मंगलवार, 21 मार्च 2017

गद्दारो के लिए कविता

समाज के गद्दार नेताओं और उनके बिकाऊ संगठनों पर कटाक्ष और पोल खोलती हमारे मिशनरी कवि की यह कविता जरूर पढ़े और आत्मचिंतन करें।

चल यार मिशन चलाते है,
खर्चे हेतु 1 संस्था बनाते है...!!!
दो चार चेलो को पाले,
उनसे नारे लगवाते है....!!!
चल यार मिशन चलाते है........1
4 मैं जोडू और 4 तू जोड़,
अपनी संख्या बढ़ायेंगे...!!!
मैं अध्यक्ष तू महामन्त्री,
ये सबको बतलायेंगे,....!!!
चन्दा बटोर कम्पनी बन,
आधा-आधा माल खाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....2
विधायक जी के पास चले,
कुछ चन्दा हिस्से आयेगा...!!!
100-100 अगर मांगे हमने,
50 तो जरूर मिल जायेगा...!!!
वरना सुन 10 हजार का ,
1 मुख्य अतिथि बनाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....3
जितना लम्बा भाषन होगा,
उतना घर में राशन होगा...!!!
भीम मिशन की आड़ में,
फिर तो अपना शासन होगा...!!!
हम है कट्टर भीम सैनिक,
दुनिया को बतलाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....4
अमा एक काम करो मियां,
एक कार्यक्रम रखवायेंगे...!!!
मंच, माला के संग माइक,
स्वागत अपना करवाएंगे....!!!
एक दो गायक, कवि,
शायर को भी बुलवाते है....!!!
*चल यार मिशन चलाते है....5
अपनी संस्था सबसे ऊँची, गला फाड़-2 बतलायेंगे...!!!
भीम मिशन को गड्ढे भीतर,
निम्न द्वार लेकर जायेंगे...!!!
ऐसे कर्मो को करने वाले,
केवल नेता  कहलाते है....!!!
*चल यार मिशन चलाते है.....6
दो चार आंदोलन करके,
फ़ोटो 100 खिंचवाएंगे....!!!
व्हाट्सएप-सोशल मीडिया ,
खूब उन्हें हम फैलाएंगे...!!!
बड़ी पार्टियों से घूस को लेकर,आंदोलन को दबाते हैं...!!!
*चल यार मिशन चलाते है....7
चमचा बनकर किसी भगोने,
के अंदर हम घुस जाएंगे.....!!!
चरण में पड़कर बड़े नेता के,
मन्त्री पद भी पायेंगे.....!!!
मिशन का काम हुआ पूरा,
चल अब मौज उड़ाते है...!!!
*चल यार मिशन चलाते है.....8

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2017

१२ ज्योतिर्लिंग

12 ज्योतिर्लिंगों का महत्व व महिमा ��

1- सोमनाथ

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग भारत का ही नहीं अपितु इस पृथ्वी का पहला ज्योतिर्लिंग माना जाता है। यह मंदिर गुजरात राज्य के सौराष्ट्र क्षेत्र में स्थित है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है, कि जब चंद्रमा को दक्ष प्रजापति ने श्राप दिया था, तब चंद्रमा ने इसी स्थान पर तप कर इस श्राप से मुक्ति पाई थी। ऐसा भी कहा जाता है कि इस शिवलिंग की स्थापना स्वयं चन्द्र देव ने की थी। विदेशी आक्रमणों के कारण यह 17 बार नष्ट हो चुका है। हर बार यह बिगड़ता और बनता रहा है। 

2- मल्लिकार्जुन

यह ज्योतिर्लिंग आन्ध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के तट पर श्रीशैल नाम के पर्वत पर स्थित है। इस मंदिर का महत्व भगवान शिव के कैलाश पर्वत के समान कहा गया है। अनेक धार्मिक शास्त्र इसके धार्मिक और पौराणिक महत्व की व्याख्या करते हैं। 

कहते हैं कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने मात्र से ही व्यक्ति को उसके सभी पापों से मुक्ति मिलती है। एक पौराणिक कथा के अनुसार जहां पर यह ज्योतिर्लिंग है, उस पर्वत पर आकर शिव का पूजन करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होते हैं। 

3- महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग 

यह ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी कही जाने वाली उज्जैन नगरी में स्थित है। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की विशेषता है कि ये एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है। यहां प्रतिदिन सुबह की जाने वाली भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है। महाकालेश्वर की पूजा विशेष रूप से आयु वृद्धि और आयु पर आए हुए संकट को टालने के लिए की जाती है। उज्जैनवासी मानते हैं कि भगवान महाकालेश्वर ही उनके राजा हैं और वे ही उज्जैन की रक्षा कर रहे हैं।

4- ओंकारेश्वर

ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध शहर इंदौर के समीप स्थित है। जिस स्थान पर यह ज्योतिर्लिंग स्थित है, उस स्थान पर नर्मदा नदी बहती है और पहाड़ी के चारों ओर नदी बहने से यहां ऊं का आकार बनता है। ऊं शब्द की उत्पति ब्रह्मा के मुख से हुई है। इसलिए किसी भी धार्मिक शास्त्र या वेदों का पाठ ऊं के साथ ही किया जाता है। यह ज्योतिर्लिंग औंकार अर्थात ऊं का आकार लिए हुए है, इस कारण इसे ओंकारेश्वर नाम से जाना जाता है।

5- केदारनाथ

केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भी भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड में स्थित है। बाबा केदारनाथ का मंदिर बद्रीनाथ के मार्ग में स्थित है। केदारनाथ समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। जिस प्रकार कैलाश का महत्व है उसी प्रकार का महत्व शिव जी ने केदार क्षेत्र को भी दिया है।

6- भीमाशंकर

भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पूणे जिले में सह्याद्रि नामक पर्वत पर स्थित है। भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग को मोटेश्वर महादेव के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर के विषय में मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से इस मंदिर का दर्शन प्रतिदिन सुबह सूर्य निकलने के बाद करता है, उसके सात जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं तथा उसके लिए स्वर्ग के मार्ग खुल जाते हैं।

