जाति रे जाति, तू कहां से आई?
लाइव इंडिया डिजिटल|
Jan 30, 2016, 04:51 PM IST
भारत में जाति कहां से आयी? किसकी देन है? बहस बड़ी पुरानी है। और यह बहस भी बड़ी पुरानी है कि आर्य कहां से आये? इतिहास खोदिए, तो जवाब के बजाय विवाद मिलता है। सबके अपने-अपने इतिहास हैं, अपने-अपने तर्क और अपने-अपने साक्ष्य और अपने-अपने लक्ष्य! जैसा लक्ष्य, वैसा इतिहास। लेकिन अब मामला दिलचस्प होता जा रहा है। इतिहास के बजाय विज्ञान इन सवालों के जवाब ढूंढने में लगा है। और वह भी प्रामाणिक, साक्ष्य-सिद्ध, अकाट्य और वैज्ञानिक जवाब। हो सकता है कि अगले कुछ बरसों में ये सारे सवाल और विवाद खत्म हो जायें। वह दिन ज्यादा दूर नहीं।Genomic Study and History of Caste System in Indiaआर्य बनाम द्रविड़, कौन पहले आया?मसलन, आर्य कहां से आये? आज जो भारत है, उसका मूल निवासी या आदिम रहिवासी कौन था। दुनिया भर के इतिहासकारों की बहुत बड़ी टोली कहती है कि द्रविड़ यहां के मूल निवासी थे। आर्य बहुत बाद में बाहर से आ कर बसे। इतिहासकारों की दूसरी छोटी टोली इस अवधारणा को बिलकुल खारिज करती है। वह मानती है कि आर्य यहां के मूल निवासी थे, कहीं बाहर से नहीं आये थे। यह दूसरी थ्योरी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की थ्योरी है। क्यों? इसलिए कि अगर यह साबित हो जाये कि आर्य यहां बाहर से आ कर बसे, तो भारत को हिन्दू राष्ट्र मानने का उसका आधार ध्वस्त हो जाता है!जातीय विभाजन: वर्ण व्यवस्था या मुगलों की देन?इस विवाद को फिलहाल यहीं छोड़ते हैं। अब बात दूसरे सवाल की यानी History of Caste Systemin India। भारत में जाति कहां से आयी और किसकीदेन है? जाति व्यवस्था कब शुरू हुई? एक पक्ष मानता है कि हिन्दू वर्ण-व्यवस्था ने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में मनुष्यों को श्रेष्ठ से हीन तक चार वर्गों में बांटा और यहीं से छुआछूत, जातिगत भेदभाव और शोषण की शुरुआत हुई। और इसके उलट बिलकुल अभी हाल ही में एक दूसरा पक्ष उभरा है। इसके अपने राजनीतिक लक्ष्य और कारण हैं।अब यह बात फैलाने की कोशिश हो रही है कि हिन्दू समाज में तो जाति-व्यवस्था थी ही नहीं। यह तो मुगल शासकों की देन है। हिन्दू समाज को बांटे बिना मुगलों के लिए भारत पर शासन कर पाना आसान नहीं था, इसलिए उन्होंने जाति-व्यवस्था को जन्म दिया। हिन्दू धर्म में आयी जाति-व्यवस्था का दोष मुगलों यानी मुसलमानों पर मढ़ने के पीछे कौन है और इससे वह क्या राजनीतिक फायदा उठाना चाहता है, इसे कौन नहीं जानता!इतिहास की पड़ताल विज्ञान से!