बुधवार, 27 मार्च 2013

नेता


                     जो अच्छे नेता है , उन  सबका   अभिनन्दन है
                     उनको सौ-सौ बार नमन है ,मन प्राणों से वंदन है
                     लेकिन जो दौलत  के भूखे , सत्ता के दीवाने है
                     सात समंदर पार , तिजोरी में ,जिनके मयखाने है
                     जिनकी प्यास महासागर है ,भूख हिमालय पर्वत है
                     लालच पूरा नील गगन है ,दो कौड़ी की इज्जत है
                     इनके कारण  ही बनते है , अपराधी भोले - भाले
                     वीरप्पन  पैदा  करते  है , नेता और पुलिस वाले
                                                                   by= सुखराम आशर्मा

शुक्रवार, 1 मार्च 2013

छोटा केदारेश्वर -सैलाना घाट


छोटा केदारेश्वर
                      रतलाम - बांसवाडा मार्ग पर स्थित है ,यह ग्राम सरवन से महज 6 किमी. व मकोडियारूंडी गाँव के समीप प्रकृति कि गोद में बाबा केदारेश्वर का धार्मिक स्थल है |
                      बाबा केदारेश्वर प्रकृति कि गोद में अपनी मनमोहक छटा को बिखेरता धार्मिक स्थान है ,जो कि कुदरत कि अनुपम कृति है |जिसे देख कर लोगो का मन बार-बार जाने के लिए अनायास ही खीचा चला जाता है |न चाहते हुए भी लोग वहाँ जाना चाहते है |
                      मुख्य सड़क मार्ग (रतलाम -बांसवाडा ) पर छोटा केदारेश्वर के नाम से एक बोर्ड लगा हुआ है |तथा बगल में हनुमान जी कि प्रतिमा भी लगी हुई है इस स्थान लगभग 200 मीटर का ढालदार कच्चे रास्ते का निर्माण किया गया है जिससे होकर सभी श्रध्दालु छोटा केदारेश्वर पहुँचते है सड़क में 200 मीटर चलने के बा छोटा केदारेश्वर जी का स्थान दिखाई देने लगता है जो कि घाटी में लगभग 50 मीटर नीचे स्थित है इसी स्थान से अगर हम चारो ओर विहंगम दृष्टि डाले तो हमें दिखाई देता है कि यह एक भ्रंश घाटी है ,,भूगोलवेत्ताओ का मत है कि इस घाटी का निर्माण हिमालय उत्थान के बाद हुआ क्योकि यहाँ पर अवसादी चट्टानें पाई जाती है जो रेट ,बालू ,चिका,मिट्टी से बनी है जो हिमालय से जो नदियों के द्वारा लाए गए गए अवसादो से बनी है जिन्हें हम बलुआ पत्थर के रूप से पहचान कर सकते है ,तथा कुछ चट्टानें ज्वालामुखी के दरारी उद्भेदन से निकले लावा से बनी है , जिनकी पहचान हम बेसाल्ट चट्टानों के रूप में कर सकते है ,कालांतर में जब इस घटी के आस -पास प्रथ्वी के आतंरिक शक्तियों के हलचल के कारण भ्रंश उत्पन्न हो गए है और यह स्थान ग्फ्हाती के रूप में नीचे बैठ गया |आस-पास कि सभी चट्टानों में क्रेक्स (दरारे ) पाए जाते है |जिनके कारण 200 या 300 वर्षो में यह स्थान अनाच्छादन के कारण समप्राय मैदान में परिवर्तित हो जाएगा |
                       