7- काशी विश्वनाथ

विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह उत्तर प्रदेश के काशी नामक स्थान पर स्थित है। काशी सभी धर्म स्थलों में सबसे अधिक महत्व रखती है। इसलिए सभी धर्म स्थलों में काशी का अत्यधिक महत्व कहा गया है। इस स्थान की मान्यता है कि प्रलय आने पर भी यह स्थान बना रहेगा। इसकी रक्षा के लिए भगवान शिव इस स्थान को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे और प्रलय के टल जाने पर काशी को उसके स्थान पर पुन: रख देंगे। 

8- त्र्यंबकेश्वर

यह ज्योतिर्लिंग गोदावरी नदी के करीब महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग के सबसे अधिक निकट ब्रह्मागिरि नाम का पर्वत है। इसी पर्वत से गोदावरी नदी शुरू होती है। भगवान शिव का एक नाम त्र्यंबकेश्वर भी है। कहा जाता है कि भगवान शिव को गौतम ऋषि और गोदावरी नदी के आग्रह पर यहां ज्योतिर्लिंग रूप में रहना पड़ा। 

9- वैद्यनाथ 

श्री वैद्यनाथ शिवलिंग का समस्त ज्योतिर्लिंगों की गणना में नौवां स्थान बताया गया है। भगवान श्री वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का मन्दिर जिस स्थान पर अवस्थित है, उसे वैद्यनाथ धाम कहा जाता है। यह स्थान झारखंड राज्य (पूर्व में बिहार ) के देवघर जिला में पड़ता है। 

10- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग गुजरात के बाहरी क्षेत्र में द्वारिका स्थान में स्थित है। धर्म शास्त्रों में भगवान शिव नागों के देवता है और नागेश्वर का पूर्ण अर्थ नागों का ईश्वर है। भगवान शिव का एक अन्य नाम नागेश्वर भी है। द्वारका पुरी से भी नागेश्वर ज्योतिर्लिंग की दूरी 17 मील की है। इस ज्योतिर्लिंग की महिमा में कहा गया है कि जो व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ यहां दर्शन के लिए आता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती है।

11- रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग

यह ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के रामनाथपुरं नामक स्थान में स्थित है। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक होने के साथ-साथ यह स्थान हिंदुओं के चार धामों में से एक भी है। इस ज्योतिर्लिंग के विषय में यह मान्यता है कि इसकी स्थापना स्वयं भगवान श्रीराम ने की थी। भगवान राम के द्वारा स्थापित होने के कारण ही इस ज्योतिर्लिंग को भगवान राम का नाम रामेश्वरम दिया गया है। 

12- धृष्णेश्वर मन्दिर

घृष्णेश्वर महादेव का प्रसिद्ध मंदिर महाराष्ट्र के औरंगाबाद शहर के समीप दौलताबाद के पास स्थित है। इसे घृसणेश्वर या घुश्मेश्वर के नाम से भी जाना जाता है। दूर-दूर से लोग यहां दर्शन के लिए आते हैं और आत्मिक शांति प्राप्त करते हैं। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगोंb hv में से यह अंतिम ज्योतिर्लिंग है। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा निर्मित एलोरा की प्रसिद्ध गुफाएं इस मंदिर के समीप स्थित हैं। यहीं पर श्री एकनाथजी गुरु व श्री जनार्दन महाराज की समाधि भी है।

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

आरक्षण अन्य देशो में

RESERVATION IN OTHER COUNTRIES
दुनिया के निम्नलिखित देशो में मिलता है आरक्षण (Reservation/Affirmative Action):-
आजकल देश में दलित (OBC, SC & ST) आरक्षण के विरोध मे आंधी सी चल रही है। आरक्षण के खिलाफ बेहूदे और बेतुके तर्क किये जाते है। सबसे पहला तर्क होता है कि दूसरे देशो मे आरक्षण नहीं दिया जाता इसलिये वे देश हमसे ज्यादा प्रगितिशील है जो बिल्कुल गलत है। विदेशो मे भी आरक्षण की पद्धति है। अमेरिका, चीन, जापान जैसे देशों में भी आरक्षण है और इसे ईमानदारी से दिया जाता है।
बाहरी देशों में आरक्षण को Affirmative Action कहा जाता है। Affirmative Action का मतलब समाज के "वर्ण " तथा "नस्लभेद" के शिकार लोगो के लिये सामाजिक समता का प्रावधान है ।
1961 को संयुक्त राष्ट्र की बैठक मे सभी प्रकार के वर्ण, नस्लभेद व रंगभेद के खिलाफ कड़ा कानून बनाया गया। इसके तहत संयुक्त राष्ट्र में सम्मिलित सभी देशो ने अपने देश के शोषित वर्ग (दलित) की मदद करके उन्हें समाज की मुख्य धारा मे स्थापित करने का निर्णय लिया। इसी फैसले के तहत ही शोषितों और वंचितो को उठाने के लिए अलग अलग देशो ने अपने अपने तरीके से आरक्षण लागु किया है।
ऊपर कहे गए देश अमेरिका, जापान और भारत के अलावा अन्य देशो ने भी आरक्षण दिया है जिन मे से कुछेक निम्नलिखित हैं :-
1. हमारे पडोसी देश पाकिस्तान मे बडी मुश्किल से 5% दलित हैं लेकिन उन्हें ईमानदारी से 6% आरक्षण दिया जाता है।
2. आरक्षण के कारण दक्षिण अफ्रीका टीम में 6 अश्वेत खिलाडियों का चयन जरूरी होता है।
3. अमेरिका में affirmative action) के तहत अश्वेतों को आरक्षण मिला हुआ है। वहां की पिक्चरों में भी अश्वेत कलाकारों का आरक्षण निर्धारित है। वहाँ कोई पिक्चर या विभाग ऐसा नहीं मिलेगा जिसमें अश्वेत/काले न हो। अमेरिका ने तो आज से 155 साल पहले 4 मार्च, 1861 को (अब्राहम लिंकन) मोची जाति को अपना राष्ट्रपति बना दिया था। अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा भी एक अश्वेत, मुस्लिम और छोटे तबके के थे। तभी तो अमेरिका तरक्की की दुनिया में अन्य देशों से काफी आगे हैं। भारत में तो सम्पूर्ण हिस्सेदारी पर कुछे लोग कुंडली मारकर कब्जा जमा रखा है जबकि 50 प्रतिशत आरक्षण उन्ही 15 प्रतिशत लोगों को अप्रत्यक्ष रूप में मिल रहा है। इसीलिये वे समाज मे भ्रांति बनाये रखने के लिए आरक्षण/
हिस्सेदारी का आऐ दिन विरोध करते रहते हैं।
4. ब्राझील में आरक्षण Vestibular नाम से जाना जाता है ।
5. कनाडा में समान रोजगार का तत्व है जिसके तहत फायदा वहाँ के असामान्य तथा अल्पसंख्यकों को होता है ।
6. चीन में महिला और तात्विक अल्पसंख्यको के लिये आरक्षण है ।
7. फिनलैंड मे स्वीडीश लोगो के लिये आरक्षण है ।
8. जर्मनी में जिमनॅशियम सिस्टम है ।
9. इसरायल में Affirmative Action के तहत आरक्षण है ।
10. जापान जैसे सबसे प्रगतिशिल देश में भी बुराकूमिन लोगो के लिये आरक्षण है (बुराकूमिन जापान के हक वंचित दलित लोग हैं )
11. मॅसेडोनिया में अल्बानियन के लिये आरक्षण है ।
12. मलेशिया में भी उनकी नई आर्थिक योजना के तहत आरक्षण लागू हुआ है ।
13. न्यूजीलैंड में माओरिस और पॉलिनेशियन लोगो के लिये Affirmative Action का आरक्षण है ।
14. नॉर्वे के पीसीएल बोर्ड मे 40 % महिला आरक्षण हें।
15. रोमानिया मे शोषण के शिकार रोमन लोगों के लिये आरक्षण है ।
16. दक्षिण आफ्रिका मे रोजगार समता (काले गोरे लोगो को समान रोजगार) आरक्षण है ।
17. दक्षिण कोरिया मे उत्तरी कोरिया तथा चीनी लोगों के लिये आरक्षण है ।
18. श्रीलंका मे तमिल तथा क्रिश्चियन लोगो के लिये अलग नियम अर्थात आरक्षण है ।
19. स्वीडन मे General Affirmative Action के तहत आरक्षण मिलता है ।
अगर इतने सारे देशों में आरक्षण दिया जाता है (जिनमे कई विकसित देश भी शामिल है) तो फिर भारत का आरक्षण किस प्रकार भारत की प्रगति में बाधक है। भारत में तो लोग सबसे ज्यादा जातिभेद के ही शिकार हैं । भारतीय शुद्रो/दलितो को तो हजारों सालों से उनके मौलिक अधिकारों से ही वंचित कर गुलाम बना कर रखा। तो फिर भारतीय दलितो को आरक्षण क्यों न मिले?
जब तक भारत के सभी जाति धर्म के लोग शिक्षा, सेना, सभी प्रकार की नौकरी, संसाधन तथा सरकार में समान रुप से प्रतिनिधित्व नहीं करेंगे , तब तक देश वांछनीय प्रगति नहीं कर पाएगा। अगर सभी देश प्रगति के लिए सभी लोगों को साथ लेकर चल रहे हैं तो फिर भारत क्यों नहीं।

