्बर 1932 को आँखों में आंसू लिए हुए बाबा साहेब ने पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर किये इस संदर्भ में बाबा साहेब का नाम अमर रहेगा क्योंकि उन्होंने मिस्टर गांधी को जीवन दान दे
तीसरे दिन डा. अम्बेडकर ने पूना पैक्ट का धिक्कार दिवस आयोजित किया....

मंच से रोते हुए डा. अम्बेडकर जी ने कहा कि "पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करके मैंने अपने जीवन की सबसे बड़ी गलती की है....

मैं ऐसा करने को विवश था....

मेरे बच्चों....

��������

मेरी इस भूल को सुधार लेना...

बाबा साहेब ने अपने जीवन में कभी मिस्टर गांधी को महात्मा नहीं माना वे ज्योतिबा फुले जी को सच्चा महात्मा मानते है....

दोस्तों सच कहता हूँ कि इस लेख को लिखते समय आँखों में आंसू आ गये....

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जय भीम जय भारत नमो बुध्दाय

सोमवार, 14 दिसंबर 2015

कठिन नही है शुद्ध हिन्दी-भाग-44

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 44
० ० ०
इस भाग में हम 'के भीतर', 'के अन्दर', 'के ऊपर', 'हे', 'रे', 'अरे' आदि के प्रयोग पर बात करेंगे।
'के भीतर' या 'के अन्दर' का प्रयोग तब होता है, जब कर्ता (सब्जेक्ट) पहले से उपस्थित न रहे और कथन के समय क्रियाशील (सक्रिय) रहे, जैसे 'वह घर के अन्दर चला गया'। 'में' का प्रयोग करना यहाँ ठीक नहीं रहेगा। 'वह घर में है' में पहले से उपस्थित होने का अर्थ मिलता है। अंग्रेज़ी की बात करें, तो 'में' के लिए इन (in), 'के अन्दर' या 'के भीतर' के लिए इनटू (into), 'पर' के लिए ऑन (on), 'के ऊपर' के लिए अपॉन (upon) और अबव या एबॅव (above) के प्रयोग को देखा जा सकता है।
'गाँव के भीतर दो स्कूल हैं', 'विधानसभा के भीतर बड़ा हंगामा हुआ', 'पेट के अंदर दर्द हो रहा है' आदि में 'के अंदर' या 'के भीतर' का प्रयोग उचित नहीं है। इन वाक्यों में 'के अंदर' या 'के भीतर' के स्थान पर 'में' का प्रयोग होना चाहिए।
'पर' और 'के ऊपर' में थोड़ा अन्तर है। 'पर' में आधार और आश्रित का स्पर्श होता है, जबकि 'के ऊपर' में आधार और आश्रित एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करते। 'छत सिर पर है' और 'छत सिर के ऊपर है', इन दो वाक्यों के अर्थ से यह अन्तर स्पष्ट समझा जा सकता है। 'हृदयेश ने सिर पर छाता तान रखा है' में 'पर' का प्रयोग न करके, 'के ऊपर' का प्रयोग होना चाहिए, क्योंकि छाता सर को स्पर्श नहीं कर रहा, सर के ऊपर है। इसी प्रकार 'उसने आँगन पर छप्पर डाल लिया है' और 'युद्ध के दौरान नगर पर वायुयान मँडराते हैं' में 'पर' की जगह 'के ऊपर' का प्रयोग करना ठीक रहेगा।