                              यहाँ पे तीन बरसाती नदियाँ बहती है (गंगा,यमुना,सरस्वती /काल्पनिक नाम) छोटा केदारेश्वर के ठीक सिर के ऊपर से माँ गंगा प्रवाहित होती है ,ऐसा कहा जाता है कि अयोध्या के राजा भागीरथ को अपने पूर्वजो को मोक्ष (तारने के लिए )दिलाने के लिए स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर गंगा को लाने के लिए कठोर तप किया |पर गंगा का बहाव इतना विकराल था कि उसको पृथ्वी पर लाना असंभव था क्योकि इससे सम्पूर्ण पृथ्वी ही बह जाती |तब तपस्वी भागीरथ ने भगवान शंकरजी से विनय प्रार्थना कि तब भगवान शंकरजी गंगा जी को अपनी जटाओ में धारण किया और एक पतली धारा के रूप में गंगा जी को पृथ्वी पर प्रवाहित किया ,तब राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजो कि अस्थियो को गंगा में प्रवाहित किया और उनके पूर्वजो को मोक्ष प्राप्त हुआ तब से गंगा अनवरत इस धरा पर प्रवाहित हो रही है |सम्पूर्ण जगत में लोग अपने परिवार जनों को मोक्ष दिलाने के लिए उनकी अस्थियो को गंगा में प्रवाहित करते है |यह गंगा तो हिमालय से निकलती है और उत्तर दिशा में प्रवाहित होकर दक्षिण -पूर्व में बंगाल सागर में मिलो जाती है |
                       बाबा केदारेश्वर के सिर से निकलने वाली गंगा पूर्व से पश्चिम कि ओर बहती है तथा 60 फीट गहरे जलप्रपात (waterfall )का निर्माण करती है |
                      छोटा केदारेश्वर  के उत्तर कि ओर यमुना और सरस्वती का प्रवाह है ,यमुना उत्तर -पश्चिम से बहकर  लगभग 40 फीट गहरे जलप्रपात (waterfall ) का निर्माण करती है तथा सरस्वती भी उत्तर-पूर्व से बहाकर लगभग 30 फीट गहरे जलप्रपात (waterfall ) का निर्माण करती है तथा ये तीनो नदिया लगभग 50 मीटर बहाने के बाद आपस में मिल जाती है |इसलिए इस स्थान को संगम के नाम से जानते है आगे चलकर बुन्दन नदी में यह धारा मिल जाती है ,बुन्दन नदी के तट पर एक बहुत ही प्यारा गाँव जो अपने आप में पूर्ण बहुत सारी सामाजिक परम्पराओं को समेटे हुए सरवन गाँव स्थित है | बुन्दन नदी बांसवाडा के करीब माही (माता ) नदी में मिल जाती है |
                                                                                      जहाँ पर अभी हम चारो ओर से छोटा केदारेश्वर का सिंहावलोकन कर रहे थे | वही पर छोटा केदारेश्वर में पूजन करने के लिए पूजन सामग्री प्राप्त हो जाती है ,,दुकानों से जब हम गुफा कि ओर जाते है तो 70 बड़ी वक्राकर सीढियों का निर्माण किया गया है |सीढियों का दूसरा किनारा लगभग 40 मीटर गहरी खाई कि ओर पड़ता है | सुरक्षा कि दृष्टि से इस किनारे पर जी.आई. पाईपो कि रेलिंग बनाई गई है |सीढियों के ऊपर से अगर हम नीचे कि ओर दृष्टि डाले तो बाबा केदारेश्वेर कि गुफा व लक्ष्मण कुण्ड जिसमे गंगा गिरती हुई दिखाई देती है |आस-पास के गाँव के लोगो कि मान्यता है कि जो लोग इस कुण्ड में स्नान करेंगे उनको पाप और रोगों से मुक्ति मिलेगी इसलिए आप को अधिकतर लोग इस कुण्ड में स्नान करते हुए मिल जाते है |

                 सीढियों से जैसे हम नीचे उतारते है तो एक पहाड़ी के अन्दर वक्राकर (घुमावदार )कमरा बना है जो कि लगभग 45 मीटर लम्बा व 25 मीटर चौड़ाई लिए हुए है इस कमरे में अधिकाधिक हिस्सा समतल है ,बाकि हिस्सा उबड़-खाबड़ है | इस कमरे का पश्चिमी हिस्सा पूर्णतः खुला है |इस ओर से बाबा केदारेश्वर कि जटाओ से गिरती गंगा को झरना /जलप्रपात (waterfall )के रूप में प्राकृतिक का सौंदर्य  दर्शन किया जा सकता है गंगा जी को लक्षमण कुण्ड में गिरते हुए स्पष्ट देखा जा सकता है |
                  गुफा के मध्य भाग में छोटा केदारेश्वर विराजमान है जो कि एक 1.5  मीटर ऊँचे व 4 वर्ग मीटर चबूतरे पर स्थित है |चबूतरे के मध्य में छोटा केदारेश्वर शिवलिंग के रूप में स्थित है ,जिसका मुख उत्तर कि ओर है ,पश्चिम में शिवजी का वहां नंदी बैठा है ,जिसका मुख पूर्व कि ओर है ऐसा लगा रहा है मनो ध्यानमग्न होकर शिवजी कि अराधना कर रहा हो | शिवलिंग के पूर्वी हिस्से में गणेश जी कि दीवार पर खुदी हुई है |
                चबूतरे से लगभग 12 मीटर कि दुरी पर बजरंगबली कि मूर्ति है |जो भी श्रध्दालु यहाँ आते है वो बजरंगबली के पास ही नारियल बधारते (तोड़ना /फोड़ना ) है ,क्योकि केदारेश्वर जी में नारियल वधारा नही जाता है ,वहां पर समूचा नारियल ही चढ़ाया जाता है |छोटा केदारेश्वर में महाम्रंत्युन्जय जप व अन्य मंत्रो के द्वारा व अगरबत्ती ,फूल ,बेलपत्री का उपयोग किया जाता है  |