जय संविधान.....जय भारत।
गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016

समान शिक्षा ,इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय

                                                                     इलाहबाद हाई कोर्ट का निर्णय स्वागत योग्य है | यह किसी की अस्मिता से जुड़ा प्रश्न नही होना चाहिए | क्यों की आज भारत का बहुत बड़ा वर्ग किसान है या गरीब है या दलित समुदाय से आता है | ऐसे में जब उनके बच्चो को शिक्षा न मिले तो उनके दिलो पर क्या बीतती होगी | यह सहज अहसास कर पाना बड़ा ही कठिन सवाल ?
                                                                    आज जहाँ सरकार द्वारा शिक्षा के अनेको प्रावधान किये गए फिर भी हम आज शिक्षा के अधिकार से ही वंचित है | संविधान के अनुच्छेद 41 A के तहत राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतों के तहत मान्यता दी गई थी जिसके अनुसार, "राज्य अपनी आर्थिक क्षमता और विकास की सीमाओं के भीतर, शिक्षा और बेरोजगारी, वृद्धावस्था, बीमारी और विकलांगता के मामले में सार्वजनिक सहायता करने के लिए काम करते हैं, सही हासिल करने के लिए प्रभावी   व्यवस्था करे “ /
                                                                      हालांकि संविधान निर्माणी सभा के अनेको सदस्य और स्वतः बाबा साहब अम्बेडकर यह चाहते थे कि समान शिक्षा का अधिकार मूल अधिकार में शामिल हो और न्यायिक आदेश से लागू होने की व्यवस्था हो। परन्तु उस समय केन्द्र सरकार के मुखिया और निंयत्रको का यह तर्क था कि सरकार का खर्च और साधन इतने विकसित नही है कि इसे वैधानिक अधिकार या कानून के रुप में लागू किया जा सके। अतः कुछ समय ढांचे के विकास को चाहिये और इसलिये अन्य मुद्दों की तरह इसे भी नीति निर्देशक मुद्दों के खण्ड में शामिल किया जाये जो कि सरकारों के लिये आदर्श हो और कुछ समय पश्चात जब आधार रुप ढांचे का विकास हो जाये तब अन्य मुद्देां के साथ समान शिक्षा के मुद्दे को भी मूल अधिकार के रुप में शामिल किया जा सकता है।
                                                                       पर अफ़सोस व दुखद यहाँ रहा की इसका कोई ठोस नियम या आदेश न बन सका | इसके पीछे तर्क था की भारतीय अर्थव्यवस्था इतनी मजबूत नही की इस खर्च को झेल चुके |एक यह भी अनुमान लगाया गया की आने वाली सरकारे 10-20-30 वर्षो में इसका नियम व आदेश बना लेंगे पर आज आजादी के 68 वर्ष बीत चुके है फिर भी हम लोगो को शिक्षा का समान अधिकार नही दे पाये |