'मेरे ऊपर दया कीजिए महाराज!', 'तुम्हारी पीठ के ऊपर चाकू के निशान हैं', 'कानून और व्यवस्था का बोझ पुलिस के ऊपर है', 'भगतसिंह के ऊपर यह आरोप लगाया गया', 'यह तो इस बात के ऊपर निर्भर है', 'कल बजट के ऊपर बहस होगी', 'भगवान् के ऊपर विश्वास करो', 'तुम्हारे मन के ऊपर भारी बोझ है', 'किताब मेज के ऊपर है', 'अपराधी की पीठ के ऊपर कोड़े लगाए गए', 'समारोह की पूरी ज़िम्मेदारी आपके ऊपर है', 'मेरे मन के ऊपर बड़ा प्रभाव पड़ा' आदि वाक्यों में 'के ऊपर' का प्रयोग उचित नहीं है। इनके सही रूप क्रमशः 'मुझ पर दया कीजिए महाराज!', 'तुम्हारी पीठ पर चाकू के निशान हैं', 'कानून और व्यवस्था का बोझ पुलिस पर है', 'भगतसिंह पर यह आरोप लगाया गया', 'यह तो इस बात पर निर्भर है', 'कल बजट पर बहस होगी', 'भगवान् पर विश्वास करो', 'तुम्हारे मन पर भारी बोझ है', 'किताब मेज पर है', 'अपराधी की पीठ पर कोड़े लगाए गए', 'समारोह की पूरी ज़िम्मेदारी आप पर है' और 'मेरे मन पर बड़ा प्रभाव पड़ा' हैं।
'अरे' और 'हे' का प्रयोग सम्बोधन में होता है, जैसे 'हे भगवान्, इस गरीब की रक्षा कीजिए', 'अरे, श्याम तुझे क्या हो गया?' आदि। 'ओ', 'ऐ', अरे' और 'रे' का प्रयोग डाँटने, आश्चर्य व्यक्त करने आदि में भी होता है। सम्बोधन में हमेशा इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता, जैसे 'भाइयो और बहनो', 'मोहन, कहाँ थे तुम!' आदि।
कई बार 'हे' या 'ओ' के साथ आने वाले संस्कृत के शब्दों में कुछ परिवर्तन भी होता है। शब्द एकवचन हो और उसके अन्त में इकार, ईकार या आकार हो, तो वह एकार में बदल जाता है, जैसे 'हे विधे', 'हे प्रिये', 'हे बालिके', 'ओ लड़के', 'ओ बच्चे', 'हे सीते', 'हे देवि' और 'हे नदि' में क्रमशः 'विधि', 'प्रिया', 'बालिका', 'लड़का', 'बच्चा', 'सीता', 'नदी' और 'देवी' में बदलाव हुआ है। हिन्दी में 'हे नदी' या 'हे देवी' भी लिखा जा सकता है, लेकिन संस्कृत में नहीं। अन्त में उकार होने पर वह ओकार में बदल जाता है, जैसे 'हे साधो', 'हे बन्धो' आदि। ध्यान रहे कि ऐसा हर बार नहीं होता।
अब 'सहित', 'साथ' आदि के भी कुछ उदाहरण देखते हैं। 'उसने बड़े ध्यान के साथ मेरी बातें सुनीं', 'तुम्हें लगन या धैर्य के साथ अपना काम करना चाहिए', 'मैंने नम्रता के साथ केवल इतना कहा कि... ' आदि में 'के साथ' की जगह 'से' का प्रयोग होना चाहिए। 'आपकी कलम धन्यवाद सहित लौटा दी थी' में 'सहित' के स्थान पर 'पूर्वक' होना चाहिए।
'भोग विलास के लिए धन नष्ट न करो', 'इस रोग के लिए कोई इलाज नहीं', 'स्वान्तः सुखाय के लिए', 'वे सन्तान को लेकर दुखी हैं', 'वह अपनी पुस्तक की अपेक्षा दूसरे की उठा लाया', 'उन समान दूसरा कोई नहीं', 'मेरे आगे कौन ठहर सकता है?', "उसके विरुद्ध मुकदमा चलाया गया' आदि के सही रूप 'भोग विलास पर धन नष्ट न करो', 'इस रोग का कोई इलाज नहीं', 'स्वान्तः सुखाय' (इसमें 'के लिए' का भाव पहले से ही मौजूद है), 'वे सन्तान के कारण दुखी हैं', 'वह अपनी पुस्तक के बदले दूसरे की उठा लाया', 'उनके समान कोई नहीं', 'मेरे सामने कौन ठहर सकता है?' और 'उस पर मुकदमा चलाया गया' हैं।
० ० ०
जारी...

कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-43

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 43
० ० ०
इस भाग में हम विभक्ति चिन्ह 'पर' की चर्चा करेंगे।
सामान्यतः 'में' अंतः स्थिति का बोध कराता है और 'पर' बाह्य स्पर्श का। 'पे' या 'पै' भी 'पर' के स्थान पर (ब्रजभाषा वग़ैरह में) कई बार लिखा और बोला जाता है।
आधार के लिए, जैसे 'घोड़े पर बैठना', 'खाट पर सोना', 'सड़क पर चलना', 'पेड़ पर चढ़ना' आदि; दूरी का बोध कराने के लिए, जैसे 'एक कोस पर', 'चार हाथ की दूरी पर', 'एक एक हाथ के अन्तर पर', 'कुछ आगे जाने पर' आदि; आधार के पास होने (सामीप्याधार) पर, जैसे 'मेरा घर सड़क पर है', 'लड़का द्वार पर खड़ा है', 'फाटक पर सिपाही रहता है', 'तेरे दर पर', 'दरवाजे पर ही' आदि ; कारण बताने में, जैसे 'अच्छा करने पर इनाम मिलेगा', 'तो इस बात पर झगड़ा हो गया!', 'मेरे बोलने पर वे अप्रसन्न हो गए'; निश्चित काल के लिए, जैसे 'समय पर वर्षा नहीं हुई', 'नौ बजकर पैंतालीस मिनट पर', 'एक एक घंटे पर दवा ले लेना' आदि और 'तारीख पर तारीख', 'तगादे पर तगादा', 'दिन पर दिन भाव चढ़ रहे हैं', 'सिपाहियों पर सिपाही' जैसे आधिक्य या दोहराव (द्विरुक्ति) की स्थिति में 'पर' का प्रयोग किया जाता है।
'नौकरों पर दया', 'कन्या पर मोहित', 'आप पर विश्वास', 'वह अपनी जाति पर गया है', 'अपनी बात पर रहना', 'जहाँ अभी तालाब है, वहाँ पर किसी समय मन्दिर था' आदि में भी 'पर' का प्रयोग किया जाता है।
निरन्तरता या सातत्य (किसी बात के लगातार होते रहने पर) में भी 'पर' का प्रयोग होता है, जैसे 'बात पर बात निकलती है।
'छोटा होने पर भी', 'वह समझाने पर भी नहीं रुका', 'यह दवा चमड़े की बीमारियों पर भी काम करेगी' जैसे प्रयोग भी 'पर' के लिए देखे जा सकते हैं।
'चढ़ना', 'मरना', 'इच्छा करना', 'छोड़ना', 'घटना', 'निछावर', 'निर्भर' आदि के साथ 'पर' का प्रयोग होता है, जैसे 'नाम पर मरना', 'आज का काम कल पर छोड़ना', 'उसका जाना तुम्हारे जाने पर निर्भर है', 'पहाड़ पर चढ़ना' आदि।
'वे तालाब के किनारे पर बैठ गए', 'वह घर पर नहीं है', 'अपने पाँव पर कुल्हाड़ी मार ली', 'वह यहाँ पर नहीं है', 'हम तो आपके भरोसे जीवित हैं' आदि में 'पर' लगाना आवश्यक रहता है, लेकिन इसे अक्सर छोड़ दिया जाता है, जिसे उचित नहीं माना जाएगा।
'सारा दोष अपने सिर पर लेना', 'आप कहाँ पर थे' और 'आड़े हाथों पर लेना', 'मैं उसके दरवाजे पर कभी नहीं गया', 'उस जगह पर बहुत भीड़ थी', 'हम आपके पाँव पड़ते हैं' आदि में 'पर' का प्रयोग करना ठीक नहीं है।
कई बार 'पर' का प्रयोग कर दिया जाता है, जबकि उसके स्थान पर दूसरे शब्द आने चाहिए। इसके उदाहरण के लिए 'वह मरने पर है' (यहाँ 'को' होना चाहिए), 'इस युग में विज्ञान पर बड़ा महत्त्व दिया जा रहा है ' (यहाँ 'को' होना चाहिए), 'कश्मीर की नीति पर मंत्री ने एक वक्तव्य दिया' (यहाँ 'पर' के स्थान पर 'के सम्बन्ध में' का प्रयोग करना चाहिए), 'मुझ पर कोई लाचारी नहीं है' (यहाँ 'मुझपर 'की जगह 'मेरी' होना चाहिए), 'पत्र लम्बा होने पर माफी चाहता हूँ' ('की' या 'के कारण' होना चाहिए), 'किशोर पर मुझे सहानुभूति है' ('किशोर के साथ' या 'किशोर से' होना चाहिए), 'राहुल सांकृत्यायन ने हिन्दी पर बड़ा उपकार किया' ('का' होना चाहिए), 'उस पर क्या दोष है' ('उसका' होना चाहिए), 'तुम पर क्या दोष दियी जाय' ('तुमको' होना चाहिए), 'वह खेत पर चौकीदारी करता है' (यहाँ 'की' होना चाहिए), 'सामान दुकान पर है' ('में' होना चाहिए), 'हरदेव ने इस विषय पर अच्छा ज्ञान प्राप्त कर लिया है' ('का' होना चाहिए), 'ऐसा करने पर कोई नुक़सान नहीं होगा' ('में' होना चाहिए), 'वह राजमहल पर चला गया' (यहाँ 'के ऊपर' होना चाहिए), 'इस कुएँ पर एक टीन डाल दें, तो अच्छा होगा' (यहाँ भी 'के ऊपर ' होना चाहिए) आदि देखे जा सकते हैं।
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कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-42