                **** महामृत्युन्जय मन्त्र ****
          ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिम वर्धनम  |
         उर्वरुकमेव बन्धनात ,मृत्योर्मा मुक्षयीय मामृतात ||
                                इस मन्त्र का जाप करने से जीवन में आने वाली बाधाओ का नाश होता है  |
           ऐसा लगता है कि गुफा को किसी ने तोड़-तोड़ कर बनाया गया है |पर यह तो कुदरत का अद्वतीय करिश्मा है |इसे भगवान शंकर ने स्वयं अपने हाथो से बनाया है | इस धार्मिक स्थान में जितने समय तक घुमो उतना ही कम है ,यह स्थान लोगो के आस्था व श्रध्दा का केंद्र है ,जो लोग बाबा केदारेश्वर का श्रवण के सोमवारों में उनकी पूजा ,अर्चना ,उपासना,या अराधना करता है व व्रत या उपवास होकर उनका मनन व चिंतन करता है ,उन भक्तो कि मनोकामनाए बाबा केदारेश्वर अवश्य ही पूर्ण करते करते है |
                 गुफा से बहार नीचे कि ओर रेलिंग के सहारे लगभग 20 सीढियों से उतर कर नीचे जाना पड़ता है ,सीढियों के बगल में ही लक्षमण कुण्ड है ,कुण्ड से लगभग 25 मीटर कि दुरी में लगभग 6 मीटर ऊँचा व 4 मीटर चौड़ा एक विशाल पत्थर खड़ा है ,,वाही पर तीनो नदियो का संगम होता है ,,उस पत्थर में चढ़ कर चारो ओर देखते है तो हमें ऊँची-ऊँची पहाड़ियां दिखाई देती है |चारो तरफ हरीतिमा मखमली चादर के रूप में फैली हुई दिखाई देती है इस वर्षा कि फुहारे चार चाँद लगा देती है |
                   अगर हम यह सवाल करे कि ""दुनिया में स्वर्ग कहाँ है "" तो जवाब यही मिलता है कि **छोटा केदारेश्वर **|
                                           
  यहाँ पर चारो ओर से अठखेलिया करती हुई जलधाराए ,जब जलप्रपात के रूप में उतरती है तो तो मनो स्वयं गंगा,यमुना,सरस्वती मिलने आई हो ,,,पत्थर से उत्तर कि ओर से यमुना व सरस्वती नदियाँ बहकर आती है दोनों नदियाँ लगभग 30 फीट गहरे जलप्रपातो का निर्माण करती है |प्राकृतिक सौंदर्य करने वालो का यहं ताँता लगा रहता है ,,यहाँ पर फोटोग्राफी का भी अपना एक मजा है दो-चार फोटोग्राफरों का श्रवण माह में जमावड़ा लगा रहता है ,,दर्शक इन फोटोग्राफरों से विभिन्न आकृतियो  व मुद्राओं में अपने आप को कैद करवाते है ,,कुछ लोग तो झरने के बगल में,में ,तो कुछ लोग पानी में आधा डूब कर ,तो कुछ लोग नीचे बैठ कर अपनी यादों को तस्वीर के रूप में संजोने का कार्य करते है |
           लोगो का शौक यहीं पूरा नही होता ,वो अपना शौक पूरा करने के लिए मोबाईल कैमरे से फोटोग्राफी का शौक पूरा करते है ,,और जहाँ भी जाते अपनी इन हसीन वादियों को मोबाईल में कैद द्रस्यो से रूबरू होते है |प्रति वर्ष श्रवण माह के सोमवारों में श्रध्दालुओ व दर्शको कि भीड़ जमा होती है ,लेकिन श्रवण माह के अंतिम सोमवार को मेला लगता है ,,इस मेले में बाबा केदारेश्वर व प्राकृतिक के मनोरम द्रश्यो का दर्शन करना व मनोरंजनात्मक लुफ्त उठना न भूले |
                                    जय भोले बम-बम
                                    नरेन्द्र कुमार पासी