                                                                      निजी स्कूलो के नाम पर आर्य समाज ईसाई मिशनरी संस्थायें, इस्लामिक मदरसा, गुरुद्वारा प्रंबधक सभायें जैसी अन्य धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से शिक्षा के प्रसार के लिये स्कूल कालेज आदि खोले गये थे परन्तु यह सामाजिक हित में और गरीब लोगो को भी शिक्षा देने के लिये न्यूनतम फीस आदि के आधार पर शुरु किये गये थे।इनमें व्यापार या मुनाफा नही था और न ही निजी मालकियत थी बल्कि इनके पीछे समाज सेवा शिक्षा का विकास और परोपकार की भावना थी।
                                                                     परन्तु कुछ वर्षो के पश्चात समाज के ताकतवर सपन्न और प्रभावी लोगो ने अपने बच्चों के लिये पृथक और मंहगे स्कूल शुरु कराये जैसे दून स्कूल डेली कालेज और ऐसी ही अन्य शिक्षण संस्थाओं को राजा महाराजा या उद्योगपतियों के पैसे से खड़ा करना आंरम्भ हुआ तथा शिक्षा को अमीर और गरीब-बड़े और छोटे ताकतवर और कमजोर राजा और रंक के बीच बांट दिया गया। पुराने राजाओं, धनपतियों और राज सत्ता पर बैठे नेताओं तथा अफसर शाहो के बच्चे इन बड़े स्कूलों में पढ़ाये जाने लगे जहां पढ़ाई का माध्यम सत्ता प्रतिष्ठान की भाषा अंग्रेजी हो गई और उच्चवर्गीय और उच्च वर्णीय ढ़ाचे को स्थाई तौर पर बरकरार रखने के लिये शिक्षण संस्थाओं में भाषा महत्वपूर्ण माध्यम बन गई।
                                                                     डा.राममनोहर लोहिया ने नारा दिया था ’’राष्ट्रपति हो या चपरासी की संतान सबकी शिक्षा एक समान’’ लोहिया इस बात को जानते थे कि अगर अफसर और चपरासी का बेटा, सम्पन्न और गरीब का बेटा , उद्योगपति और किसान का बेटा, बड़ी जात और दलित का बेटा जब एक ही स्कूल में साथ-साथ पढ़ेगे तो भेद-भाव मिटेगा |राष्ट्रीय एकता मजबूत होगी तथा सबको समान अवसर प्राप्त होगे,जिससे योग्यता और क्षमता का विकास भी उसी के अनुसार होगा।
                                                                     यह बड़ा विचित्र है कि हमारे देश के कुछ नौजवान और कुछ लेाग जो आरक्षण को समानता का विरोधी मानते है आरक्षण तो मिटाना चाहते है| आरक्षण मुक्त भारत का नारा लगाते है परन्तु समान शिक्षा की बात नही करते। वे यह तो कहते है कि 68 साल आरक्षण को हो गये इसे खत्म करना चाहिये परन्तु वो यह नही कहते कि 68 साल हो गये कि अब नीति निर्देशक मुद्दों को संवैधानिक प्रावधान बनना चाहिये तथा सबको समान शिक्षा का अवसर मिलना चाहिये।
                                                                 असमान शिक्षा भी एक प्रकार का आरक्षण है जिसमें सम्पन्न और ताकतवर के बच्चो को पद और पैसे के आधार पर शिक्षा के विशेष अवसर है। इसका आधार योग्यता नही है बल्कि मात्र आर्थिक या सत्ता प्रतिष्ठान की ताकत ही योग्यता है। यह नौजवान मित्र बड़े-बड़े डोनेशन वाली (जो वस्तुतः भ्रष्ट व काला धन होता है) उस शिक्षा प्रणाली का भी विरोध नही करते जिसमें लाखो करोड़ रुपये देकर अयोग्य छात्र डाक्टर, इंजीनियर आदि बन जाते है और इसीलिये समाज के एक बड़े हिस्से में उनकी मांग और नीयत संदिग्ध रहती है। अब देश में सरकारी शिक्षण संस्थाये और विशेषतः प्राथमिक शिक्षा मैदान के बाहर नजर आती है। नये सरकारी स्कूल खुलने के बजाय बंद हो रहे है। परोपकार के नाम पर शुरु किये जाने वाली धार्मिक और सामाजिक संगठनों के द्वारा चलाये जाने वाले स्कूल बंद हो रहे है|
                                                                कहने को तो सरकार ने शिक्षा का कानून RTE 2009 में पारित कर दिया है , निजी शिक्षक संस्थाओ को 25 प्रतिशत स्थान गरीबो के बच्चो को आरक्षित रखने का प्रावधान कर दिया है। पर यह तो कानून की किताबो में ही सिकुड़ कर रह गया है | स्कूलो में प्रवेश भी मिल जाये पर विद्यालय में लगने वाली वर्दी (यूनिफार्म) महँगी किताबे ,कापियां ,स्कूल की दुरी की वजह से साधन याने स्कूल प्रबंधन की चलने वाली महँगी किराये वाली बस (BUS) ,एवं विद्यालय में लगने वाली शिक्षण शुल्क के अलावा अन्य लगने वाली शुल्क की भरपाई कौन करेगा ,,कोर्स में अनेक प्रकार के प्रोजेक्ट बनाने के लिए सहायक सामग्री स्टेशनरी कम्प्यूटर ,प्रिंटर आदि कहाँ से लाये जाये ,यह सारी बाते या समस्याए एक गरीब परिवार नही झेल सकता |
                                                                भारत की 15 वी जनगणना(वर्ष 2015) के अनुसार देश में साक्षरता 74.04 फीसदी है| जिसमे पुरुष साक्षरता 82.14 फीसदी और महिला साक्षरता 65.46 फीसदी हो गई | पर इस बात का ध्यान रहे की शिक्षित होना और साक्षर होना दोनों में भिन्नता है | अब समय आ गया है जब  शिक्षा की ही नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात होनी चाहिये”” |
                           यही कारण है कि””सबको शिक्षा-अच्छी शिक्षा”” हमारा नारा है।