आपके पास जैसा चश्मा है, वैसा इतिहास देखिए और जिस रंग की स्याही है, वैसा इतिहास लिखिए। लेकिन विज्ञान किसी रंग पर नहीं चलता। स्पष्ट वैज्ञानिक कसौटियों पर चलता है। वह अब इतिहास को भी प्रयोगशालाओं में परख रहा है, और तय कर रहा है कि इतिहास की उम्र कितनी है, वह सच है या मिथ है, और जैसा कहा या माना जाता है, वह कभी हुआ भी था या नहीं!3 Indian Scientists dig deeper in Genome wide data to find out History of Caste System in Indiaभारतीय विज्ञानियों का जेनॉम अध्ययनभारत में जातियां कैसे बनीं? अभी इसी हफ्ते 25 जनवरी को अमेरिका के प्रतिष्ठित विज्ञान जर्नल 'प्रोसीडिंग्स ऑफ द नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेज' (Proceedings of the National Academy of Sciences) में एक दिलचस्प वैज्ञानिक अध्ययन आया है। यह अध्य्यन पश्चिम बंगाल के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ बॉयोमेडिकल जेनॉमिक्स (National Institute ofBiomedical Genomics) के विज्ञानियों पार्थ पी. मजूमदार (Partha P. Majumdar) अनलआभा बसु (Analabha Basu) और नीता सरकार-रॉय (Neeta Sarkar-Roy) की टीम ने किया है। उन्होंने विभिन्न राज्यों से लिये 18 जाति समूहों के नमूने लेकर भारतीय आबादी के जेनॉमअध्ययन के बाद पाया है कि भारत में जातिगत समाज का जन्म आज से करीब सत्तर पीढ़ियों पहले या 1575 साल पहले हिन्दू गुप्त वंश के साम्राज्य में हुआ और यह काल सन् 319-550 (चौथी से छठी शताब्दी) के बीच चन्द्रगुप्त द्वितीय या कुमारगुप्त प्रथम के समय का मानाजा सकता है। इस अध्ययन (Genomic reconstruction of theभारत में पांच पूर्वज-परम्पराएंइन विज्ञानियों के अनुसार भारत में आबादी कीपांच पूर्वज-परम्पराएं (ancestries) पायी जाती हैं। इनमें से चार मुख्य पूर्वज-परम्पराएं भारत की मुख्य भूमि पर (four majorancestries in mainland India) पायी जाती हैं, जिनमें 'दक्षिण भारतीय पूर्वज-परम्परा' सबसे पुरानी है और सम्भवत: दक्षिण अफ्रीका से सात लाख साल पहले जो पहला दक्षिणी प्रवास हुआ था, ये लोग उसी के फलस्वरूप यहां आ कर बसे थे। इसके बाद उत्तर पश्चिम और उत्तर-पूर्व से 'उत्तर भारतीय पूर्वज-परम्परा' के लोग यहां आकर बसे। इसके अलावा दो और पूर्वज परम्पराएं तिब्बती-बर्मी और ऑस्ट्रो-एशियाटिक भी यहां पायी जाती हैं। अंडमान-निकोबार की एक अलग पूर्वज-परम्परा है।आबादी में कब रुका जीन्स-मिश्रण का सिलसिला?जब तक यहां जाति-व्यवस्था का आगमन नहीं हुआ था, तब तक सभी प्रकार की पूर्वज-परम्पराओं केलोगों के बीच आपस में शारीरिक सम्बन्ध निर्बाध और लगातार होते रहे। यह बात इस जेनॉम अध्ययन से साफ-साफ प्रमाणित होती है कि अंडमान-निकोबार की पूर्वज-परम्परा समूह को छोड़ कर (जिनमें जरावा और ओंगे जातियां आती हैं और जो आज भी बाकी आबादी से पूरी तरह कटे हुए हैं) भारत की मुख्यभूमि (Mainland) पर रहने वाले सभी पूर्वज-परम्परा के विभिन्नसमूहों में काफी लम्बे समय तक एक-दूसरे के जीन्स का मिश्रण होता रहा, क्योंकि विभिन्न समूहों के स्त्री-पुरुषों के बीच सम्बन्धों की सहज स्वीकार्यता थी। लेकिन करीब सोलह सौ साल पहले यह सिलसिला अचानक रुक गया। विज्ञानियों का कहना है कि 'यह वैदिक ब्राह्मणवाद का काल था, जब शक्तिशाली गुप्त वंश के शासन के दौरान हिन्दू धर्मशास्त्रों के आधार पर कड़े नैतिक-सामाजिक नियम बनाये गये और राज्य ने इन्हें लागू किया और इस कारणअपने ही वर्ण या जाति में विवाह की व्यवस्था शुरू हुई।' इसी कारण जीन्स मिश्रण का सिलसिलापहली बार यहां थमता दिखा।