शनिवार, 16 फ़रवरी 2013

25 जनवरी -राष्ट्रीय मतदाता दिवस (बड़ी सरवन )

ग्राम पंचायत सरवन मे राष्ट्रीय मतदाता दिवस बड़ी ही धूमधाम से मनाया गया |इस कर्यक्रम मे ग्राम वरिष्ठ नागरिक एवं ग्राम सरवन के सरपंच मुख्य अतिथि के रूप मे उपस्थित हुए
                   इस कार्यक्रम की रुपरेखा को मनाने के लिए ग्राम के मतदाताओं को भी शामिल किया गया |इसमें ऐसे मतदाताओं को शामिल किया गया जिन्हें फोटो परिचय पत्र प्राप्त नही हुआ था |शेष फोटो परिचय पत्र प्राप्त मतदाताओं को बुलाकर कर्यक्रम की शुरुआत सरस्वती पूजन कर किया गया ,उसके बाद सभी को शपथ दिलाई गई | शपथ दिलाने का काम कांतिलाल खराडी ने किया |सभी मतदाताओं को परिचय पत्र का महत्त्व बताया गया |

मंच का संचालन नरेन्द्र कुमार पासी ने किया ,और फोटो परिचय-पत्र के बारे में जानकारी दी |साथ ही ये बताया गया कि वोटर आई.डी. कार्ड प्राप्त करना हर भारतीय का अधिकार है ,यह उसका हक़ है |
                                                          ग्राम बड़ी सरवन में जनसंख्या ज्यादा होने कारण रजिस्ट्रीकरण अधिकारी को तीन B.L.O.( बूथ लेवल अधिकारी ) कि नियुक्ति करनी पड़ी | केंद्र क्रमांक - 40 में श्री विजय कुमार शर्मा ,,,,केंद्र क्रमांक - 41 में कांतिलाल खराड़ी ,,केंद्र क्रमांक - 42 में  नरेन्द्र कुमार पासी है  ,जिन मतदाताओ कि उम्र 18 वर्ष पूर्ण कर ली हो वो इसमें शामिल होने के पात्र हो जाते है |


  देवेन्द्र शर्मा जी ने भी कही की बहर जाते समय हमें पहचान कार्ड ले जाना अति आवश्यक है इसके बिना आप कही भी नही जा सकते है |मोबाइल की सिम लेनी है तो पहचान कार्ड की आवश्यकता पड़ती है ,सरकार की किसी भी योजना मे ,बैंक मे खता खुलवाने के लिए ,यहाँ तक की आधार कार्ड बनवाते समय भी इस मतदाता कार्ड परिचय पत्र की आवश्यकता पड़ती है |

 श्री राजू शर्मा ने अपने वक्तव्यों मे कहा की फोटो परिचय पत्र की अहमियत यह है की जब हम कही बहार दूर गांव या शहर मे होते है तो हमारे जेब मे पड़े हुए २०,००० रूपये भी काम नही आते है जहाँ पर यह फोटो परिचय पत्र हमारी सहायता करता है ,ट्रेनों मे सफर करते हुए भी इसका उपयोग होता है | १ जनवरी से ट्रेनों मे यात्रा करने के लिए रेलवे सरकार ने फोटो आई.डी. कार्ड लेकर चलाना आवश्यक है ,अगर आपके पास यह पहचान कार्ड नही है तो आप को बिना टिकिट ही माना  जाएगा |
सभी शेष फोटो प्राप्त मतदाताओं को फोटो परिचय पत्र वितरित किये गए ||
इस अवसर पर आये हुए अतिथियों का स्वागत स्वल्पाहार व चाय कि चुस्कियो से किया गया | श्री विजय शर्मा ने सभी लोगो का आभार माना ,और कार्यक्रम के अंत में राष्ट्रगान गया गया और जय हिन्द जय भारत के नारों से हाल गूंज गया |                      """"""जय हिन्द """"""