                                                              जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे | तभी हम सभी समान शिक्षा का अधिकार दे पाएंगे |
                                                               आज मध्यप्रदेश में शिक्षा की हालत बहुत ही दयनीय है जिसके कारण आज शिक्षा का व्यापारीकरण हो गया है| सरकारी स्कुलो का रुख खासकर प्रायमरी स्तर पर केवल गरीब के बच्चे मध्यान भोजन के लिए या छात्रवृत्ति के लिए नाम मात्र को स्कूल पहुँच रहे है | वही शिक्षको में अनेक कटेगिरी का निर्माण शासन ने कर रखा है /अतिथि , गुरूजी, संविदा शिक्षक ,शिक्षाकर्मी ,नियमित शिक्षक ,पद एक ,कक्षाए भी पढ़ाने को एक ,पर दुर्भाग्य की इनका वेतन अलग-अलग है |ऐसे में मानसिक तनाव झेल रहा मध्यप्रदेश का शिक्षक अपने नियमतीकरण के लिए कही स्कूल बंद ,कही हड़ताल ,कही ज्ञापन ,कही जेल में बंद रहकर सरकार की नीतियों व वादा खिलाफी के प्रति अपनी जंग जारी रखे हुए है ,,,ऐसे में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा ,विद्यालयों का सही सञ्चालन हो पाना आज “”दूर की कौड़ी साबित”” हो रहा है |
                     सरकारी विद्यालयों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की कमी के कारण :-
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01. विद्यालयों को सही संचालित करने में सरकार की इच्छाशक्ति की कमी |
02. नेताओ के द्वारा आपने वोटर्स तैयार करने के लिए शैक्षणिक घोषणाए |
03. गुणवत्तापूर्ण शिक्षक/ शिक्षिका की कमी
04. शिक्षक/शिक्षिका को अन्य शैक्षणिक कार्यो में उलझाये हुए रखना |
05. शिक्षको को पुरे वर्ष स्कूल के बाहर जनगणना, मतदाता सूचि का संधारण  ,ग्राम सर्वे ,BPL सूचि तैयार            करना ,पशु गणना ,मध्यान भोजन की  जानकारिया जुटाना  आदि अनेक ऐसी ही योजनाओ को
       राष्ट्रिय कार्य का नाम देकर शिक्षक/शिक्षिका से करवाया जाता है |
06. गुणवत्तापूर्ण व नियमानुसार एवं सर्व सुविधायुक्त विद्यालय ईमारत का न होना |
07 .विद्यालयों में पानी ,साफ-सफाई,रौशनी ,साफसुथरे लैट्रिन-बाथरूमो का न होना |
08. विद्यालय का सही प्रबंधन न होना |
09. विद्यालयों में होने वाली मानिटरिंग को सही अन्जाम न देना ,,यह केवल खानापूर्ति तक
      सीमित रहा गया है |
10. अधिकारियों का अपनी जेब गरम करने से फुर्सत नही जिसकारण विद्यालयों की सुविधा एवं
      पढाई लिखाई पर ध्यान देने का ढुलमुल रवैया |
                                                                 यदि सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर ,लिपिक,चपरासी, किसान ,दलित आदि जब सभी के बच्चे एक ही स्कूल में एक ही छत के नीचे एक ही अध्यापक से शिक्षा ग्रहण करेंगे तो इसके परिणाम भी बेहद रोचक होंगे |साथ ही भारत देश का जो एक बड़ा तबका जो की शिक्षा से अछूता या कहे शिक्षा के नाम पर साक्षर तो है पर शिक्षित नही है |ऐसे बदलाव से समाज पर भी गहरा और भविष्य में सामाजिक भेदभाव मिटाने में कभी सहायक सिद्ध होगा |
समाज पर प्रभाव :-
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01. सभी छात्र एक जैसी वर्दी (यूनिफार्म) पहनेगें तो न कोई आमिर दिखेगा न ही कोई गरीब दिखेगा
02. सभी छात्र एक जैसी किताबो का अध्ययन करेंगे जिससे सभी का ज्ञान बुद्धि-लब्धि के हिसाब से एक जैसा होगा |
03. सरकार के द्वारा स्कुलो में उपलब्ध करवाए गए पढाई –लिखाई के साधन भी एक जैसे होंगे |
04. सबसे अहम बात की गरीब बच्चो को पढाई करने में हीन भावना का शिकार भी नही होना पढ़ेगा |
05. कक्षा में एक अध्यापक सभी छात्रो को एक जैसा ही पढ़ेगा ,यह नही होगा की ये गरीब छात्र है की यह अमीर छात्र है |किसी एक पक्ष को इंगित नही करेगा |
06. अमीर छात्रो को अलग से कोई अन्य भाषा नही पढ़ाई जाएगी ,जैसा की बड़े निजी विद्यालयों में होता है |सभी को एक ही पाठ्यक्रम से पढाया जायेगा |
07. एक साथ स्कूलो में बैठक व्यवस्था होगी | क्यों की अमीर गरीब का भेदभाव अभी भी समाज में व्याप्त है |
08. जब सभी नेता ,अभिनेता ,लोकसेवक ,जज ,अफसर , व्यापारी के पुत्र/पुत्री जब सरकारी स्कूलो में पढेंगे तो आपने आप ही सभी स्कुलो पर विशेष ध्यान देना शुरू
कर देंगे और स्कुलो की खस्ता हालत या लचर व्यवस्था में सुधार आना शुरू हो जायेगा |
09. शिक्षको को सही वेतनमान और सही समय पर पगार(पेमेंट) मिलना शुरू हो जाएगी |
10. वर्तमान में जो हम भारत की साक्षरता 74 प्रतिशत बताते है यही शिक्षा में परिवर्तित हो जाएगी ,फिर हर वर्ग का छात्र देश के प्रति देशप्रेम और देश के संसाधनों को
गुणवत्तापूर्ण उपयोग के बारे में सोचेगा
यह इलाहबाद हाई कोर्ट का बहुत ही सराहनीय कदम है |इससे समाज ही नही देश में भी शिक्षा के क्षेत्र में व्यापक बदलाव आएंगे |
नरेन्द्र कुमार पासी
भूगोल ( वरिष्ठ अध्यापक )
शास. बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सरवन 
 पोस्ट- सैलाना ,जिला-रतलाम(मध्यप्रदेश)
भारत