दूसरे इलाकों तक कब फैली जाति-व्यवस्था?इन विज्ञानियों का कहना है कि पश्चिम भारत में मराठों में जीन्स-मिश्रण का यह सिलसिला कुछ और आगे तक यानी छठी से आठवीं शती तक चलता पाया जाता है और चालुक्य व राष्ट्रकूट साम्राज्यों की स्थापना के बाद वहां भी यह रुक गया यानी इसी दौरान वहां भी राज्य की सत्ता के कारण जातिगत पहचान को आधार बना कर सामाजिक समूहों का निर्माण हुआ और विवाह इसीआन्तरिक संरचना के तहत किये जाने का चलन शुरू हुआ। इसी कारण एक समूह से दूसरे समूह में जीन्स के मिश्रण का सिलसिला रुक गया। लेकिन पूर्वी भारत में बंगाली ब्राह्मणों और तिब्बती-बर्मी पूर्वज-परम्परा के समूहोंमें जीन्स मिश्रण का सिलसिला तो इसके भी आगे यानी आठवीं से बारहवीं शती तक जारी रहा।फिर पूरे देश में फैल गयी जाति की अवधारणासाफ है कि यह अध्ययन भारत में जाति-व्यवस्था की शुरुआत के रहस्यों को खोलता है। और यह भी बताता है कि जाति की अवधारणा कैसे भारतीय भूभाग के एक हिस्से में शुरू हुई, विकसित हुई,फली-फूली और फिर वहां से पहले पश्चिम भारत केमराठों तक फैली और उसके तीन-चार सौ साल बाद भारत के पूर्वी हिस्सों तक फैली और आज के पश्चिम बंगाल व पूर्वोत्तर भारत तक गयी और इस तरह वह पूरे देश की सामाजिक संरचना का आधार बन गयी।और बड़े रहस्य खोलेंगे जेनॉम अध्ययन!भारत ही नहीं, बल्कि ऐसे जेनॉम अध्ययन आज दुनिया भर में हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर हो रहे हैं। विज्ञानी जेनॉम अध्ययन के सहारेदक्षिण अफ़्रीका से शुरू हुए मनुष्य के पहलेप्रवास से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में उसके फैलने-बसने और समाजों के निर्माण की कड़ियाँ जोड़ने में लगे हैं। उम्मीद है कि अगले कुछ वर्षों में ऐसे सारे रहस्यों से पर्दा बिलकुल उठ जायेगा कि दुनिया में मनुष्यों की बसावट कहां-कहां, कब और कैसे हुई, अलग-अलग भाषाओं को बोलनेवाले आपस में कब, कहां, कैसे मिले, नस्लें कैसे विकसित हुईँ, और यह भी निर्विवाद रूप से तय हो जायेगाकि आर्य कहां से आये थे। धीरज रखिए!(वरिष्ठ पत्रकार क़मर वहीद नक़वी के ब्लॉग raagdesh.com से साभार)
गुरुवार, 11 फ़रवरी 2016
जाति कहाँ से आई रे
सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-56(क)