सैलाना कि खूबसूरती -आइये


 ये नजारा है  मध्यप्रदेश के रतलाम जिले के सैलाना कस्बे  का जो अपने आप मे एक ख़ूबसूरती कि  मिसाल है |मैं आपको यहाँ का वर्णन करने से पहले बता दू | कि  यह क़स्बा आदिवासी जन-जाती के हित मे आता हें यहाँ के विधायक श्री  प्रभुदयाल गेहलोत साहब है जो की काँग्रेस कमेटी से है और यह कई वर्षों से लगातार  जीतते आ रहे है,जो की जोकि अपने आप मे एक इतिहास हें |    



             सैलाना की शुरुआत इस महल  से होती है ,जो अपनी गाथा खुद गाता नजर आता है ,,जो एक तरफ खड़े यहाँ के राजदरबार से ही होती है |ये राजदरबार कई शताब्दी वर्ष पुराना है |यहाँ के राजा श्री ब्रिक्रम सिंह यहाँ का राजपाठ सँभालते  थे  |, यह महल रतलाम - बाँसवाड़ा  मार्ग पर  स्थित है |                                              

   इस महल से महज ५ किलोमीटर कि दुरी पर अडवानिया ग्राम में केदारेश्वर नाम का एक बहुत ही प्राचीन मंदिर है ,इस मंदिर का निर्माण रजा विक्रम सिंह के पूर्वजो ने करवाया था |इस मंदिर के सिर के ऊपर एक झरना बहता रहता है जो कि सावन के महीने में बड़ा ही सुंदरता का प्रतीक रहता है {यह एक भील आदिवासी बहुल क्षेत्र होने के कारण यहाँ प्रत्येक वर्ष मेले का आयोजन भी होता है |जो शिवरात्रि के मौके में लगता है 

सिर्फ  यही नहीं ,,इस महल के अंदर एक नायाब खूबसूरती का एक भण्डार भी है ,वह नजारा जो आपने  बहुत  ही  कम या देखा ही ना हो जो कि पूरे एशियाई महाद्वीप के  अन्दर प्रथम  स्थान पर आने वाला केक्टस गार्डन जो की खूबसूरत की मिसाल है | इसके अन्दर सैकड़ो प्रकार कि कैक्टस कि किस्मे पाई जाती है | इसकी कई किस्मो  को विदेशो में भेजा जाता है ,इससे अनेक प्रकार कि बीमारियों के इलाज के लिए दवाईया बनाई जाती है 
  

सम्मान कि रक्षा के लिए क्यों नही लड़ते शिक्षक


                                                  सम्मान कि रक्षा के लिए क्यों नही लड़ते शिक्षक

यह आलेख १८ अगस्त को सुप्रसिध्द समाचार पत्र दैनिक भास्कर में प्रकाशित किया गया था |तब के शिक्षाकर्मी आन्दोलन और और अब अध्यापक के रूप में आंदोलन पैराटीचर्स के लिए एक बार और प्रकाशित किया जा रहा है |