कठिन नहीं है शुद्ध हिन्दी - 42
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इस भाग में हम विभक्ति चिन्ह 'में' के प्रयोग पर चर्चा करेंगे।
'में' का प्रयोग भावों या गुणों की मौजूदगी में, जैसे 'दूध में मिठास', 'मन में दया' आदि; आवास या वास में, जैसे 'वन में रहना', 'समुद्र में रहना', 'नदी में नहाना' आदि; मोल या खरीद-बिक्री में, जैसे 'किताब सौ रुपए में मिली', 'अपनी गाय कितने में बेचोगे', 'तुषार ने बीस हज़ार में यह ज़मीन सुरेश से ली' आदि; मेल और अन्तर बताने में, जैसे 'किशन और हरदेव में कोई अन्तर नहीं है', 'भाई भाई में प्रेम है', 'दोनों में अनबन हो गई', 'नरेश और महेश में कहा सुनी हो गई' आदि; निर्धारण या चयन में, जैसे 'अंधों में काने राजा', 'भारत की नदियों में गङ्गा सर्वाधिक दूषित है', देवताओं में कौन अधिक पूज्य है', 'घर में सबसे छोटा' आदि; रुचि, विषय, क्षेत्र आदि बताने तथा काम में जुटे रहने पर या मन की स्थिति बताने में, जैसे 'धर्म में रुचि', 'गणित में दिलचस्पी', 'वह तो अपनी धुन में था', 'पढ़ाई में मन नहीं लगता', 'होश में रहो', 'फ़िल्मों में दिलचस्पी', 'चिन्ता में' और निश्चित काल (समय) की स्थिति में, जैसे 'वह एक दिन में आ जाएगा', 'कई दिनों में', '1934 में अकाल पड़ा', 'प्राचीन समय में', 'दिन में चार बार', 'वह आठ दिनों में लौटेगा' आदि किया जाता है।
भरना, समाना, घुसना, मिलना, मिलाना आदि क्रियाओं के साथ भी 'शामिल होने' यानी 'मौजूदगी' के अर्थ में 'में' का प्रयोग होता है, जैसे 'घड़े में पानी भरना', 'धरती में समाना', 'बिल में घुसना', 'मिट्टी में मिलाना', 'रास्ते में मिलना' आदि।
'में' के प्रयोग के कुछ उदाहरण 'लड़का कमरे में है', 'वह घर में नहीं आता', 'मैं रात के समय गाँव में पहुँचा', 'चोर जंगल में जाएगा' आदि हैं। 'वह घर में गया' और 'वह घर को गया' के अर्थ में अन्तर है। यहाँ 'घर में' का अर्थ 'घर के भीतर से' है, जबकि 'घर को' का अर्थ से 'घर की सीमा तक जाने से है'; इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।
'में' का प्रयोग हमेशा उचित नहीं रहता। 'आप भीतर में जाकर देख लें', 'दरअसल में वह सनकी है', 'पिछले दिनों में तपस्या बहुत पढ़ती रही', 'तुम्हारे हाथ में क्या आया', 'तृप्ति मन ही मन रोने लगी', 'बच्चे विद्यालय में जाते हैं', 'जिस समय में वह आया था, उस समय में मैं नहीं था', 'परस्पर में सहयोग होना चाहिए', 'कल रात में वर्षा नहीं हुई' आदि वाक्यों में 'में' का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