संस्कृत, अरबी और फ़ारसी के शब्दों के लिंग पर चर्चा करने के बाद हम हिन्दी के शब्दों पर विचार करेंगे। शब्दों को प्राणिवाचक (सजीवों का बोध कराने वाले, लेकिन पेड़ पौधों को छोड़कर) और अप्राणिवाचक (चीज़ों,स्थानों, भाषाओं आदि के नाम), दो वर्गों में बाँटकर हमचर्चा शुरू करते हैं।मनुष्यों, बड़े पशुओं आदि में जो नर के बोध कराने वाले शब्द हैं, वे पुलिंग और जो मादा का बोध कराने वाले हैं, वे स्त्रीलिंग हैं। ऊँट, बूढ़ा, बच्चा, युवक,लड़का, हाथी, बाघ, गधा, साँप आदि पुलिंग हैं और बूढ़ी, युवती, बच्ची, गाय, महिला, बकरी, लड़की, ऊँटनी आदि स्त्रीलिंग हैं।कुछ जानवरों, छोटे पक्षियों और कीड़ों आदि में जोड़े (नर और मादा) का भेद करना कठिन होता है। कोयल, गिलहरी, गौरैया, चील, जोंक, बुलबुल, मछली, बटेर, तितली, मैना, मक्खी, दीमक आदि हमेशा स्त्रीलिंग रहते हैं, चाहे नर का बोध हो या मादा का। उल्लू, कौआ, खटमल, गिद्ध, गिरगिट,झींगुर, बिच्छू, मच्छर, चमगादड़, चीता, भेड़िया, केंचुआ, तेंदुआ, पिल्ला, पक्षी, झींगा, तीतर आदि शब्द पुलिंग ही माने जाते हैं, बोध चाहे किसी का हो।प्रायः जिन वस्तुओं से बल, श्रेष्ठता, कठोरता आदि गुणों का पता चलता है, वे पुलिंग और जिनसे नम्रता, कोमलता, सुंदरता, हीनता आदि का पता चलता है, वे स्त्रीलिंग माने गए हैं। यह हमारे समाज में पितृसत्ता का एक प्रमाण भी कहा जा सकता है, जहाँ स्त्री दोयम दर्जे की मानी गई है! कम से कम तब का तो कहा ही जा सकता है, जब भाषा का विकास तेज़ी से हो रहा होगा! 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' किताबी और मिलावटी बात रही है।माता-पिता, माँ-बाप, भाई-बहन, राधा-कृष्ण, सीता-राम, दाल-भात, नर-नारी, राजा-रानी, शिव-पार्वती जैसे दो पदों वाले शब्द पुलिंग होते हैं।अब अप्राणिवाचक शब्दों की ओर रुख करते हैं।पेड़ों, वनस्पतियों, रत्नों, धातुओं, अनाजों, तरल पदार्थों आदि के नाम पुलिंग होते हैं, जैसे पीपल, अनार, बाँस, आम, खजूर, देवदार, सागवान, बड़, चीड़, शीशम, कटहल, अमरूद, नीबू, अशोक, शरीफा, सेब, अखरोट, मोती, नीलम, पन्ना, हीरा, जवाहर, मूँगा, लाल, पुखराज, तांबा, लोहा, सीसा, सोना, पीतल, राँगा, टीन, जौ, गेहूँ, चावल, बाजरा, चना, मटर, तिल, उड़द, इत्र, कहवा, पानी, घी, काढ़ा, तेल, दूध, दही, मधु, शरबत, सिरका, अवलेह, आसव, अर्क, रायता आदि। इसके अपवाद नीम, जामुन, लीची, नारंगी, नाशपाती, इमली, मणि, चाँदी, मकई, ज्वार, अरहर, खेसारी, मूँग, चाय, स्याही, कॉफी, शराब, कढ़ी, छाछ आदि हैं।जलीय, स्थलीय या भौगोलिक नाम, पहाड़ों, आकाशीय पिंडों,दिनों, महीनों, महादेशों, राज्यों आदि के नाम पुलिंग हैं, जैसे देश, नगर, रेगिस्तान, द्वीप, पर्वत, समुद्र, सरोवर, पाताल, वायुमंडल, प्रान्त, राज्य, चाँद, बुध, शनि, एशिया, युरोप, अमेरिकी, चीन, भारत, रूस, बिहार, केरल, पंजाब, तारा, सूर्य, ग्रह, सोमवार, चैत, जेठ, पूस, सावन, ध्रुव आदि। झील, घाटी, पृथ्वी, जमीन, भूमि आदि इसके अपवाद हैं।