जून के आखिरी सप्ताह से म.प्र. में नया शिक्षा सत्र आरंभ होता है |सत्र के प्रारंभ होते ही समाचार माध्यम भी सक्रीय हो जाते है अखबारों में विद्यालयों के हालत ,शिक्षकों कि कमी ,शासन  कि अन्य कमियों और उपलब्धियों के समाचार पढ़ने को मिलते है |ऐसा प्रतीत होता है कि शिक्षा जगत में कोई नई क्रांति आने वाली है ,हर तरफ शिक्षा के प्रति उत्साह नजर आता है |लेकिन इन्ही दिनों एक समाचार और पढ़ने में आता है ,जो शिक्षाकर्मियों के आन्दोलन से सम्बंधित होता है आखिर वे कौन सी समस्याए है जो पिछले एक दशक से हल नही हो पा रही है ,,और शिक्षाकर्मियो को आन्दोलन के लिए विवश करती है ,,शिक्षाकर्मियो ने अब तक अपनी समस्यायों को जिस रूप में पेश किया है ,उससे तो यह भी प्रतीत होता है कि उनकी लड़ाई शासन से बेहतर वेतन भत्ते एवं चंद सुविधाए हासिल करने भर है ,,शिक्षाकर्मियो का नेतृत्व इतने लंबे समय तक जिन व्यक्तियों के पास रहा ,,उनसे भारी चूक हुई है वे ये नही समझ सके कि हमारे समाज में सुविधाओं के लिए लड़ी जाने वाली लड़ाइयो को कम ही समर्थन मिलता है ,,सरकारे भी बड़ी सामाजिक हलचलों के बिना नही जगती शिक्षाकर्मियो कि समस्याए जितनी भारी शिक्षकर्मोयो के लिए है उससे कही अधिक भारी और घातक समाज के लिए है |इसे यदि चेतावनी भी मान लिया जाए तो भी इस पर व्यापक चिंतन के आवश्यकता है ,,प्रदेश का एक तिहाई से अधिक स्कूली शिक्षक ,शिक्षाकर्मियो ,संविदा ,शिक्षकों ,गुरुजनों,जैसे रूपों में काम करता हुआ अति कुंठित है ,,शिक्षक के लिए प्रयुक्त शिक्षकर्मी शब्द जैसा भी लगता हो ,,पर यह शब्द पुराने जैसी गरिमा और भाव व्यक्त नही करता ,,शासन ने बुध्दिमानी से इस बात को इस भाव को और इतनी बड़ी चूक को अब सुधार लिया है ,प्रदेश का शिक्षाकर्मी इस शब्द भेद को समझ कर उसकी व्याख्या कर पता उससे पहले ही शासन ने इस नए शब्द का प्रयोग बंद कर दिया ,,,हलाकि शिक्षकों को शिक्षाकर्मी बना कर शासन कि मंशा शिक्षक को अपमानित करने कि कतई नही थी ,,शासन से तो चूक भर हुई थी शिक्षाकर्मियो ने नेतृत्व को शिक्षकों कि गरिमा कि रक्षा कि ,,लड़ाई को वेतन ,भत्तो में उलझाए रखा ..,किसी ने भी शिक्षक और शिक्षाकर्मी का शब्द भेद समाज एवं प्रबुध्द वर्ग के सामने व्यापक रूप से नही रखा ,,शिक्षक आर्थिक लाभ से जोड़-घटने के चक्कर में अपने स्कूल से टिन शेड तक घूमते रहे औए शासन को पूरा-पूरा मौका दिया कि वो अपनी चूक सुधारे ,,शासन ने ये चूक सुधारी और शिक्षाकर्मी शब्द का प्रयोग बंद कर दिया ,,,शिक्षाकर्मी और उनका नेतृत्व गत दस वर्षों में शासन और समाज के सामने अपना पक्ष इस तरह से नही रख पाया कि व्यक्ति कि मुलभुत आवश्यकताओं में रोटी कपडा और मकान तो अनिवार्य ही है ,पर इनमे संतुष्ट और सम्मान भी सामिल है ,,शिक्षाकर्मी शब्द का प्रतिस्थापन होने पर जो नया शब्द शिक्षक को मिला है वो संविदा शाला शिक्षक है ,अंतिम शब्द शिक्षक लिखा कर शासन ने शायद पुरानी गरिमा लौटने का प्रयाश किया है ,,लेकिन चूक यहाँ भी हो गई ,,क्यों कि इसमें प्रयुक्त शब्द शाला इस बात कि पुष्टि करता प्रतीत होता है कि शिक्षक का शाला से कोई न कोई स्थाई रिश्ता है ,,प्रतीत में इस रिश्तेदारी को साथ लिखने कि आवश्यकता शायद इसलिए नही थी ,,क्यों कि अकेले शिक्षक से ही लोग उसका पूरा भाव और उसकी शाला से रिश्तेदारी समझ सकते थे ,,परन्तु शासन को शिक्षक के पहले शाला लिखना शायद इसलिए अनिवार्य लगा कि अब लोग शिक्षक का रिश्ता शाला में पढ़ाई के काम से कम मानते है ,,क्यों कि उनका रिश्ता हर माह के सर्वे कि रिपोर्ट तैयार करने और मध्यान भोजन का हिसाब रखने जैसे अन्य कार्यों से गहराता जा रहा है ,,संविदा शाला शिक्षक ने प्रथम शब्द कि राह तो एकदम नई है ,,संविदा का अर्थ ठेका ही होता है ,यह व्यावसायिक शब्द दो पक्षों के बीच व्यापारिक अनुबंध होता है ,ये समझ से परे है कि शिक्षक को संविदाकार बनाकर शासन शिक्षक कि समाज के प्रति जिम्मेदारी को किस दिशा में ले जाना चाहते है ,|||| 