रविवार, 2 अक्टूबर 2016

बाबा साहेब ने इस्तीफा क्यों दिया।

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा क्यू दिया..???*****************************मुख्य चार कारण:-
(01.) डा० बी.आर. अंबेडकर ने अनुच्छेद 340 में OBC आरक्षण के विषय मे लिखा उसकी सच्चाई
        और महत्वपूर्ण तथ्य..(1) अनुच्छेद 341 के अनुसार शेड्यूल कास्ट (SC) को 15% प्रतिनिधित्व दिया....
(2 )  अनुच्छेद 342 के अनुसार..शेड्यूल ट्राईब (ST) को 7.5% प्रतिनिधित्व दिया...और इन वर्गो का विचार              करने से पहले डा. अंबेडकर ने सर्वप्रथम OBC अर्थात अन्य पिछड़ी जातियों का विचार किया... इसीलिये           डा.अंबेडकर ने अनुच्छेद 340 के अनुसार OBC को सर्वप्रथम प्राथमिकता दी....
(3)   अनुच्छेद 340 के अनुसार OBC को 52% प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया, उस समय लौह-पुरूष                 "सरदार पटेल" इसका विरोध करते हुए बोले...."ये OBC कोन है"...???ऐसा प्रश्न सरदार पटेल स्वत:                  OBC होते हुए भी पूछा...!!!क्युकि उस समय तक SC और ST मे शामिल जातियों की पहचान हो चुकी            थी.... और OBC में शामिल होने वाली जातियों की पहचान....(जो आज 6500 से अधिक है) का कार्य पूर्ण        नहीं हुआ था.......कोई भी "अनुच्छेद" लिखने के बाद.. डा० अंबेडकर को उस"अनुच्छेद" को...प्रथम तीन            लोगो को दिखाना पड़ता था.....
                       1) पंडित नेहरू2) राजेंद्र प्रसाद3) सरदार पटेल..इन तीनों की मंजूरी के बाद... उस अनुच्छेद का       विरोध करने की हिम्मत किसी में नहीं थी...उस समय संविधान सभा में कुल 308 सदस्य होते थे, उसमें से       212 Congress के थे....अनुच्छेद 340, अनुच्छेद 341 और 342 के पहले है... सभी पिछड़ी जातियों को इस         महत्वपूर्ण तथ्य पर ध्यान देनाचाहिए..340 वां अनुच्छेद असल में क्या है... ???जिस समय बाबासाहब            डा० अंबेडकर ने 340 वां अनुच्छेद का प्रावधान किया और सरदार पटेल को दिखाया.. उस पर सरदार पटेल        ने बाबासाहेब से प्रश्न किया " ये OBC कौन है".... "हम तो SC और ST को ही backward मानते हैं"... ये            OBC आपने कहा से लाये......???सरदार पटेल भी बॅरिस्टर थे, और वह स्वयं OBC होते हुए भी ...उन्होंने          OBC से संबधित अनुच्छेद 340 का विरोध किया...!!!किंतु इसके पीछे की बुद्धि.. सिर्फ गांधी और नेहरू की        थी......तब डा. अंबेडकर ने सरदार पटेल से कहा... "it's all right Mr. Patel " मै आपकी बात संविधान मे डाल       देता हूँ कि" संविधान के अनुच्छेद 340 में सरदार पटेल के मुख से बोले गये वाक्य के अाधार पर ... 340 वें      अनुच्छेद के अनुसार ...इस देश के राष्ट्रपति को OBC कौन है...?? "येमालूम नहीं है"....और इनकी पहचान     करने के लिए एक "आयोग गठित" करने का आदेश दे रहे हैं "......गांधी..... नेहरू...पटेल....प्रसाद और उनकी      Congress की, OBC को प्रतिनिधित्व देने की इच्छा नहीं है... ये बाबासाहेब को दिखा देना था....परंतु 340 वें      अनुच्छेद के अनुसार राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने OBC कौन है..इन्हें पहचानने के लिए आयोग नहीं बनाया.!!      इसलिए दि. 27 Sept 1951 को बाबासाहेब ने केन्द्रीय कानून मंत्री पद से इस्तीफा दिया..मतलब OBC के          कल्याण के लिए केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा देने वाले पहले और अंतिम व्यक्ति डॉ बाबासाहेब आंबेडकर         है...परंतु आज भी यह घटना अपने OBC जाति के मित्र को शायद मालूम नहीं है इस बात पर बहुत आश्चर्य     और दुख होता है.... !!!!...सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि बाबासाहेब डा. अंबेडकर को त्यागपत्र पंडित नेहरू ने     संसद में पढ़ने नहीं दिया.. !!!अंत में 10 Oct 1951 को बाबासाहेब ने यह बात संसद के बाहर प्रसार माध्यम       के सामने रखी..." यह बात उल्लेखनीय है कि...अगर संसद में "त्यागपत्र" को पढ़ने दिया जाता तो... भविष्य     में OBC को असलियत का पता चलता की OBC के लिए डा.अंबेडकर ने कानूनमंत्री पद से इस्तीफा दिया...     !!!डा. अंबेडकर ने कानूनमंत्री पद से इस्तीफा दिया उसके चार मुख्य कारण...1) अनुच्छेद 340 के अनुसार       आयोग की नियुक्ति नहीं की...2)नेहरू का परराष्ट्रीय ऐजंडा गलत था...3)हिन्दू कोड बिल...4)प्रधानमंत्री            नेहरू ने कैबिनेट वितरण में बाबासाहेब से किया भेदभाव...पर डा. अंबेडकर ने हिंदू कोड बिल के लिए              इस्तीफा दिया... इस बात का प्रचार किया जाता है... !!!इस्तीफा देने के कारण का क्रम देखा जाए तो                डा.अंबेडकरने किस बात को महत्व दिया ...आपके ध्यान में आयेगा.....।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