शरीर के अंगों से सम्बन्धित कान, मुँह, दाँत, ओठ, हाथ, पाँव, गाल, मुक्का, तालु, नाखून, पेट, पैर, बाल, सिर, रोम, नख, चमड़ा, नथुना, अँगूठा आदि पुलिंग हैं, तो आँख, नाक, काँख, गर्दन, छाती, जीभ, जाँघ, टाँग, ठोड़ी, दाढ़ी, नाड़ी, पीठ, बाँह, मूँछ, हथेली, उँगली, कोहनी, कलाई, नस, हड्डी, खाल, इन्द्रिय, चमड़ी आदि स्त्रीलिंग। बाहु और श्वास संस्कृत में पुलिंग हैं, लेकिन हिन्दी में बाँह और साँस स्त्रीलिंग हैं।भाषाओं के नाम स्त्रीलिंग हैं, जैसे हिन्दी, भोजपुरी, संस्कृत, तमिल, फ़ारसी, अंग्रेज़ी, तुर्की आदि।नदियों के नाम स्त्रीलिंग हैं, जैसे गंगा, यमुना, सतलुज आदि। ब्रह्मपुत्र जैसे अपवाद भी हैं, जो पुलिंग हैं।खाने-पीने और किराने के दुकान की चीज़ें स्त्रीलिंग हैं, जैसे लौंग, इलायची, मिर्च, दालचीनी, हल्दी, सुपारी,हींग, राई, कचौड़ी, पूरी (पूड़ी), खीर, दाल, रोटी, चपाती, पकौड़ी, तरकारी, सब्जी, खिचड़ी आदि। धनिया, जीरा, प्याज, लहसुन, नमक, केसर, कपूर, तेजपात (तेजपत्ता), हलवा, भात, पराँठा (पराठा) आदि इसके अपवाद हैं।अक्षरों में इ, ई, ऋ, र और ड़ को छोड़कर सारे अक्षर पुलिंग माने जाते हैं।अप्राणिवाचक शब्द, जो ईकार से समाप्त होते हैं, प्रायः स्त्रीलिंग होते हैं, जैसे कटोरी, कस्तूरी, गंजी, घड़ी, गाड़ी, चटनी, चोटी, चिट्ठी, छड़ी, चौकी, थाली, धोती, लाठी, साड़ी आदि। घी, मोती, दही, जी, पानी आदि इसके अपवाद हैं।आ, आन, अक्कड़, आक, आकू, आप, आव, आवा, इयल, इया, ऊ, ऐरा, ऐया, ऐत, ओड़, औता, औना, औवल, वैया, वाहा, वाला आदि प्रत्यय वाले ऐसे शब्द, जो किसी क्रिया से बने हों, पुलिंग होते हैं। घेरा, खान, नहान, मिलान, पान, लगान, उठान, पियक्कड़, बुझक्कड़, लड़ाकू, मिलाप, तैराक, घुमाव, बहाव, पहनावा, छलावा, भुलावा, सड़ियल, धुनिया, खाऊ, उड़ाऊ, लुटेरा, गवैया, हँसोड़, समझौता, खिलौना, बुझौवल, मनौवल, चरवाहा, छिलका, खानेवाला आदि इसके उदाहरण हैं। उड़ान और चट्टान स्त्रीलिंग हैं।आई, ई, औती, आवनी, ती, नी, आवट, आहट, की, त, क, न, अन्त, अ आदि प्रत्ययों से बने वैसे शब्द, जो क्रियाओं से बनते हैं,स्त्रीलिंग होते हैं। पढ़ाई, लड़ाई, बोली, मनौती, गिनती, सजावट, लिखावट, घबराहट, धमकी, बचत, करनी, छावनी, हँसी, बैठक, भिड़न्त, चमक, उड़ान, सूजन, उलझन, छाप, जलन, जीत, पहचान, मार, समझ, हार, मिलावट, छटपटाहट, पुकार, दौड़, रहन आदि इसके उदाहरण हैं। चलन, बोल, नाच, रुझान, मेल, उतार, बिगाड़ आदि पुलिंग हैं।गाना, पढ़ना, बोलना, रोना, लिखना, हँसना जैसे शब्द जो क्रियासूचक हैं पुलिंग होते हैं, जब इनका प्रयोग क्रिया की तरह नहीं होता, जैसे 'खेलना हमारा काम है' में खेलना क्रिया नहीं है।हम अगले भाग में लिंग की चर्चा समाप्त करेंगे।
कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-55