भौतिकवादी -अरुण भार्गव

                                          हर व्यक्ति का भौतिकवादी बनना काफी सरल काम है और है भी दुनिया के सभी लोग भौतिकवादी ही है ,ये अलग बात है कि कुछ लोग अध्यात्म का नाम लेकर ,आत्मा अमर है ,शरीर नश्वर है ,यही कहते -कहते मर जाते है ,पर हासिल क्या हुआ ,,वो सोचते है पुनः हमारा जन्म होगा और अपने कर्मो को सुधार लेंगे ,पर ऐसा कब होगा ,,उसे ही पता नही ,,एक ऐसी शक्ति(अद्रश्य ) के ऊपर भी विश्वास करता है जिसे सारी उम्र भी लग जाने के बाद भी मिलना नही हो पाता ,और जीवन कि सारी घटनाओं को उस शक्ति से जोड़ कर अपने अनुभव को लोगो के सामने बड़ी शेखी के साथ बखान करता रहता है ,,पर भौतिकतावाद में कम से कम जो हम कहते है वह लोगो को बता तो सकते है उसे स्पर्श करके भी बता सकते है ,,लोगो का प्रकृति के ऊपर विजय पाने का एक विज्ञान है !!!
मौज -इस भौतिकतावादी दुनिया में मानव को रोटी,कपडा,मकान के अलावा और भी अवश्कताए है ,,जिसे वह हमेशा अपने बहुबल,बुद्धिबल के प्रयोग से निरंतर पाने का प्रयत्न करता है ,,,बुद्दिवादी लोग विकाशशीलता कि बात करते है ,,और यह काम अध्यात्म के द्वारा सम्भव नही है ,,इसके द्वारा कुछ तथाकथित लोग ही अध्यात्म कि दुकान चलाकर मौज कर सकते है ,,जब कि ऐसे लोगो का देश समाज के विकास में इनका योगदान नगण्य रहता है
इसके लिए भगत सिंह जैसे लोगो कि आवश्कता है ,जो ऐसी व्यवस्थाओं का समूल नष्ट कर एक समाजवादी स्वरूप को अपनाया जाए ,जिससे सभी को बराबरी का न्याय प्राप्त हो सके ,,सभी को एक समान रहने के लिए इस विचारधारा को भी अपनाया जा सकता है ,वरन हम इसके लिए प्रयास करे ,,
    आज के इस दौर में हम अध्यात्मवादी ज्यादा बनते जा रहे है ,,निर्मल बाबा जैसे लोग समाज को लूटते जा रहे है ,जनता है कि मानती ही नही है ,,हम जिस विकासशील देश कि कल्पना करते है ,वो ऐसे ही अध्यात्मवादियो के कारण खोखला होता जा रहा है ,,देश समाज को जिन्दा रहने के लिए भोजन कि आवश्यकता होती है ,जिसका उत्पादन मेहनतकश मजदूरो के द्वारा होता है ,पर हमारा समाज भी दो वर्गों में बटा है शोषक और शोषित ,,,शोषक तो कुछ गिने चुने लोग ही है पर शोषितों कि जनसंख्या तो ८० प्रतिशत ही है ,,भारतीय समाज में जाति व्यवस्था भी इसके दुखदाई कारणों में से मुख्य है ,,आज देश को आजाद हुए ६५ वर्ष बीत गए ,पर इन जातिवादियो कि मानसिक गुलामी आज भी कठोर पत्थर कि भांति मौजूद है ,,,     