धर्म और संस्कृति

Balendu Swami*कुरीतियों का स्रोत और धर्म तथा संस्कृति में अन्तरक्या है!*मैं जब भी किसी भी धर्म और संस्कृति के खिलाफ कुछ लिखता हूँ तो उसके प्रति सॉफ्ट कोर्नर रखने वाले लोग कहते हैं कि आप धर्म के खिलाफ नहीं उसकी कुरीतियों केखिलाफ लिखो. मैं जरा समझना चाहता हूँ कि आखिर कुरीति का मतलब क्या है? कुरीति का मानदण्ड क्या है? कब और कौन ये निश्चित करता है कि ये कुरीति है? किसी रीति को कुरीति का दर्जा देने का अधिकार किसे प्राप्त है?क्या धर्मग्रंथों में लिखी बातें या उनसे प्रेरित परम्पराएँ कुरीति है? बहुत सी ऐसी बातें हैं जिन्हेंआप या आपके जैसे कुछ लोग अब कुरीति कह रहे हैं परन्तु जो इन धर्म और संस्कृति से प्रेरित परम्पराओं का पालन सैकड़ों, हजारों वर्षों से करते चले आ रहे हैं वो इसे कुरीति नहीं बल्कि अपनी संस्कृति मान कर करते हैं. कल जो संस्कृति और गर्व की बात थी, जिसे महिमामंडित किया जाता था, आज आप उसे कुरीति कह रहे हो.उदाहरण के लिए आज से 200 साल पहले तक पति की चिता के साथ सती होना महिमा और गर्व की बात थी, राजा राममोहन राय ने कानून बनाकर उसे रोक दिया गया, परन्तु करपात्री जी जैसे धार्मिक पुरोधाओं ने वेदों और अन्यधर्मग्रन्थों से प्रमाण देकर सतीप्रथा को धार्मिक और पुण्य का कार्य बताया! और आज भी राजस्थान में सती का मंदिर है जहाँ रोज दर्शन और पूजा को हजारों लोग जाते हैं. हालाँकि अधिकाँश लोग आज इसे कुरीति मानते होंगे, परन्तु मैं अपने जीवन में खुद हजारों ऐसे लोगों से मिला हूँ जोकि सतीप्रथा को आज भी महिमामंडित करते हैं.चलिए ये बात तो थोड़ी पुरानी हो गई, आज की बात करते हैं:दहेज़ की परम्परा हजारों साल से चली आ रही है, धर्मग्रंथों में स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं, और आज के सामान्य जन को भी यह कोई कुरीति नहीं लगती, संभवतः मुट्ठी भर लोगों को यह भी कुरीति लगती होगी, और मुझे पूरा विश्वास है कि आगे आने वाली पीढियां इसे पूरी तरह कुरीति घोषित कर देंगी. तो जो आज कुरीति नहीं बल्कि अपने सामर्थ्य का प्रदर्शन है वह भविष्य में कुरीति हो जायेगी.ठीक ऐसे ही आज जिसे आप संस्कृति कहते हो और वेदमंत्रों से संकल्प लेकर ‘कन्यादान’ करते हो, मेरा दावा है कि भविष्य में लड़कियां इस रीति से भड़क जायेंगी और कहेंगी कि हम कोई जानवर या वस्तु नहीं हैं, जोकि तुम जिसे चाहे उसे दान कर दो! और फिर देखना आपकी ये सुरीति कुरीति में बदल जायेगी.आज भी संस्कृति का पालन करने वाले परिवारों और गाँवों में घूँघट तथा पर्दा प्रथा आम बात है, परन्तु बहुत से लोग इसे कुरीति मानकर त्याग चुके हैं. हालाँकि जो इसका पालन करते हैं वो इसका पालन न करने वाले को हेय दृष्टि से देखते हैं और उनकी नज़र में यह कुरीति नहीं बल्कि उनकी संस्कृति का पालन है, और जो इसे स्वीकार नहीं करते वो बेशर्म हैं.जाति व्यवस्था और छुआछूत को शायद आप कुरीति कहते होंगे, परन्तु करोड़ों लोगों के लिए यही उनकी संस्कृति है, और उनके धर्मग्रंथों का आदेश है, जो हजारों साल से चला आ रहा है, और आज भी कितने ही मंदिरों में घोषित अथवा अघोषित रूप से ठीक हमारे आपके जैसे एक इन्सान का प्रवेश वर्जित है! और तो और उनकी बस्तियां और पानी भरने के स्थान अलग हैं! और यह सब कुछ धर्म के द्वारा मान्यता प्राप्त और पोषित है.इस सन्दर्भ में हमें संगठित धर्म और संस्कृति के अन्तर को समझना भी जरुरी है. संगठित धर्म वह व्यवस्थाअथवा कानून है जो समाज का नियमन करने के लिए हजारों साल पहले बनाया गया. जिसके अनुसार आपको बताया जाता हैकि आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए! और धर्म की व्यवस्था ने शोषण के उद्देश्य से स्वयं को जड़बनाया और उसमें संशोधन तथा बदलाव की सारी संभावनाएं समाप्त कर दीं. इसीलिये आप गीता और कुरान को बदल नहीं सकते. तथा संस्कृति का मतलब है परिवेश, जिसमें व्यक्तियों के समूह की सोच का प्रभाव और प्रवाह होता है. निश्चित रूप से धर्म व्यक्ति की सोच को प्रभावित करता है और उसका प्रतिबिम्ब संस्कृति पर भी पड़ता है. परन्तु संस्कृति धर्म की तरह जड़ नहीं होती और हमेशा बदलती रहती है.सौ पचास साल पहले की बात तो आप छोड़ दो हमारे आसपास की संस्कृति तो बहुत जल्दी बदलती रहती है. आपको एक उदाहरण दूँ: लगभग 25 साल पहले जब मैं एक टीनएज था तब हमारे छोटे से शहर में अगर कोई प्रेम विवाह कर लेता था तो बहुत बड़ी बात होती थी और पूरे शहर में वो विवाह चर्चा का विषय बन जाता था परन्तु आज ये कोई सामान्य बात तो नहीं है, फिर भी हल्ला भी नहीं होता और खबर भी नहीं बनती. इस तरह से संस्कृति (कल्चर) बदलता है और हरक्षण बदल रहा है. आप बदलाव को रोक नहीं सकते परन्तु यदि आप नहीं बदलोगे तो कष्ट पाओगे. हमारी प्राचीन भारतीय संस्कृति की हर समय, हर बात में दुहाई देने वालों से पूछना चाहता हूँ कि प्राचीन समय मतलब हमारी दादी नानी के जमाने में तो बाल