चर्चा (फ़ारसी) उर्दू में पुलिंग है, लेकिन हिन्दी में स्त्रीलिंग। कलम उर्दू (अरबी) में पुलिंग है, लेकिन हिन्दी में स्त्रीलिंग। फ़ारसी और अरबी के शब्द हिन्दी में उर्दू के माध्यम से आए हैं। इन शब्दों के हिन्दी में प्रायः वही लिंग हैं, जो उर्दू ने स्वीकार किए हैं। इसके बहुत कम अपवाद हैं।इस भाग में हम हिन्दी के उन शब्दों के लिंग पर बात करेंगे, जो अरबी और फ़ारसी से हिन्दी में आए हैं।जिन शब्दों के अंत में 'इश' है, वे स्त्रीलिंग हैं, जैसे आजमाइश, पैदाइश, ख्वाहिश, कोशिश, नालिश, नुमाइश, परवरिश, मालिश, सिफारिश, साजिश, फरमाइश, गुजारिश, गुंजाइश आदि।आर, आन, आब, बन्द, बान, दान, वान, वाँ, कार, इस्तान (स्थानवाचक शब्दों में) आदि से समाप्त होने वाले शब्द प्रायः पुलिंग होते हैं। उदाहरण के लिए बाजार, इकरार, इश्तिहार, इनकार, इन्तज़ार, परवरदिगार, हक़दार,रोज़गार, अखबार, मकान, सामान, इम्तहान, इतमीनान, अहसान, कबाब, ख्वाब, खिजाब, जवाब, गुलाब, नवाब, तेजाब, सैलाब, सवाब, हिसाब, कमरबन्द, मेहरबान, बाग़बान, बाग़ान, कलमदान, पीकदान, रोशनदान, कारवाँ, पच्चीकार, फनकार, काश्तकार, पेशकार, पाकिस्तान, हिन्दुस्तान जैसे शब्द देखे जा सकते हैं। इनके कई अपवाद भी हैं, जैसे तकरार, सरकार, दरकार, दूकान, किताब, शराब, ताब, मिहराब (मेहराब), आनबान आदि। ये सब स्त्रीलिंग है।आकार से समाप्त होने वाले शब्द प्रायः पुलिंग हैं, जैसे परदा, गुस्सा, किस्सा, तमगा, चश्मा, आईना, नुस्खा, मज़ा, पेशा, रोजा, दगा आदि। इन्तिहा, खता, तमन्ना, दवा, बला, रजा, वफा, हया, हवा, दुनिया, सजा जैसे शब्द स्त्रीलिंग हैं।ईकार से समाप्त होने वाले भाव या दशा बताने शब्द स्त्रीलिंग होते हैं, जैसे ग़रीबी, सरदी, गर्मी, बीमारी, चालाकी, तैयारी, नवाबी, अमीरी, फकीरी, माली आदि।अत, आत या ह से समाप्त होने वाले शब्द स्त्रीलिंग हैं, जैसे इज्जत, कयामत, कुदरत, तबीयत, दहशत, दावत, नफरत, रहमत, तोहमत, हुकूमत, मुहब्बत, मुखालिफत, हालत, अदावत, अदालत, कसरत, कीमत, दौलत, अस्मत, हसरत, मुलाकात, हवालात, शुरूआत, तहकीकात, सुबह, राह, तरह, आह, सुलह, सलाह आदि। गुनाह, माह आदि पुलिंग हैं। शरबत, वक़्त, बन्दोबस्त, दस्तखत, तख्त, दरख्त आदि पुलिंग हैं।कागजात, सवालात जैसे शब्द पुलिंग हैं और कागज, सवाल आदि के बहुवचन हैं। दिलचस्प बात यह है कि हालत स्त्रीलिंग है, लेकिन इसका बहुवचन हालात पुलिंग है।श से समाप्त होने वाले जोश, होश, ताश आदि पुलिंग हैं, लेकिन तराश, लाश, तलाश जैसे शब्द स्त्रीलिंग हैं।म से खत्म होने वाले खानम, बेगम जैसे शब्द स्त्रीलिंगहैं।जख्म, तमाशा, तार, दिमाग़, तोता, परवाना, बाज, बुत, रुख, सितम, हाल, आब ओ दाना जैसे शब्द पुलिंग हैं और आबरू, आब ओ हवा, औकात, खता, चिलम, जिन्दगी, तौबा, दास्तान, बू, रफ्तार, रस्म, दीवार, तकदीर, तकरीर, तहसील, ताकीद, जागीर, तामील, तस्वीर जैसे शब्द स्त्रीलिंग हैं।दो शब्दों से मिलकर बने नये शब्द (पद) का लिंग अन्तिम शब्द के अनुसार होता है, जैसे आबोहवा में हवा अन्तिम शब्द है, इसलिए आबोहवा स्त्रीलिंग है। शिकारगाह स्त्रीलिंग है, क्योंकि गाह स्त्रीलिंग है। दवा स्त्रीलिंग है और ख़ाना पुलिंग; इसलिए दवाख़ाना पुलिंग होगा।