राष्ट्रीय जनमानस कि भाषा -हिंदी

                                  विचारों के आदान-प्रदान का सबसे बड़ा माध्यम भाषा ही होती है |जिस भाषा मे जितने अधिक लोग अपने विचार और संवेदनाएँ प्रगट करते है ,वहीं भाषा उतनी ही श्रेष्ठ और व्यापक होती है |इस दृष्टि से हिन्दी भाषा सम्पूर्ण विश्व में सर्वश्रेष्ठ है |यदि हम राष्ट्रीय परिवेश की बात करे ,तो यह तथ्य सहजता से स्वीकार किया जा सकता है ,की हिन्दी भाषा ही समूचे भारत राष्ट्र की अभिव्यक्ति का प्राचीनकाल से ही विशिष्ट माध्यम रही है |राष्ट्र की सामाजिक ,सांस्कृतिक धरोहर को हिन्दी भाषा ने ही आज तक सुरक्षित रखा है |क्यों की हिन्दी भाषा विचारों संवाहिक प्राचीन काल से ही रही है |सच तो यह है ,की हिन्दी भाषा ही भारतीय जनमानस की भाषा है |
           हिन्दी भाषा के वास्तविक स्वरूप का निर्माण विभिन्न बोलियों और भाषाओ के मिश्रण से हुआ है | इससे स्पष्ट होता है ,की इसमें आत्मसात की अद्भुत  क्षमता है |इसके इतिहास की व्यापक परम्परा रही है |इस दृष्टि से भी हिन्दी को पूरे भारतीय जनमानस ने स्वीकार किया है |देश की स्वतंत्रता और हिन्दी भाषा के योगदान के बारे में विचार करे तो एक तथ्य सहज में ही हमारे सामने आता है की देश को स्वतन्त्र करने में हिन्दी का सबसे बड़ा योगदान रहा है |अंग्रेजो के विरोध में समूचे देश में एक राष्ट्रीय वातावरण बनाने में हिन्दी भाषा का सबसे बड़ा योगदान रहा है |पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक देश की जनता को हिन्दी भाषा ने जोड़ रखा था |क्योंकि सच्चे अर्थो में हिन्दी भाषा ही प्राचीन समय से ही राष्ट्र की सामाजिक संवाहिका रही है |
           हिन्दी भाषा के सामाजिक और राष्ट्रीय महत्त्व को ध्यान में रख कर ही सन १९१७ में पूज्य राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ही हिन्दी भाषा को ही कलकत्ता के एक अधिवेशन में राष्ट्र भाषा का दर्जा दिया था ,तथा सभी देशवासियों से हिन्दी भाषा को ही राष्ट्रभाषा बनाने की अपील की थी |हिन्दी भाषा की सर्व ग्राहता को देखकर ही हमारे राष्ट्र के पुरोधा हमेशा से ही हिन्दी के पक्ष में थे |गुजरात में स्वयं महात्मा गाँधी ,महाराष्ट्र में बालगंगाधर तिलक ,पंजाब से पंजाब केशरी लाला लाजपत राय ,कश्मीर से जवाहरलाल नेहरु तथा सम्पूर्ण दक्षिण भारत से सी.राजगोपालाचार्य आदि देश भक्तो ने हिन्दी भाषा को राष्ट्र भाषा के रूप में स्वीकार किया था |क्योंकि गुलामी के समय देश में अंग्रेजो के डर के कारण जो विपरीत वातावरण था ,उसमे भी हिन्दी भाषा ने समूचे देश को एकसूत्र में बाँधकर रखा तथा देश की जनता को निर्भयता प्रदान की |
          वर्तमान समय में हम देखे तो चाहे अन्ना हजारे का आन्दोलन हो या फिर बाबा राम देव का |दोनों को जो सफलता मिली है वह हिन्दी के बल पर ही सम्भव हुई है |अन्ना हजारे तो मूल रूप से मराठी भाषी है ,लेकिन उन्हें विदित है की वे भारतीय जनमानस को हिन्दी भाषा के बल पर ही जोड़ कर रखा जा सकता है |श्रीमती सोनिया गाँधी ने देश की जनता तक अपनी बात पहुचने के लिए हिन्दी सीखी |कितने ही अहिन्दी भाषी राजनेताओं और अधिकारियो ने जनता में अपनी पैठ बनाने के लिए हिन्दी भाषा को सीखा है |क्योंकि इन सबको विदित है ,की हिन्दी भाषा के बिना न तो भारतीय समाज को पूर्ण रूप से समझ पाएंगे और न ही अपने विचारों को समाज तक पहुंचा पाएँगे |क्योंकि सामाजिक ,सांस्कृतिक और राष्ट्रीय धरातल पर एक मात्र हिन्दी भाषा ही भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करती है |वर्तमान में हिन्दी भाषा का जो थोडा बहुत यहाँ वहाँ विरोध हो रहा है वह मात्र राजनैतिक स्वार्थ के लिए है  |विरोध करने वालो को मालूम है की हिन्दी भाषा के बिना देश का प्रतिनिधित्व नही किया जा सकता है क्योंकि हिन्दी जन-जन के मन की भाषा |

                                                                                               डा.मुनीन्द्र दुबे
                                                                                               परियोजना परिसर
                                                                                               सैलाना  जिला -रतलाम
                                                                                                          (म.प्र.)