विवाह हुआ करते थे, और आजकल की अरेंज मैरेज की तरह दिखाई की रस्म नहीं होती थी! तो क्यों नहीं करते आप अपने 10-12 साल के बच्चों की शादी! बदले तो आप भी हो और अगले दस बीस सालों में आपभी वो नहीं रहोगे जो कि आज हो परन्तु आपके साथ दिक्कत ये है कि इस बदलाव को स्वीकार करने और पचाने में आपको दिक्कत हो रही है! और ऐसा भी नहीं है कि प्राचीन संस्कृति हमेशा महान ही हो, अपनी संस्कृति की बहुत सीबातों को सुनकर आप आज नाक मुंह सिकोड़ने लग जाओगे! परन्तु मैंने हमेशा देखा है कि इस तरह के लोग जो आधुनिक भी होना चाहते हैं, और पुराने को छोड़ना भी नहीं चाहते अधिकांशतः दुविधा और संशय में रहते हैं और कई बार तो अवसाद के मरीज तक बन जाते हैं.अब मैं वापिस अपनी मूल बात पर लौटता हूँ, और कहना यह चाहता हूँ कि यहाँ तो मैंने कुछ कुरीतियों की ही चर्चा करी परन्तु आप किसी भी कुरीति को उठाकर देख लो, उसके मूल में धर्म का वह सडा और रुका हुआ वह पानी होताहै, जिसमें कि प्रवाह नहीं है और वो बदबू देने लग गया है, परन्तु धर्म और प्राचीन संस्कृति के मोह और मिथ्या गर्व को न छोड़ पाने वाले लोग उसे ढोते रहने का दुराग्रह करते हैं. धर्म आपको आज भी उसी हजारों साल पुरानी लाठी (कानून) से हाँकना चाहता है, जिसका कि उद्देश्य मनुष्य मन के भय और लालच का दोहन करके शोषण करना था. उसी के हिसाब से उसने अपने तानाशाही वाले कानून बनाए और न पालन करने पर नरक इत्यादि के भय दिखाए अथवा पालन करने पर स्वर्ग इत्यादि के लालच दिए!इसीलिये मैं धार्मिक व्यक्ति पर नहीं बल्कि धर्म और उसके ठेकेदारों पर चोट करता हूँ, आम धार्मिक व्यक्ति तो केवल भेड़ होता है जिसके पास अपनी कोई समझ नहीं और कुछ किताबों में लिखी अच्छी बुरी बातों को मानने के अलावा उसके पास और कोई चारा नहीं. सावधान रहने की जरुरत तो उन पाखंडियों से है जो यह कहते हैं कि वो भी “धर्म के पाखण्ड के खिलाफ हैं”. अरे सच्ची बात तो यह है कि धर्म में पाखण्ड के सिवाय कुछ और है ही नहीं, अथवा यों कह लो कि पाखण्ड धर्म में से निकाल दोगे तो धर्म में कुछ बचेगा ही नहीं, क्योंकि चोरी न करना, ईमानदारी और प्रेम से रहना तथा झूठ न बोलने जैसी नैतिक शिक्षाओं के लिए तुम्हें हिन्दू, मुसलमान होनेकी जरुरत नहीं, परन्तु शोषण के उद्देश्य से कुछ नैतिकशिक्षाओं को इकट्ठा करके उसे संगठित धर्म के रूप में बेचने का षड्यंत्र करने वाले सबसे बड़े अपराधी हैं. भूतकाल में ये षड्यंत्र चाहे जिन्होंने भी किया हो, परन्तु वर्तमान में ये षड्यंत्रकारी बाबा, गुरु और सन्यासी अथवा कथावाचक के रूप में मिल जायेंगे, ये भी जरुरी नहीं कि ये हमेशा पारम्परिक परिवेश में ही हों,कई बार ये आपके अगल बगल और आप जैसी वेशभूषा में भी फेसबुक और ब्लॉग के माध्यम से यह कहते मिल जायेंगे किहम भी “धर्म के पाखण्ड के खिलाफ हैं”, परन्तु “धर्म का मतलब धारण करना है”, “एक मनोविज्ञान है”, “जीवन की पद्धति है” और भी जाने कितना ब्ला ब्ला, धर्म के द्वारा प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष लाभ लेने वाले (कभी कभी अवैतनिक मानसिक रोगी) इन ठेकेदारों से बचना, क्योंकि इन्हें पता पड़ चुका है कि इनके इस गंदे धंधे की पोल खुल रही है और अधिकतर लोग धर्म के चंगुल से छूटरहे हैं, इसलिए अब इन्हें नए फंडे चाहिए अपना वर्चस्वकायम रखने के लिए. कभी ये आपको निर्मल बाबा की तरह टीवी पर समौसे खिलाकर ईश्वर की कृपा बेचते मिल जायेंगे और कभी कुमार स्वामी की तरह मन्त्रों से कैंसर ठीक करते मिलेंगे या फिर कभी श्रीश्री रविशंकरकी तरह अपनी फोटो के आगे मोबाइल चार्ज करने का दावा करते और चमत्कारी तेल से तुरन्त मांस-पेशियों में ताकत पैदा करते तथा जीवन को जीने की कला सिखाते हुए मिल जायेंगे, परन्तु इन सबके पीछे काल्पनिक, अलौकिक, ईश्वरीय सत्ता और शक्ति को बेचने का धूर्त प्रयास अवश्य ही होगा, अब चाहे आप उनके इस प्रोडक्ट को भय से खरीदो या लालच से, इसीलिये मैं कहता हूँ कि धर्म ही खुद में सबसे बड़ा पाखण्ड और कुरीति है.सबसे बड़ी कुरीति तो हर संगठित धर्म खुद ही है, जिसमें से असंख्यों छोटी-मोटी कुरीतियाँ निकलती हैं. परन्तु जब आप ‘धर्म की कुरीतियां’ कहते हैं तो यह कहकरइस गन्दगी के ऊपर कपड़ा डालकर उसे छुपा रहे होते हैं, और उस गन्दगी के स्रोत को वैसा ही छोड़ देते हैं, जिससेकि गन्दगी और बढ़ेगी, और इसी तरह से आजतक बढी है. जरुरत क्या है, इस धर्म नामक भेड़ों वाली कुव्यवस्था और कुरीति को ढोने की! क्या आपमें खुद सोचने समझने की क्षमता नहीं है? क्यों न हम समय के प्रवाह, आधुनिक और वैज्ञानिक सोच के साथ चलें और एक सुन्दर ताजे पानी केझरने की तरह बहती हुई सुसंस्कृत संस्कृति का निर्माणकरें, और अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए भी इस दुनिया को धर्म, सम्प्रदाय, अन्धविश्वास और कुरीतियों से मुक्त बनायें.ऐसे ढेर सारे विषयों पर चर्चा करने के लिए आपका स्वागत है