कठिन नही है शुद्ध हिंदी-भाग-54
'सोच' शब्द पुलिंग शब्द है, लेकिन इसे दशकों से किताबों, फ़िल्मों, अखबारों आदि में स्त्रीलिंग बनाकर रखा गया है। राहुल सांकृत्यायन की किताब में हमें इसका प्रयोग पुलिंग के रूप में ही दिखा। इस भाग से हम लिंग पर चर्चा शुरू कर रहे हैं। संस्कृत, मराठी, गुजराती आदि में तीन लिंग हैं। अंग्रेज़ी में चार लिंग हैं। हिन्दी में पुलिंग और स्त्रीलिंग, दो ही लिंग हैं। लिंग हिन्दी के सबसे कठिन माने जाने वाले विषयों में एक है। यह भी कह सकते हैं कि इक्के दुक्के उदाहरणों को छोड़ हिन्दी का कोई वाक्य इसके ज्ञान के बिना शुद्ध नहीं बन सकता! अंग्रेज़ी में सबसे बड़ा बोझ अगर हर शब्द के हिज्जे (स्पेलिंग) रटना है, तो हिन्दी में शब्द के लिंग को याद रखना। जिन सजीवों मेंनर और मादा दोनों जातियाँ हैं, उनके लिए लिंग निर्णय आसान है। मुश्किल तब होती है, जब शब्द से नर या मादा का भाव स्पष्ट नहीं होता, जैसे मक्खी, मछली आदि। अप्राणिवाचक शब्दों का लिंग ज्ञान जानकारों के लिए भी चुनौती है। वास्तव में ऐसा कोई नियम नहीं बताया जासकता, जिसके आधार पर हम शब्दों का लिंग पता लगा लें। जितने नियम या सूत्र विद्वानों, वैयाकरणों या भाषाविदों ने बताए हैं, प्रायः सबके अपवाद हमारे सामने हैं। लिंग की बात करें, तो संस्कृत से सरल हिन्दी है। वास्तव में संस्कृत हिन्दी से जटिल भाषा है। सामान्यतः हिन्दी में क्रियाएँ कर्ता के लिंग सेतय होती हैं। 'ने' चिन्ह पर चर्चा करते समय हमने उन स्थितियों की चर्चा की थी, जिनमें क्रियाओं का लिंग कर्म के आधार पर तय होता है।हिन्दी में संस्कृत, अंग्रेज़ी, अरबी, फ़ारसी आदि के शब्द भी बड़ी संख्या में हैं। यहाँ हम संस्कृत के शब्दों (इन्हें तत्सम कहते हैं) के लिंग के लिए कुछ सामान्य नियम प्रस्तुत कर रहे हैं।हिन्दी में संस्कृत के पुलिंग शब्द प्रायः पुलिंग हीरह गए हैं।अकार से समाप्त होने वाले शब्द प्रायः पुलिंग हैं, जैसे क्रोध, मोह, पाक, त्याग, दोष, स्पर्श, अध्याय, अन्याय, आकार, उपहार, उपाय, उल्लास, खंड, ध्यान, नियम, विकार, विकास, विस्तार, संसार, समय, समुदाय, सागर, हास, स्वप्न, विनय आदि। जय, पराजय, आय, विजय, पुस्तक, शरण, संस्कृत, सन्तान, देह आदि इसके अपवाद हैं और स्त्रीलिंग हैं।त्र से समाप्त होने वाले शब्द पुलिंग हैं। अस्त्र, शस्त्र, शास्त्र, मित्र, गोत्र, चरित्र, चित्र, नेत्र, पात्र, क्षेत्र आदि इसके उदाहरण हैं। संस्कृत में ये सब नपुंसकलिंग हैं।न से समाप्त होने वाले शब्द पुलिंग हैं, जैसे आमंत्रण,उत्पादन, क्रन्दन, गमन, दमन, नन्दन, नयन, पालम, पोषण, परिवर्तन, परिमार्जन, परिवहन, भ्रमण, वंदन, वचन, विधान, व्याख्यान, शयन, शोषण, श्रवण, हरण, संस्करण आदि। पवन (हवा) का प्रयोग स्त्रीलिंग में भी होता रहा है हिन्दी में।