'वह आसन में बैठा है', 'वे लोग रात में जागते रहे', 'वह सबमें शक्तिशाली है', 'रात में 10 बजे बैठक होगी', 'वह नदी में पानी भरने गया', 'आज की बैठक आपके निवास में होगी', 'वह पढ़ने में जी चुराता है', 'अनेक स्थलों में यह स्पष्ट किया गया है', 'उनकी दृष्टि चित्र में गड़ी थी', 'वह किताब में आँख गड़ाए पढ़ रही थी', 'समुद्र में सैर करने चलें', 'भीष्म शरशय्या में थे', 'पुलिस ने हरेन्द्र में आरोप लगाया है', 'मनोहर जी गणित में मर्मज्ञ हैं', 'प्रथम विश्वयुद्ध 1914 और 1918 में हुआ', 'वह क्रोध में भर कर बोला', 'उसे आने में रोका गया', 'उसकी योग्यता काम में प्रकट होती है' आदि वाक्यों में 'में' के स्थान पर दूसरे शब्दों का प्रयोग करना ठीक रहेगा। 'वह आसन पर बैठा है', 'वे लोग रात भर जागते रहे', 'वह सबसे शक्तिशाली है', 'रात को 10 बजे बैठक होगी', 'वह नदी से पानी भरने गया', 'आज की बैठक आपके निवास पर होगी', 'वह पढ़ने से जी चुराता है', 'अनेक स्थलों पर यह स्पष्ट किया गया है', 'उनकी दृष्टि चित्र पर गड़ी थी', वह किताब पर आँख आँख गड़ाए पढ़ रही थी', 'समुद्र की सैर करने चलें', 'भीष्म शर शय्या पर थे', 'पुलिस ने हरेन्द्र पर आरोप लगाया है', 'मनोहर जी गणित के मर्मज्ञ हैं', 'प्रथम विश्वयुद्ध 1914 और 1918 के बीच में हुआ था' ('1914 से 1918 तक' भी हो सकता है), 'वह क्रोध से भर कर बोला', 'उसे आने से रोका गया है', 'उसकी योग्यता काम से प्रकट होती है' आदि वाक्य सही प्रयोग दिखाते हैं।
'दिल्ली और श्रीनगर के बीच दंगे हुए', 'बाबू लोग हिन्दी वाक्यों के बीच अंग्रेज़ी शब्दों का प्रयोग कर देते हैं' जैसे वाक्यों में 'के बीच' की जगह 'में' का प्रयोग करना ठीक रहेगा।
'हमारे धर्मशास्त्रों के अन्दर बहुत कुछ पड़ा है', 'हमारी पाठ्यपुस्तक के अन्दर लिखा हुआ है' आदि वाक्यों में 'के अन्दर' की जगह 'में' का प्रयोग करना चाहिए। इसी तरह 'उस गाँव के भीतर दो कुएँ हैं', 'कल संसद के भीतर इस पर बहस होगी', 'वह संकटों के भीतर घबराने वाला नहीं है' आदि वाक्यों में 'के भीतर' की जगह 'में' का प्रयोग करना चाहिए।
'यहाँ', 'वहाँ', 'किनारे', 'आसरे', 'दरवाजे' आदि के बाद 'में' का प्रयोग नहीं होता।
हम ग़लती से 'में' की बिन्दी को अनुस्वार मान लेते हैं, जो चन्द्रबिन्दु है।
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