ज से समाप्त होने वाले शब्द प्रायः पुलिंग हैं, जैसे अंडज, पिंडज, उरोज, जलज, सरोज, स्वेदज, आत्मज, अंबुज आदि।गुण, धर्म, अवस्था आदि शब्दों के अन्त में यदि त्व, त्य, व या र्य हों, तो वे पुलिंग होते हैं। महत्त्व, सतीत्व, कृत्य, पांडित्य, लाघव, साहित्य, नृत्य, दासत्व, कार्य, धैर्य, माधुर्य, गौरव आदि इसके उदाहरण हैं।त या ख से समाप्त होने वाले शब्द भी पुलिंग होते हैं, जैसे चरित, फलित, गणित, मत, गीत, स्वागत, नख, मुख, दुःख, लेख, शंख, सुख आदि।कमल, खग, गिरि, देवता, मनुष्य, मेघ, वृक्ष, वायु, सागर आदि के पर्यायवाची शब्द (बदले में आने वाले शब्द) पुलिंग होते हैं।आकार, नाकार, ईकार या इकार से समाप्त होने वाले शब्द स्त्रीलिंग होते हैं, जैसे आज्ञा, उपासना, कन्या, कला, काया, क्रिया, कृपा, गणना, गवेषणा, घटना, क्षमा, दया, माया, सभा, शोभा, लज्जा, प्रार्थना, वेदना, प्रस्तावना, रचना, निद्रा, प्रजा, भाषा, भूमिका, मंत्रणा, मान्यता, रक्षा, लता, विद्या, विधा, व्याख्या, याचना, शाखा, सहायता, संवेदना, सीमा, सेना, सेवा, आरती, गोष्ठी, नदी, लक्ष्मी, देवी, भारती, अंजलि, अग्नि, उपाधि, केलि, गति, ग्लानि, जाति, ज्योति, छवि, निधि, परिधि, बुद्धि, मणि, मति, रति, रश्मि, राशि, रीति, सिद्धि, वृद्धि, हानि, रुचिआदि। चन्द्रमा, दाता, पिता, दंडी, ब्रह्मचारी, संन्यासी, विद्यार्थी, पति, कवि, गिरि, मुनि, यति, रवि, वारि, वारिधि, उदधि, पाणि आदि अपवाद हैं और पुलिंग हैं। आत्मा स्त्रीलिंग है, लेकिन इससे बने परमात्मा, जीवात्मा, विश्वात्मा पुलिंग हैं, तो प्रेतात्मा स्त्रीलिंग है।उकारान्त शब्द स्त्रीलिंग होते हैं, जैसे वायु, रेणु, रज्जु, आयु, मृत्यु, वस्तु, धातु, ऋतु आदि। अश्रु, तालु, मधु, साधु, मेरु, साधु, सेतु, हेतु, गुरु, पशु, शिशु, बंधु, रिपु, शंभु, बिंदु आदि अपवाद हैं और पुलिंग हैं। अग्नि, वायु, मृत्यु और ऋतु संस्कृत में पुलिंग हैं।ता से समाप्त होने वाले भाव, गुण, धर्म या अवस्था वाचक शब्द स्त्रीलिंग होते हैं, जैसे गुरुता, जड़ता, मूर्खता, ममता, महत्ता, लघुता, विनम्पता, साधुता, सुन्दरता, एकता, पशुता, समता, प्रभुता आदि।तिथियों, नदियों और नक्षत्रों के नाम प्रायः स्त्रीलिंग होते हैं। प्रतिपदा, द्वितीया, पंचमी, षष्ठी, कावेरी, कृष्णा, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, ताप्ती, भरणी, रोहिणी, अश्विनी आदि इसके उदाहरण हैं। सिन्धु, ब्रह्मपुत्र, दामोदर, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त आदि इसके अपवाद हैं।ति, द्धि, नि या इमा से समाप्त होने वाले शब्द स्त्रीलिंग हैं, जैसे गति, मति, रीति, विज्ञप्ति, युक्ति, शक्ति, हानि, ग्लानि, योनि, बुद्धि, शुद्धि, कालिमा, गरिमा, महिमा, लालिमा, प्रतिमा आदि।नदी, पृथ्वी, बुद्धि, वाणी, रात्रि, लता, सरिता, स्त्री आदि के पर्यायवाची शब्द स्त्रीलिंग होते हैं।पुलिंग को पुंलिंग, पुल्लिंग और पुंल्लिंग भी लिखा जाता रहा है।